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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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अधूरा हूँ

अधूरा हूँ

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रात चढ़ रही है और ढल भी जाएगी, लेकिन मैं इन दोनों की बीच जड़त्व में हूँ। जीवन में कई पड़ाव आते हैं जहां आप। शून्य हो जाते हैं ऐसे ही पड़ाव पर मैं खड़ा हूँ। मैं कई बार टूट जाता हूँ लेकिन फिर अंदर से आवाज़ आती है इकलौते तुम नहीं हो जिसके साथ यह घटित हो रहा है। मनुष्य जीवन में यह प्रकृति का दिया हुआ चक्र है जिसे मनुष्य खुद चलाता है। इसी पहिये के बीच खुद भी घूमता रहता है। अपनी व्यक्तिगत चीजों को मैंने कभी सार्वजनिक नहीं किया, इस वज़ह से नहीं कि लोग जान जान जायेंगे बल्कि इस वज़ह से कि जानकार भी क्या ही कर पाएंगे। उनके जानने और न जानने से मेरे जीवन जीने की स्थिति में क्या परिवर्तन होगा, जैसा मैं कल था आज भी वैसा ही हूँ। बस कल मैं बेफिक्र था और कई चीजों को सोच रहा हूँ।

सब कुछ चल रहा है चलता रहेगा, समय सब साथ लेकर चलता है कुछ भी नहीं छोड़ता। अगर कुछ छूटता है तो वह है हाथ; कुछ भी टूटता है तो वह है भ्रम। कैसे कोई आसानी से कह देता है उम्र है ढल जाएगी? मुझे भी पता है उम्र है तो। ढलना है लेकिन ढलने का भी एक क्रम होता। प्रकृति यदि सब नियम के हिसाब से करती है तो फिर यह नियम के हिसाब से होना चाहिए। मैं बचपन से लेकर आज जो भी उसके पीछे दादा जी का योगदान है। आज प्रकृति मुझे उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दी है कि उनकी मैं निर्णय नहीं ले पा रहा हूँ किधर जाऊं

उम्र के साथ शरीर बदलता है, सेहत बदलता है लेकिन चीजें ठीक होती हैं। सबकुछ फिर पटरी पर चलता है। दादा जी का पटरी पर आना मैं उम्मीद की तरफ टकटकी लगाए बैठा हूँ। पटरी पर रेल में उनके साथ सफर कर उन्हें उन हर जगह पर पहुंचा सकूँ जहां उन्हें इस मिट्टी की काया के साथ जाने का मन था। मैं वो सबकुछ कर देना चाहता हूँ जो उनका मन था, किसी कारण अपने समय नहीं कर पाए। मैं बहुत हैरान होता हूँ कि व्यक्ति अपना जीवन अनायास ही क्यों खपा देता है किसी को खुश करने में, उसकी ख़ुशी देखने में। अपने सपनों को मारकर किसी दूसरे का सपना पूरा करना कहाँ तक सही है।

मुझे बहुत पीड़ा होती है कि जो कुछ आज मैं करना चाहता हूँ 10 साल काश कर पता, तब क्यों नहीं कर पाया? शायद तब मैं निर्णय लेने में उतना सक्षम नहीं था और आज निर्णय ले सकता हूँ तो दादा जी सक्षम नहीं हैं। बस मैं भोलेनाथ से यही कामना करता हूँ उन्हें एक बार सक्षम बना दें, सब मैं पूरा कर दूँ उसके बाद उनका हर निर्णय मंजूर है लेकिन अधूरेपन का एहसास मुझे पता है कितना दर्द देता है। चाहे उनकी इच्छा का पूरी न होना या फिर उनकी इच्छा न पूरी कर पाने की मेरी इच्छा का पूरी न होना; बाकी अधूरा तो मैं बचपन से हूँ !


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