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सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता "

Abstract

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सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता "

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आवाज़ जाती है...

आवाज़ जाती है...

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आपसी तल्खियां बहुत बाद जाती है (कटुता )

शहरी पुरानी बस्तियाँ आबाद जाती है। 


उस आसमां तक मेरी फरियाद जाती है

जहाँ मैं नहीं जाता वहाँ मेरी याद जाती है।


अपने दरमियाँ के रिश्तों में अगाध जाती है(गहराई )

वरना बदलते मौसम में सराद जाती है। (पतझड़ )

मेरी चीख़ से सटकर मेरी आवाज़ जाती है

मेरी तन्हाइयों में अकसर संवाद जाती है। 


हर कहानी का कहीं आगाज़ जाती है

'उड़ता'तेरी शायरी में अल्फाज़ जाती है। 


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