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सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता "

Abstract

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सुरेंद्र सैनी बवानीवाल "उड़ता "

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उनके बीच

उनके बीच

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उनके दो नैना साज़िशों के बीच

जैसे धूप के बादल बारिशों के बीच।


शहर में बड़ा सा यतीमखाना हुआ 

रहा एक राम है लावारिसों के बीच।


कहना सुनना लाज़िम था दरमियाँ 

बस लटकते रहे गुजारिशों के बीच।


उस गरीब से बस झोपड़ी हो सकी

क्या बंटेगा सभी वारिसों के बीच।


हुनर तो बहुत था उसमें बचपन से 

मगर मौका मिला तारिशों के बीच। (सिफारिश)


"उड़ता" ना फँस ख्वाहिशों के बीच

रह ना जाओ आजमाइशों के बीच।


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