STORYMIRROR

Hardik Mahajan Hardik

Abstract

4  

Hardik Mahajan Hardik

Abstract

आत्मा

आत्मा

1 min
571

मैं हर जगह हूँ

मैं तब भी था

मैं अब भी हूँ

औऱ मैं जाने के

बाद भी रहूंगा


मैं ख़्याल नहीं,

मैं ख़्वाब नहीं,

मैं शीशा नहीं,

मैं तक़दीर नहीं,

मग़र में फ़िर भी

रहूंगा,


मैं कल भी था

मैं आज भी हूँ

मैं जन्मों जन्म

तक हूँ

मैं भटकती हुई

आत्मा हूँ


मैं हर जगह हूँ

मैं हर घर हूँ

मैं हर हर मन्दिर में हूँ

मैं हर मज्जिद में हूँ

मैं हर गुरुद्वारा में हूँ


मैं तहखानों में हूँ

मैं अब्र में हूँ

मैं कब्र में हूँ

मैं हर जगह हूँ


जहां मुझे पुकारोगे

वहां पर हूँ

जहां मुझे बुलाओगे

वहां पर हूँ

मैं हर जगह हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract