आस्तीन से अस्थियों तक
आस्तीन से अस्थियों तक
कुछ आस्तीन के साँप,
ख़ुद भी आस्तीन रखते हैं।
उन आस्तीनों की तहों में रेंगता है—
दूसरों का वक्त,
जो कभी किसी दबे हुए लम्हे को और दबाकर
सरकता रहता है…
पर कब तक कोई लम्हा दबी जुबां रह पाएगा?
एक दिन फिसल ही जाता है,
और उसके साथ फिसलते हैं वे सांप भी,
जो अपनी आस्तीनों में उसे दबाकर बैठे थे।
लेकिन आश्चर्य!
गिरकर भी वे साँप रेंगते रहते हैं,
उसी आस्तीन में,
किसी और लम्हे को फिर से जकड़ने के लिए।
वस्तुतः,
कोई गिरने के बाद ही
आस्तीन का साँप बनता है,
और फिर तलाश करता है
एक आस्तीन—दूसरी भी,
जिनमें वह छिपकर
फिर से किसी लम्हे पर फन मार सके।
लम्हों को दबा कर,
पहुंचे आस्तीन से अस्थियों तक।
और,
यह चलता रहता है अनवरत।
चलता रहेगा...
