आँचल की छाँव 'मायका
आँचल की छाँव 'मायका
माँ का आँगन सुख की छाँव
गुडियाँ खेल खिलौने छूटे, हाथों से तेरा आँचल छूटा
नमी को हँसी बनाना सीखा,हुनर सीखा दुख छिपाने का,
बहन बेटियों का मन बहुत खुश हो जाता है,
जब भाई भाभी का प्यार भरा संदेशा आता है।
उपहार,रूपया, और पैसा कुछ नहीं भाता है
भाई दो शब्द बोल दे तो दिल भर भर आता है।
बाबुल का घर सदा खुशहाल रहे ।
पिता की कुशलता का प्रश्न सदा मन में होता है
खुद बूढ़ी हो जाये पर दिल तो बच्चा रहता है।
माँ का आँचल मन के इर्द गिर्द लिपटा रहता है।
खुद की थकान का मायके जाके निदान होता है
दो पल सकून की नींद से मन तारोताजा होता है
पीहर में जब सभी बहनो का संग साथ होता है
दीवारें चहक उठती है जब माँ-बाबा मिलाप होता है
भाभी की मनुहार से मन पुलकित हो जाता है
भाईभावज से बाबुल के आँगन पर गर्व होता है
अन्नपूर्णा का चेहरा परोसी थाली में दिखता है।
जब मन पसंद का भोजन पीहर में बडे चाव से मिलता है
पीहर आ के भाई में पिता का रूप दिखता है
भाई बहन की बातों में फिर बचपन चहकता है
भतीजों में इठलाते बचपन का चेहरा दिखता है
सुन्दर भतीजियों में माँ शारदे का रूप खिलता है
बहन बेटियों का ताउम्र ही पीहर से नाता होता है
उनकी सांस सांस से दुआ, आशीर्वाद निकलता है
पीहर मेरा हरा भरा रहे बहन बेटी का मन कहता है।
माँ से मायका पिता से पीहर, भाई-भाभी से मान
शांति की अनुभूति का खुशियों से भरा स्थान
जहाँ आँखें मूँदने से मिले सुकून सुख।
