STORYMIRROR

Anita Sudhir

Abstract

4  

Anita Sudhir

Abstract

आक्रोश

आक्रोश

1 min
473


भावों की कचहरी में

शब्दों के गवाह बना 

कलम से सिद्ध करते दोष

और फिर हो जाते खामोश 

कागज पर उतरता आक्रोश ।


मोमबत्तियाँ जल जाती हर बार 

जुलूस भी निकाल लिये जाते 

 वासना से उत्पन्न 

गंदी नाली के कीड़ों में 

अब कहाँ बचा है होश

कागज पर उतरता आक्रोश ।


बालिका संरक्षण गृह में 

ही फल फूल रहे 

सभी तरह के धंधे 

मासूम कहाँ है सुरक्षित 

मजबूरी में करती जिस्मफरोश

कागज पर उतरता आक्रोश ।


प्याज निकाल रहा आँसू 

गोड़से पर चल रही बहस 

गड़े मुर्दे उखाड़ कर

 हो रही राजनीति

बिकने के लिये तैयार बैठे 

ये सफेदपोश 

कागज पर उतरता आक्रोश ।


सनद रहे 

हम भारत की संतान हैं

ये जन जन का आक्रोश

सदैव क्षणिक न रह पायेगा

उठ खड़ा होगा 

अपने अधिकार के लिए

करना होगा ये सब खामोश,

व्यवस्था कब तक रहेगी बेहोश

कागज पर उतरता आक्रोश ।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract