Click here to enter the darkness of a criminal mind. Use Coupon Code "GMSM100" & get Rs.100 OFF
Click here to enter the darkness of a criminal mind. Use Coupon Code "GMSM100" & get Rs.100 OFF

"आकाशात् पतितं तोयं..."

"आकाशात् पतितं तोयं..."

1 min 457 1 min 457

सागर से उठी बूँद,

बादल बनी,

गिरी धरा पर

बन कर बारिश

बह चली

बनकर नदी,

परबतों से

मैदानों से,

खेतों से

खलिहानों से,

कभी मंथर तो

कभी तीव्र गति से

बहाती अपने साथ

जो भी आया

लहरों में

खुद प्यासी फिर भी

बुझाती प्यास

धरा की

और दौड़ती

दिनरैन अधीर सी

ज़िन्दगी सी 

करने को आलिंगनबद्ध

अपने सागर को

मृत्यु ज्यों

और फिर बन वाष्प कण

चल पड़ती आसमान की ओर

और फिर शुरू हो जाती

नवयात्रा, नवजीवन की

यही तो है जीवन दर्शन...

आकाशात् पतितं तोयं

सागरम् प्रति गच्छति...

सागरम् प्रति गच्छति..


Rate this content
Log in

More hindi poem from नीलम पारीक

Similar hindi poem from Abstract