आज की नारी
आज की नारी
मैं नारी
जन्म दात्री सकल मानव जन की
कोमल हृदय, ममतामयी
बच्चों का लालन पालन करती
सुसंस्कारों से सजाती, शिक्षा दे सुजान
बनाती
ब्रह्मा ने रचा नारी को जतन से
संवारा दिव्य गुणों से
यद्यपि कोमलांगी नाजुक बदन मैं
तथापि विकट संकट आए जब भी
काली, दुर्गा बन सामना हर आफत का
करती.
नहीं किसी से मैं डरती.
साहस, हिम्मत, हौसलौं से लबरेज रहती
हर समस्या सूझबूझ से सुलझाती
घर- परिवार, कार्यालय की जिम्मेदारियां, बखूबी संभालती.
कहते मुझको नर से भारी
एकल मात्रा से बना 'नर 'है
' नारी ' में दो-दो मात्राएँ
वजनदार, असरदार.
हर क्षेत्र में झंडा नारी ने गाडा
दुर्गम, अगम्य क्षेत्रों तक भी
पहुँच नारी ने बनाई
लोहा अपनी शक्ति का मनवाया.
पुरूषों की पहचान हूँ मैं
प्रगति का पर्याय हूँ
नारी- सम् दूजा कोई नहीं जहाँ में
सारे विश्व ने माना, जाना और पहचाना.
