आह्वान
आह्वान
आओ इन अनचिन्हें रास्ते पर पाँव धरते हैं,
कुछ देर अपनी वय, परिवेश और बन्धन
विस्मृत कर …
जीवन के शेष पलों को
विशेष करते हैं …
बन कर सर्वथा निर्विशेष
अननुभूत से कर ले करों में…
कुछ अगम्य, वीथियों, कान्तारों में विलीन हो ….
सपनों के अदृश्य लोक में बसते हैं…
बस मैं और तुम
न कोई नाम, न पहचान,
न धरती न आसमान
न सुबह न शाम
बिल्कुल गुमनाम
समय और काया से परे
एक अदृश्य से धुँधलके में
असीम नीरवता में
हृदय का मन्द स्पन्दन सुनते हुए
स्वरों से बहुत दूर
अनहद की गूँज पर,
उन्मत्त नृत्य करें
आओ उस ओर प्रयाण करें ..
जहाँ से प्रत्यावर्तन संभव न हो …
चेतना का अनुभव न हो
काल का अस्तित्व धुआं- धुआं हो
यही चरम यही अनुपम और यही
अद्भुत विलय हो,
डूबते स्वर मिस, प्रकृति में लीन..
एक दूजे में विलीन
अस्तित्व हीन।
