आहिस्ता-आहिस्ता
आहिस्ता-आहिस्ता
उम्मीदों का दीपक बनकर
मंद-मंद मुस्कुराता दिनकर
जिंदगी की धूप निकल रही है
आहिस्ता-आहिस्ता
सुवर्ण परिधान में लिपटकर
बसंत ऋतु आयी सिमटकर
यौवन की कलियाँ खिल रही हैं
आहिस्ता-आहिस्ता
कल्पनाओं से निकलकर,
कलम की धार से फिसलकर
अल्फ़ाज़ों से कविता मिल रही है
आहिस्ता-आहिस्ता
कौन दिशा से चली है पौन
बाहें फैलाये दरख़्त हैं मौन
पिया मिलन को पलकें हिल रही हैं
आहिस्ता-आहिस्ता
हटाकर बुढ़ापे की सलवटें
बेबस झुर्रिया लेती करवटें
जिंदगी उधड़े वक्त को सिल रही है
आहिस्ता-आहिस्ता
तन्हा-तन्हा है आज की रात
कौन सुने इस दिल की बात
घूंघट हटाकर चांदनी टहल रही है
आहिस्ता-आहिस्ता
सूरज डूब रहा है सागर में
छिप गया जल के गागर में
मदहोशी में बावरी शाम ढल रही है
आहिस्ता-आहिस्ता
रेगिस्तान के सुनहले कण
कितने अलौकिक ये क्षण
निर्जन चट्टानों से रेत फिसल रही है
आहिस्ता-आहिस्ता
