STORYMIRROR

Kishan Negi

Abstract Others

4  

Kishan Negi

Abstract Others

आहिस्ता-आहिस्ता

आहिस्ता-आहिस्ता

1 min
23.3K

उम्मीदों का दीपक बनकर 

मंद-मंद मुस्कुराता दिनकर 

जिंदगी की धूप निकल रही है

आहिस्ता-आहिस्ता 


सुवर्ण परिधान में लिपटकर 

बसंत ऋतु आयी सिमटकर 

यौवन की कलियाँ खिल रही हैं

आहिस्ता-आहिस्ता


कल्पनाओं से निकलकर, 

कलम की धार से फिसलकर 

अल्फ़ाज़ों से कविता मिल रही है

आहिस्ता-आहिस्ता


कौन दिशा से चली है पौन 

बाहें फैलाये दरख़्त हैं मौन 

पिया मिलन को पलकें हिल रही हैं

आहिस्ता-आहिस्ता


हटाकर बुढ़ापे की सलवटें 

बेबस झुर्रिया लेती करवटें 

जिंदगी उधड़े वक्त को सिल रही है

आहिस्ता-आहिस्ता


तन्हा-तन्हा है आज की रात 

कौन सुने इस दिल की बात 

घूंघट हटाकर चांदनी टहल रही है

आहिस्ता-आहिस्ता


सूरज डूब रहा है सागर में 

छिप गया जल के गागर में 

मदहोशी में बावरी शाम ढल रही है

आहिस्ता-आहिस्ता


रेगिस्तान के सुनहले कण 

कितने अलौकिक ये क्षण 

निर्जन चट्टानों से रेत फिसल रही है

आहिस्ता-आहिस्ता 



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract