आदत नहीं संस्कृति बनाएं
आदत नहीं संस्कृति बनाएं
आदत नहीं संस्कृति बने खाने की बर्बादी को रोकना।
याद करो वह जमाने पुराने
थाली में खाना छोड़ने पर दादी का टोकना।
आज किसी भी आयोजन में
बहुतेरे व्यंजन बनते हैं।
तथाकथित पढ़े लिखे आज के लोगों की थाली में खाने के बाद भी वह उतने ही बचते हैं।
कूड़ेदान में फेंकते हुए क्या वह अच्छे लगते हैं?
भरा पेट है समझ क्यों नहीं आता?
खरीदने में केवल तुम्हारे तो पैसे ही लगते हैं,
लेकिन उस भोजन को थाल में आने तक कितने लोगों के बल लगते हैं?
कभी सोचा है भोजन को फेंकते हुए कि अनाज उगाने वाले भी क्या भरे पेट ही सोते हैं?
शरद हो या वसंत किसी भी ऋतु में जब तुम्हारे आयोजन होते हैं।
अनाज उगाने वाले किसान तब भी खेतों में ही होते हैं।
प्रकृति के करीब थे हमारे पूर्वज उन्होंने खाने का सम्मान किया।
एक टुकड़ा भी तो व्यर्थ उन्होंने कभी जाने ना दिया।
उनकी रोटी पर कुत्ते गाय और पक्षियों का भी था अधिकार।
झूठन छोड़ने वालों और भोजन को फेंकने वालों
तुम्हें उनके मन से है धिक्कार।
