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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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आधा ख़्वाब

आधा ख़्वाब

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ख़्वाब रह गया मेरा आधा

टूट गया खुद से किया वादा

न छू सके हम सितारों को,

मेरा फासला रह गया ज्यादा

टूट गये कदम,रुक गया मन,

कीचड़ में फंसा में सीधा-साधा

रूठ गया मेरे नसीब का दादा

साखी हुआ टूटे अक्स का लाड़ा


न हुई कोई भी मेरी तमन्ना पूरी

हर तरफ से रही आरजू अधूरी

अपने आलस्य की वजह से ही,

आँखों मे रह गया पर्दा ज्यादा

अब भी समय है बहुत प्यारा

काम कर जो है नेक इरादा

छू ले तू आसमाँ को साखी,

अभी परों में है तेरे बहुत माद्दा

होगा अधूरा ख़्वाब पूरा तेरा,

शीशे को दे पत्थर का इरादा

न पकड़ सकेगी तम-किरणें,

तू बन दीप उजाले का ज़्यादा!


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