महादान

महादान

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आज तुम पेन्सिल नहीं लाये अकमल, देखो सब लिख रहे हैं और तुम ऐसे ही बैठे हो ---।''मनोज ने अकमल से कहा मगर अकमल कुछ नहीं बोला।

''भैया कल भी आयेंगे आप पढ़ाने ---?''सुचित्रा ने मनोज से प्रश्न किया।

''हाँ --हाँ कल क्या मैं तो रोज आऊँगा --कॉलेज की छुट्टी के बाद मैं इधर ही आया करूँगा --आज से मैने पार्टटाइम जॉब भी ढूँढ ली है ---कॉपी किताब भी चाहिये न ---।''मनोज ने कहा ।

''निखिल तुम अपनी पेन्सिल के दो टुकड़े करके अकमल को दे दो ---सुचित्रा ने कहा तो मनोज के चेहरे पर मुस्कान आ गयी ।

''और भी बच्चे हैं क्या तुम्हारे आस-पास ?''अगर हों तो उनको भी कल से बुला लाना ,तुम्हारे साथ वो सब पढ़ लेंगे --।''

''ठीक है भैया हमारी बस्ती में तो बहुत बच्चे हैं, कल से हम सभी को ले आयेंगे ---।''तीनों बच्चे एक स्वर में बोले।

तभी एक आदमी दौड़ता हुआ पार्क में आया और कहा ''चलो सब बच्चे एक लाईन में लगो भैया जी सभी को हलुआ -पूरी बाँटेंगे ।''

''हमको नहीं चाहिये हलुआ-पूरी, हमको किताब कॉपी चाहिये, अपने भैया जी से कहना अगर दान करना है तो हलुआ-पूरी का नहीं किताबों का करें। ''अकमल --एक आठ-नौ साल के गरीब बच्चे के क्रांतिकारी विचारों से मनोज को आत्मसंतुष्टि सी महसूस हुई --कम से कम उसके द्वारा किया गया शिक्षा दान--महादान सा होता प्रतीत हो रहा था।


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