प्रकृति गुरु
प्रकृति गुरु
बदलाव ही जीवन का सार है ।जहाँ बदलाव नहीं वहाँ जीवन नहीं ।प्रकृति जीवन की सबसे बड़ी शिक्षिका है जितने रंग प्रकृति में है वही जीवन में है ।प्रकृति का नियम है पल-पल ,क्षण क्षण नित्य नया बदलना । जैसे पतझड़, बसंत इत्यादि ।
मनुष्य जीवन प्रकृति से जुड़ा है । अतः बदलाव होना परम आवश्यक है ।यूँ अगर बदलना हो तो हम चीजें बहुत गति से बदल देते हैं किंतु अपनेआप के व्यवहार और अपनेआप में बदलाव, दूसरों के जीवन को सहज , सरल व व्यवहारिक बनाने के लिए , यह बहुत कठिन है ।
इस कठिन उदाहरण को संजीव होते देखा है मैंने अपने जीवन में ।इसका संजीव उदाहरण है बुआजी ।
हमारे परिवार में बुआजी से मेरा नाता 30 साल का है । वह मुजफ्फरनगर, जहाँ सामाजिक रीति रिवाज व्यवहारिक प्रथाओं का चलन ज्यादा है, इस परिपेक्ष में वह पली-बढ़ी ।उनका विवाह दिल्ली शहर के प्रतिष्ठित परिवार से हुआ , जहाँ सामाजिक रीति रिवाज का चलन अपेक्षाकृत पहले से कम था ।
जिंदगी की शुरुआत में उन्हें कठिनाई आई पहले शहर और फिर परिवार ,किंतु बुआजी ने ठाना कि वह अपने आप को जल्दी ही सब के अनुकूल कर लेंगी ।
बहुत मुश्किल है कि सब की पसंद को अपनी पसंद बना लेना या दूसरों की खुशी के लिए अपना सर्वस्व त्यागना ।पर जो ठान ले उसके लिए कुछ भी नहीं ।बस उन्होंने शुरुआत कर ली मैं परिवार में सबके लिए कुछ ना कुछ जरूर करुँगी ।ऐसा करते हुए वह धीरे-धीरे वह सबकी चहेती बन गई
समय समय बीता गया । परिवार बड़ा हो गया ।आज वह दादी नानी बन चुकी है ।आज बुआजी अपनी बहुओं की बेहद प्रिय सास है तथा बच्चों की सबसे अच्छी दादी ।
आज भी वह बच्चों के साथ बच्चों की तरह बन जाती हैं और युवा बच्चों में युवा तथा बड़ो के साथ बड़ी बन जाती है ।
परिवार में चाहे ससुराल वाले हो या मायके वाले उनके बिना कोई उत्सव पूरा नहीं होता । परिवार में हर सदस्य को लगता है कि वह उसके सबसे ज्यादा करीब है ।
परिवार में उनकी लोकप्रियता तथा समधुर व्यवहार की मैं कायल हूँ । मैं अपने जीवन में सकारात्मक व्यवहार के बदलाव की कोशिश करूंगी क्योंकि परिवार है तो हम हैं ।अकेले हम कुछ नहीं ।
वक़्त वक़्त पर ख़ुद में बदलाव जरूरी है,
तभी जाकर जिंदगी का दौर बदलेगा ।
जब जागो तभी सवेरा ।
#अगला जन्म ही क्यों ???
अभी और इसी वक्त।
