श्रद्धा सुमन
श्रद्धा सुमन
शिक्षक दिवस के अवसर पर मेरे पूज्यनीय शिक्षकों के श्री चरणों में मेरा नमन है।
टीम स्टोरी मिरर का आभार की उन्होंने हमें अपने गुरुजनों के प्रति आभार व्यक्त करने का मौका दिया।
क्योंकि तब हम अपने शिक्षकों और उनकी कही बातों का अर्थ नहीं समझ पाए थे। जब ज़िन्दगी ने प्रश्न पूछने शुरू किए तब लगा अरे इस प्रश्न का उत्तर तो हमारे शिक्षकों ने बातों ही बातों में कभी बताया था। तो समय के साथ हमें उनकी कही हर बात और उनका महत्व समझ आया।
मैं नहीं कहती, फिर भी आज की दुनिया काफी सरल है। पर आज के बच्चों के पास जानकारी, ज्ञान के बहुत सारे श्रोत है और मार्गदर्शक के रूप में बहुत सारे विकल्प । हमारे समय में ना तो माता पिता ही इतने जानकर हुआ करते थे न ही गूगल बाबा थे। हम पूर्ण रूप से अपने बड़ों और गुरुजनों पर आश्रित थे।
आज जब हम सच्चे दिल से अपने गुरुजनों का आभार व्यक्त करना चाहते है तो लगता है शायद बहुत देर हो गयी है। जैसे नदी का पानी उस घाट को दोबारा नहीं मिलता वैसे ही समय के बहाव के साथ लोग भी। हाँ, मायके जाकर अपने शिक्षकों को ढूँढने की कोशिश की पर वहाँ कोई नहीं है। सब अपने अपने बच्चों के साथ अलग अलग शहरों में जा कर बस गए है और कुछ तो.....।
हाँ तो धन्यवाद देना किससे प्रारम्भ करूँ ? तो शुरू से शुरुआत करते है, प्रथम शिक्षिका माँ (अम्मी से शुरू किया तो अंत कभी हो ही नहीं पायेगा, इसलिए आगे बढ़ते है)। संयुक्त परिवार तो समझो हर किसी से कुछ न कुछ सीखा तो इन सबको भी छोड़ कर सीधा स्कूल के शिक्षकों से प्रारम्भ करते है।
गाँव के स्कूल की पहली शिक्षिका बड़ी बहनजी जिन्होंने वर्णमाला सिखायी, लिखना सिखाया। या चौथी कक्षा के हरिपाल मुंशी जी जिन्होंने गणित से परिचय करवाया (और ऐसी दोस्ती करवाई की आज भी गणित मेरा पसंदीदा विषय है ) । कृष्णा बहनजी जिन्होंने अंग्रेजी से परिचय करवाया। वैसे तो और भी बहुत सारे शिक्षक शिक्षिकाएं होंगे पर यह सारे बचपन की यादों में बसे रह गए। गाँव की प्राथमिक पाठशाला के सभी शिक्षकों के श्री चरणों में मेरा नमन।
गाँव के बाद मेरा दाखिला शहर के विद्यालय में हुआ। यहाँ के सभी शिक्षकों, शिक्षिकाओं की मेरे मन पर ऐसी अनूठी छवि अंकित हुई कि आज मैं भी एक शिक्षिका हूँ। आज जब छुट्टी के समय बच्चों को खुश होकर स्कूल से भागते देखती हूँ तो अपना समय याद आता है । पता नहीं वो शिक्षकों (शिक्षिकाओं) का स्नेह था या अनुशासन हम कभी स्कूल से घर जाते समय खुश नहीं होते थे (हमें तो रविवार की छुट्टी भी पसन्द नहीं थी कि दोस्तों से नहीं मिल पाएंगे) या इस तरह से नहीं भागते थे कि लगे जानवरों को पिंजड़े से छोड़ा गया है। वैसे हमें कहा गया था कि स्कूल के बाहर भी आपका व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि कोई अनजान व्यक्ति भी देख कर पूछे कि "बेटा तुम किस स्कूल से हो।" इसे धमकी भी मान सकते है क्योंकि कहा गया था कि अगर सड़क पर या कही भी खराब, गलत व्यवहार करते दिख गए किसी शिक्षक को, तो वह शिक्षक मारते हुए घर तक ले जाएगा।
हमारी मुख्याध्यापिका मनोरमा मैंम मुश्किल से पाँच फुट की दुबली पतली मुस्कुराती हुई शख़्सियत, जिनकी ऊँची आवाज हमने कभी न सुनी। पर अनुशासन ऐसा की हम डर से कांपते थे (क्यों ..? पता नहीं। कुछ हद तक हैरी पॉटर के सिविरियस स्नैप जैसी) । हमारा स्कूल जैसे नारियल, सिंह मिस, सक्सेना मिस, चंद्रा मिस, राना सर, दिनेश सर ऊपर का कड़क वाला हिस्सा , तारा मिस, संतोष मिस, अरुणा मिस, अनवर सर, सुनील सर मुनीन्द्र सर जैसे अंदर की गिरी, और हम बच्चे जैसे अंदर का पानी, उनके साये में सुरक्षित।
वैसे सच बताऊँ, चाहूँ तो आज भी सभी शिक्षकों के घर जा कर व्यक्तिगत रूप से मिल सकती हूँ। हाँ फ़ेसबुक के कारण लगभग सभी आज भी संपर्क में है, फ़ोन पर बाते भी होती है। पर जिनको हमने उनके उत्कृष्ट स्वरूप में देखा था आज उनको अशक्त, लाचार देखने की हिम्मत नहीं पड़ती। मेरी यादों में आज भी उनकी दमदार शख्सियत और बिना माइक के गूँजने वाली आवाज छाई है। मैं आज उनके कांपते हाथ और लड़खड़ाती आवाज सुनने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही। मैं चाह कर भी मिलना नहीं चाहती। मुझे नई यादें नहीं बनानी है। मेरी यादों में उनका दमदार स्वरूप ही मुझे ऊर्जा देता है। मेरे सभी गुरुजनों को मेरे श्रद्धा सुमन समर्पित है।
