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"पैराहन" भाग- २
"पैराहन" भाग- २
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© नरेन्द्र कुमार

Classics

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एक उलझन को सुलझा के उसकी सीधी-सादी लड़ियाँ बना कंधे में डाली ही थीं, कि फिर सोच में पड़ गया कि क्या उन्नति वैसे ही गर्मजोशी से मिलेगी जैसे वो हमेशा मिलती आई है ? या फिर ये वक़्त और इंतज़ार की दूरियों ने उस गर्मजोशी की आंच धीमी कर दी होगी ! झिझकते-हिचकिचाते डोर बेल तक हाँथ पहोच ही गया, और डोर बेल एक भजन कि ध्वनि से घनघना उठी ! थोड़ा वक़्त लगा दरवाज़ा खुलते-खुलते ! जैसे ही दरवाज़ा खुला, उन्नति की माँ सामने थीं, एक साडी और कुछ कपड़ो में लिपटी धुंधली पड़ी तस्वीर,जैसे धूल ने किसी दिवा स्वप्न को अपने मटमैलेपन से ढकने की भरसक कोशिश की हो मगर कुछ कोने छूट गए हों और उसकी रौशनी धूल के अस्तित्व को चुनौती दे रही हो, इस पर भी उम्र का असर नज़र आने लगा था उनके चेहरे पे, बारीक-महीन रेखाएं गहरी हो-हो, जैसे अपने होने का प्रमाण दे रही थी, हलकी सी मुस्कराहट और स्नेह के साथ उन्होंने अंदर आने का इशारा किया, और बोलीं-,"आओ आलोक बड़े दिनों बाद आना हुआ, काफी दुबले लग रहे हो, देखो तो तुम्हारी दाढ़ी-मूंछें भी आ गयीं है, पहले कैसे सेहतमंद, और गोलू-मोलू से हुआ करते थे ! घर के भीतर कदम बढ़ाते-बढ़ाते उनकी मुस्कराहट अचानक से गहरी रेखाओं में खोने लगीं, दर्द का समंदर उमड़ आया और एक कराह के साथ सिर्फ कुछ अलफ़ाज़ ही निकल सके," हाँ साल भी तो कितने बीत गए" ! आलोक बोला -"सच कितने साल बीत गए" ! ये शब्द बोलते-बोलते आलोक जैसे समय नापने लगा था ! जब घर से चला था तो कितना उत्साह और कितने ही सपने थे, जो ये सोच के बने थे कि, जैसे उन्नति से आखिरी बार कल ही तो मिला था ! लेकिन एक गहरा आत्ममंथन और ये सच की वो कल ही की बात नही, उस मुलाक़ात को गुज़रे पूरे आठ साल बीत चुके हैं ! मन जैसे उड़द की बड़ियों सा धूप में सूखने-सिमटने लगा ! धड़कनें मानो मंथर गति से पहाड़ चढ़ रहीं हों, और सांसें एक दुसरे से होड़ लगाने लगीं ! मन किसी और दल-दल में डूबता उससे पहले एक औपचारिक आवाज़ ने जगा दिया," बेटा चाय लो, और ये चावल के पापड़ चख के बताओ तो कैसे हैं ! कल मैंने और उन्नति ने बनाये !" उन्नति का नाम आते ही उन्नति की माँ और आलोक का चेहरा एक जैसा ही हो गया था ! इससे पहले वो कुछ और कह पाती, आलोक ने लगभग उनकी बात काटते हुए पूंछा ! "आंटी ! उन्नति कहाँ है ? कहीं दिखती नही ! आखिरी खत में उसने लिखा था कि, वो आँगन में फिसल गयी है, और उसके टखने में चोट है ! चोट ज़्यादा तो नही है आंटी ? कैसी पागल है न ? खुद का बिलकुल होश नही रहता !" और भी न जाने क्या-क्या? कितने सवाल एक साथ ही दाग दिए आलोक ने ! फिर एक मिनट के लिए ठिठका जैसे खुद पे काबू पा रहा हो, चुटकी लेता हुआ बोला-"पता है आंटी? उन्नति के खत महीने के चार से दो हो गए हैं ! समझ नही आता कागज़ कम पड़ा है या स्याही ! " इस बात पे हंसी दोनों को ही नही आई, मगर दोनों औपचारिक रूप से मुस्कुराये ! आलोक की निगाहें फिर कुछ ढूंढती हुयी पूरे घर के चक्कर काटने लगीं ! दोबारा उन्नति की माँ से कुछ भी पूँछने की हिम्मत नही जुटा पाया, कुछ देर और बैठने के बाद आलोक वापस अपने रास्ते चल दिया !

घर पहोचते-पहोचते शाम हो चुकी थी, आलोक के चेहरे पे निराशा और थकावट साफ़ झलक रही थी ! घर के दरवाज़े पे पहोचा तो हिम्मत लगभग जवाब दे चुकी थी, दरवाज़े को अंदर धक्का देते हुए, खुद आलोक भी, अपने ही हाँथ से पूरी हिम्मत जुटा दरवाज़े पे लगाई हुयी ताकत के ज़रिये ही, बिस्तर तक पहोच गया और निढाल हो बिस्तर पे गिर पड़ा ! आँख भी लग ही जाती, लेकिन एन वक़्त पे उन्नति का मुस्कुराता चेहरा निगाहों के सामने घूम गया ! फिर तो नींद ये गयी वो गयी ! उन्नति के साथ पहली मुलाक़ात से आज के रोज तक, आलोक के ज़ेहन ने सब कुछ मानो चलचित्र की भांति चला दिया ! आलोक कभी हंसा तो कभी उसने तकिये के गिलाफ भिगो दिए ! थोड़ा संभला, फिर अचानक बिस्तर के सिरहाने के ठीक दायीं तरफ एक काठ की अलमारी और दीवार के बीच पड़े संदूक पे जा पिला, बेतरतीबी से सारा सामान, कपडे, बिखेरने लगा, पता नही क्या तलाश रहा था, जो संदूक की सतह पे जाके ही ठहरा ! हांथों में पुराने कागज़ों की एक पोटली और चेहरे पे युद्ध जीतने की सी मुस्कराहट लिए वापस बिस्तर पे आ बैठ गया ! पोटली खोली और एक-एक कागज़ संभाल के रखने लगा मानो आलोक के लिए ये महज़ पोटली या कागज़ नही थे, उसकी मिलकियत, उसका खजाना था ! सारे कागज़ों को उलट-पलट के थोड़ा ठीक से बैठने को, कोहनी की टेक ले बिस्तर पे आधा लेटने जैसा बैठा ! पहला कागज़ निकालते ही सबसे पहले आलोक की नज़र ऊपर लिखी तारीख पर पड़ी, ०१ अप्रैल १९८५ तारीख पढ़ते ही मानो उम्र ने पंख पहन लिए हों, और उसे तकरीबन एक दशक पीछे ले गए ! 

एक किसान पिता की तीन संतानो में सबसे छोटा आलोक, शायद अपने पूरे कुनबे में पहला इंटर मीडिएट पास करने वाला मेधावी था ! बाकी दोनों बड़े भाइयों में से तीरथ २३ साल. अपनी मेट्रिक तक की भी पढ़ाई पूरी नही कर सका, मझला भाई अर्जुन हाई स्कूल के इम्तिहान से डर के शहर भाग गया था ! अब वापस आके अपने पिता और बड़े भाई तीरथ की खेती-किसानी में मदद करता है, आलोक १७ साल का है, और अपने पिता के लाड-प्यार में पला है, जिन्होंने उसे कभी खेतों का मुह भी देखने नही दिया ! इम्तिहान ख़त्म होते ही ज़िद करके पिता की मदद को खेतों की तरफ घूम आता है, कभी खाना देने के बहाने तो कभी किसानी से जुड़े उपकरण, बीज वगैरह देने के बहाने ! पिता रामअवतार आलोक की इस बेचैनी और आगे पढ़ने की चाहत दोनों को बखूबी जानता है ! और तो और खुद उसकी भी चाहत है की बेटा पढ़-लिख के आला सरकारी अफसर बने, मगर हालात का मुह ताकता हिम्मत नही जुटा पाता कि, बेटे को शहर भेज दे ! आज खेतों से आलोक और राम अवतार साथ-साथ घर लौटे, शाम ढलने को है, एक पतली सी रेखा में सूरज अपनी आखिरी सौगात बिखेरता अलविदा कहने को है ! हलकी सुहानी बयार चल रही है, गेहूं के खेत के साथ-साथ रामअवतार भी मस्ती में इतरा रहा है, और इतराये भी क्यों न आखिर,तीन महीने से दिन-रात एक कर इस गेहूं की फसल को उम्मीद की तरह जिया है ! खेतों की मेड़ों पे चलते हुए पच्छिम की ओर से गांव में दाखिल हुए, और अब अपने घर की तरफ बढ़ रहे हैं, रामअवतार चलते-चलते बुद्धू की भैसों से अपनी प्यारी गोमती की तुलना में कुछ बुदबुदाता हुआ आगे बढ़ता जा रहा है ! आलोक शांत बस पिता के पीछे-पीछे चल रहा है, तभी दायीं तरफ से पीपल के पेड़ को पार करता हुआ अवगुन (अवगुन आलोक का सहपाठी रहा है हाई स्कूल तक, पढ़ाई में थोड़ा कच्चा होने की वज़ह से तीन बार फेल भी हो गया, अब अपने पिता और दद्दा के साथ गाँव की परचून की दुकान संभालता है, मगर आलोक से उसकी दोस्ती पजामे और नाड़े जैसी ही है !)  दोनों के पास आके ठहरा, हांफता हुआ कुछ सांसें बटोर के हाँथ में लिए अखबार को आगे करता हुआ बोला-,"काकू आलोक का रिजल्ट निकला है !" ये पूरे ब्लॉक में तीसरे नंबर पे है !" अब इसको शहर भिजवा दो, तुम्हारे सारे सपने पूरे कर दिखायेगा !" आलोक का मन था की आसमान से टकरा-टकरा के वापस आये जा रहा था, पिता रामअवतार की भी ख़ुशी का ठिकाना न था ! अखबार में ध्यान ही किसने दिया, एक-आध मर्तबा आलोक ने ही अखबार में कुछ खोजने की कोशिश की थी, मगर शाम ढल चुकी थी, गली में अँधेरा हो आया था, कुछ दिखाई तो पड़ने से रहा ! तीनो तेज कदमो से घर की तरफ चल दिए,वहां डिब्बी की रौशनी में ये खबर पुख्ता कर लेंगे ! गांव में बिजली आये अभी कुछ ही बरस बीते हैं, कि कभी तार टूट जाता है तो कभी खेतों में कम उचाई के तार पेड़ों में गिर जाते हैं, और कई-कई दिनों तक बिजली रानी के दर्शन नही होते, बिजली आ भी जाए तो एक हफ्ते दिन में और एक हफ्ते रात में आती है ! खैर अभी रात में बिजली के दर्शन होने को दो दिन शेष हैं ! 

घर पहोचते ही रामअवतार ने तीरथ और अर्जुन को आवाज़ लगा बैठक में बुला लिया, बैठक में एक ढिबरी रौशन  की , सबने आलोक को घेर लिया और आलोक सबसे बेखबर, हांथों से ढिबरी का प्रकाश आने देने का इशारा करता हुआ, अखबार में अपना रोल नंबर खोजने में जुट गया ! थोड़ी देर की मशक्कत के बाद ही चेहरे पे ढिबरी जितना ही प्रकाश लिए पिता और बड़े भाइयों के पैर छूने बढ़ा ! रामअवतार बेहद खुश था, मगर जिगर के टुकड़े को चाह के भी शहर नही भेज पा रहा था, एक तो माली हालात ऐसे उस पर पुत्र से वियोग ! बड़ी जटिल समस्या आन पड़ी थी ! दूसरी तरफ आलोक आज खाना-पीना भूल अखबार सीने से चिपटाए सो गया ! उधर रामअवतार को नींद आने को राजी नही पूरी रात बस एहि सोचता रहा कि कब फसल की कटाई होगी, थोड़े पैसे अंटी में होंगे तो, बेटे को बड़े कालेज में दाखिला दिलाने शहर भेज दूँगा ! या फिर फसल कटने का इंतज़ार ही क्यूँ करे ? महाजन से कुछ पैसे ब्याज पे ही जो लेले ! इसी उधेड़बुन में आँगन में लेटे-लेटे खपरैल का परकोटा देख रहा था, और सुबह होते-होते ही नींद लगी ! 

नयी सुबह आलोक और रामअवतार दोनों के लिए ही नयी चुनौतियाँ लाने वाली थी !

रामअवतार सुबह तड़के ही उठ के महाजन के घर की तरफ चल दिया ! महाजन गाँव से शहर की ओर जाने वाले रास्ते के आखिरी में बने विशाल महलनुमा घर में रहता था ! रामअवतार जानता था की महाजन से सुबह-सुबह कर्जे की बात करना, भूखे शेर के सामने से उसका निवाला उठाने जैसा है ! मगर फिर भी अपनी सारी खुद्दारी उसी खपरैल में बने परकोटे में टांग, और अपनी सालो सहेजी हुयी इज्जत को गमछे के छोर से बाँध सरपट दौड़ा जा रहा था ! साथ ही सोचता जा रहा था कि अगर महाजन ने इंकार किया तो बुद्धू या समशेर से मांग लेगा, लेकिन आलोक को इसी महीने की उजरिया से पहले शहर भेज देगा, रामअवतार तेज कदमो से चलता जा रहा था !

दूसरी तरफ आलोक सुबह उठ के दैनिक क्रियाकलापों से फारिग हो, अपने खेतों की ओर चल दिया, रास्ते में ही अवगुन भी साथ हो लिया, घुमते-फिरते दोनों खेत के बीचों बीच बने मचान तक आ पहोचे ! मचान पे पहोचते ही अवगुण ने अपने गमछे से एक अखबार का लिफाफा निकाल के आलोक को देते हुए बोला,"मैं जानता हूँ, रामअवतार काकू तड़के ही उस घमंडी महाजन के रास्ते हो लिए होंगे, लेकिन मैं मानता हूँ कुछ भी हो, तुम्हारा शहर जाना टलना नही चाहिए; तुम ये कुछ पैसे रख लो ताकि तुम शहर जा सको, मैं जानता हूँ कि, ये रुपिया काफी नही होगा, लेकिन इतना है कि तुम शहर जाके महीने-दो महीने चला सको !" आलोक अभी तक आश्चर्य चकित अवगुन को देख ही रहा था ! की अवगुन फिर बोला,"ये रुपिया दद्दा को अगले छः महीने तक नही चाहिए, बुधिया के बाबू जी को दिए थे, एक बरस के लिए ३ रुपिया सैकड़ा के बियाज से ! कल ही गया था मैं, बियाज वास्ते, तो उन्होंने  बियाज के साथ सारा पैसा दे दिया ! शायद बबलू भैया भेजे थे, शहर से ! तुम भी बबलू भैया जैसे ही पढ़ाई के साथ-साथ कौनो काम-वाम करने लगना, जिससे की काकू का बोझ भी न बढे ! तुम्हारे रहने-खाने के खर्चे के बाद जो बचे तो भिजवा देना, नही भी भिजवाओगे तब भी मैं दद्दा को पैसा लौटा ही दूंगा ! " इस बार आलोक पूंछे बिना नही रह पाया,"कैसे लौटाओगे पैसा, तुम्हारी कोई फैक्ट्री लग रही है क्या ? बेकार की झंझट मोल मत ले अवगुन ! मैं कुछ भी करके शहर चला ही जाऊंगा, तू मेरे सर की आफत अपने सर मत ले ! और कहीं तेरे दद्दा को पता लगा तो खामखाँ बाबू जी की फजीहत हो जाएगी ! और बाबू जी भी कभी नही मानेंगे ! अवगुन लगभग बात काटते हुए बोला,"तुम हुडुकचुल्लू हो का, ये इंटर-विंटर जरूर कर लिए हो, लेकिन अकल ढेले की भी नही, काहे हम बताएँगे काकू को, और काहे तुम ! कुछ पूंछें तो कह देना, हम सब दोस्त मिल के थोड़ा-थोड़ा पैसा इकठ्ठा किये हैं ! जब कमाने लगोगे तो अपने दोस्तों को वापस कर दोगे !" इस  बार अवगुन थोड़ा बिफर के बोला तो आलोक कोई तक़रीर नही कर पाया ! बहोत देर दोनों शांत बैठे खेतों को तकते रहे, आलोक जाने क्या-क्या सोचता रहा, हर बार अवगुन की मुस्कराहट देख आलोक की सोच वापस वहीँ चौपाल पे आके ठहर जाती थी, कई मर्तबा तो आलोक के खयालो का मुद्दा अवगुन का नाम था, सोचा इसे लोग अवगुन क्यूँ बुलाते होंगे भला ? फिर खुद ही खुद को जवाब भी दे लिया, कि सबने इससे दोस्ती कहाँ की है भला ! थोड़े और देर बैठे रहे फिर दोनों घर लौटे ! 

रामअवतार घर के बाहर चबूतरे में बैठा चिलम भर रहा था ! भाव सामान्य ही थे चेहरे पे तो, चेहरे से ये अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा था कि, महाजन के यहाँ क्या हुआ होगा ! कोई कुछ पूंछता उससे पहले ही रामअवतार बोल पड़ा-,"लल्ला कहाँ घूम रहे हो, जो भी तैयारी-वैयारी करनी है कर लो, कल सुबह की बस से ही रवाना होना है, जाके कल्लू मियां (अवगुन के दद्दा का नाम) के यहाँ से तीन-चार सेर गुड और चने ले आओ, कलेवा बना देते हैं, और थोड़े लड्डू दिए हैं बनाने को कल्याणी बुआ के घर से वो भी उठाये लाना ! " आलोक और अवगुन कुछ और पूंछने की हिम्मत नही कर पाये, आलोक, अवगुन के साथ ही उसकी दुकान की ओर हो लिया, रास्ते में आलोक ने अवगुन को उसके पैसे लौटाने चाहे मगर अवगुन ने मुस्कुरा के उसे वो पैसे रख लेने का इशारा करते हुए, दौड़ लगाने का इशारा कर दिया ! आलोक भी अपने बचपन के दोस्त का इशारा समझ बस दौड़ पड़ा ! दोनों दुकान तक पहोचे, आलोक ज़रूरी सामान लेके वापस घर आया, सारी तैयारियां करते-कराते शाम ढल गयी थी ! आज आलोक खुश था, आज उसने गोमती(भैस) को नहलाया, सानी लगाई, दूध निकाला, खूंटे के आस-पास नीम की पत्तियां जलाईं ताकि, मच्छर न काटें ! इस बीच आलोक गोमती से अपने शहर जाने की योजनाएं बताता जा रहा था ! उस रात न ही आलोक सोया न ही, रामअवतार ! रामअवतार कभी आलोक के कमरे में जाके देखता तो कभी गोमती के पास जाता, फिर चबूतरे में बैठ बीड़ी सुलगा लेता, इस तरह से आधी रात कटी, फिर कमरे में जाके जैसे ही लेटा नींद आ गयी, लेकिन उतनी ही जल्द दिन भी निकल आया ! हड़बड़ा के उठा तो सामने आलोक गोमती(भैस) की सानी लगा रहा था, आलोक को हटाते हुए कहा,"यहाँ क्यूँ बिधे पड़े हो, जा के अपना संदूक सहेजो, देखो कोई भी चीज़ छूट न जाए, शहर में हर चीज़ के भाव आसमान छू रहे होंगे !" आलोक अपने पिता से पैसों के बावत पूंछना चाहता था, लेकिन इस बार भी हिम्मत नही हुयी ! और अंदर चला गया ! अंदर जाके अपना सामान, इकठ्ठा करने लगा !

रात में सोने से पहले आलोक ने हिम्मत जुटाई, और अपने पिता रामअवतार के कमरे के बाहर पहोच गया, लेकिन अभी भी पिता से कुछ भी पूँछ पाने में खुद को असहज पा रहा था ! मन को इरादों की बल्लियों से टेक दे ऊपर उठाया, स्वाभिमान को बुरी से बुरी दशा के लिए तैयार किया और कमरे में दाखिल हुआ, देखा तो अभी भी रामअवतार की आँखें छत की खपरैल को टिकाये लकड़ियों पे थी ! रामअवतार की आँखें लकड़ियों पे और मन न जाने कहाँ खोया था कि,न आलोक के पैरों की आहट सुनाई दी और न ही उसके कमरे में दाखिल होने का भान हो पाया ! आलोक दबे पाँव चलता हुआ रामअवतार के पैरों की ओर चारपाई के सिरवे पे जा बैठा ! चारपाई में हरकत हुयी और, रामअवतार चौंक के उठ पड़ा ! थोड़ी देर आलोक की उपस्थिति उसे भ्रम लगी, लेकिन जल्द ही, उसे चेतना आ गयी ! बड़े प्यार से दुलारते हुए पूंछा,"सोये काहे नही, कल तड़के निकलना है, थोड़ा आराम कर लोगे तो सफर में सामान ताक सकोगे, सुना है शहर में लोग देखते-देखते आँख से काजल चुरा लेते हैं, जाओ सो जाओ !" रामअवतार ने बात ख़त्म की ही थी कि, आलोक फफक के रो पड़ा ! रामअवतार की आँखों में भी आंसू आये किन्तु, पिता की कठोर परिभाषा और बचपन से पुरुषों के न रोने में सीखे पौरुष ने रोक लिए ! रामअवतार चारपाई से उठ आलोक के पास जा बैठा, और स्नेह से दुलारते हुए पूंछा,"रोये काहे ? कौनो दुःख है का ? " आलोक खुद के आंसू पोंछता हुआ सिसका फिर, अपनी हिम्मत की गठरिया खोल, वो सवाल पूँछ ही लिया जो पहाड़ सा दिल पे रक्खा था !,"बाबू जी ! रुपिया का इंतज़ाम कैसे किये ? अवगुन बता रहा था, कि महाजन बिना कौनो सामान, जमीन गिरवी रक्खे कर्जे के लिए हिरकता नही है ! और हमरी जमीन तो पहिले से महाजन के पास गिरवी है, फिर कैसे मान गए वो ? कुछ और सामान-वमान तो नही रख दिए हो ?" रामअवतार का दिल काँप उठा ! ज़ुबान लड़खड़ा गयी ! और कुछ रुकते-रुकते, एक दो शब्द ही निकल पाये !,"पगला गए हो का?" महाजन हमारे बहुत ख़ास दोस्त हैं, वो भला हमसे कुछ समान गिरवी काहे रखवाएंगे, वो जमीन तो उनके पिता जी के जमाने में गिरवी रक्खी थी, हमारे पिता जी ने, अब कर्ज और ब्याज मिला के इतना ज़्यादा नही होता तो,  महाजन कब का हमारे ज़मीन के कागज़ हमे लौटा देता ! फिर भला लौटाए भी काहे, अरे भाई ! घोडा घास से दोस्ती करे तो खाए क्या? उनका व्यापार इसी बात पे टिका है ! और हमको भी कौनो ऐतराज नही है, ज़मीन के कागज़ उनके पास रक्खे होने से, आखिर हमारे बाबू जी की बहुत ज़रुरत में बहुत बड़ी मदद किये थे ! हम एहसान फरामोशी नही दिखा सकते ऐतराज जता के ! और रही बात तुम्हारे शहर जाने के बंदोबश्त के पैसों की, तो वो तो महाजन खुदही बिना बियाज, बिना मियाद के दे दिए, का उनको अच्छा नही लगेगा कि, गाँव का लड़का शहर जाके गाँव का नाम रोशन करे ! और वो गाँव के करता-धरता हैं भई ! गाँव की इज्जत बढ़ेगी तो उनका भी यश फैलेगा सो बस दे दिए, और कहा कि जब आलोक कमाने लगेगा तो थोड़ा-थोड़ा करके चुका देना !" रामअवतार को लगने लगा था कि, उसकी बातें आलोक पे असर कर रहीं हैं, तो बोलते-बोलते और भी विस्वास आता जा रहा था आवाज़ में ! लेकिन आलोक जानता था कि, कुछ तो है जो उसके बाबू जी, छुपा रहे हैं, लेकिन अभी वो उनकी बातों और तर्कों से सहमत हो जाना चाह रहा था ! आलोक अब चारपाई से उठ के दरवाज़े की ओर चल दिया था, कुछ कदम दरवाज़े की तरफ बढ़ के आलोक ठिठका, और जैसे ही आलोक के कदम रुके, रामअवतार का दिन भी एक बारगी हिल गया ! आलोक ने कहा, "बाबू जी ! आप सो जाइए, कई दिनों से देख रहा हूँ, आप रात-रात भर जागते रहते हैं ! अब थोड़ा आराम किया कीजिये, हम तीन भाई हैं, और अब तो  मैं भी आपका सहारा बन पाउँगा !" इतना कह के आलोक तेजी से कमरे से निकल गया ! रामअवतार आलोक की बातों की गहराई में जैसे डूब रहा था, लेकिन कोई राहत तो थी जो आलोक की बातों में घुली थी ! रामावतार आलोक के जाने के तुरंत बाद ही गहरी नींद में था ! दूसरी तरफ आलोक भी हलके दिल आज नींद में था! 

नयी सुबह, चोटिलों पे मरहम जैसी थी, और स्वस्थ जनो पे मलखम जैसी !

पौ फटते ही आलोक के कमरे से हलचल सुन रामअवतार भी जाग गया ! गाय-भैसों का चारा-भूसा कर, हाँथ-मुह धुलके आँगन में पड़ी चारपाई पे बैठ गया, तब तक तीरथ भी चाय बना लाया ! अर्जुन भी जल्द ही नहा-धो के तैयार हो लिया था ! रामअवतार की आँखें दहलान की ओर टिकी थीं, जो की आलोक के कमरे के ठीक सामने था ! तभी रामअवतार लगभग फुफुसाते हुए बोला- "अरे भाई ! आलोक को बुला लो, आज साथ ही बैठ के चाय-पानी कर लेंगे, फिर कहाँ पता कितने-कितने दिनों में आना हो पाये !

 

##pairahan

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