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Arunima Thakur

Inspirational

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Arunima Thakur

Inspirational

गुरु दक्षिणा

गुरु दक्षिणा

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हमारी कक्षा में 'नमन' एक बहुत ही शैतान लड़का था। हम सब कक्षा एक से साथ पढ़ते थे। मुझे अच्छे से याद है तब वो एक अच्छा विद्यार्थी था। उसकी स्कूल यूनिफॉर्म पुरानी पर साफ सुथरी होती थी, जूते भी सिले हुए पर साफ। शायद वो गरीब घर से था । या शायद उसके बहुत से भाई बहन थे। जो भी हो वो पढ़ने में होशियार था, खेलकूद में भी। पर जैसे जैसे हम बड़ी कक्षाओं में जा रहे थे उसकी शरारते बढ़ती ही जा रही थी या यूं कहना गलत ना होगा उसके खिलाफ शिकायते बढ़ती जा रही थी। कभी किसी का टिफिन खा लेता। कभी किसी दो लोगो के बैग की पुस्तकों की अदला बदली कर देता। चलती कक्षा में पीछे बैठ कर चाक से मारता। इंक पेन की इंक बच्चो की यूनिफॉर्म पर छिड़क देता। अक्सर किसी न किसी की खोई (चोरी) हुई पेन या वस्तुएं उसके बैग में मिलती। कोई कभी जान नही पाया वो यह सब करता कब था। उसको समझा कर , सुधारने की कोशिश कर के हमारे शिक्षक / शिक्षिकाएं भी थक गए थे। पहलेपहल तो वह यही कहता था कि उसने नही किया फिर उसने कुछ भी कहना छोड़ दिया। यहॉं तक कि अब वो बहुत गन्दे तरीके से शिक्षकों को देख कर हँसता कि हाँ मैंने किया है जाओ क्या कर लोगे। कहना गलत ना होगा कि अब उन्होंने उसे सुधारने का प्रयत्न करना भी छोड़ दिया था। शिक्षक अपनी जगह पर सही थे उन्हें हमे पढ़ना था और अपना पाठ्यक्रम भी नियत समय पर पूरा करवाना था। वह नमन की रोज की शरारतों पर ही अपना ध्यान केंद्रित नही कर सकते थे। तो उन्होंने अब पूरी तरह से नमन को अनदेखा करने का फैसला लिया था। 


अब हम नौंवी कक्षा में थे जब एक दिन हमारी कक्षा में एक लड़का आया। बहुत ही आकर्षक था बस लंबाई थोड़ी कम थी। मतलब सामान्य कद काठी का था। लड़कियाँ तो उसे देखकर खुश हो गयी। कुछ लड़के उसके पास जाकर खड़े हो गए। नमन उसके गले मे हाथ डालकर बोला, "और नए आये हो" ? "कहाँ से आये हो "? ऐसे ही कई सारे प्रश्न पूछ डाले। उस लड़के ने नमन का हाथ कंधे से हटा कर कुछ बोलना चाहा तब से हमारी मुख्याध्यापिका आ गयी । उनके आते ही पूरी कक्षा अपनी जगह पर पहुँच गयी। मैंम ने परिचय करवाया, "ये है तुम लोगो के हिंदी के शिक्षक श्री नमन" । अब नमन और लड़कों के होश गुम, कि अब तो बहुत डाँट पड़ेगी और लड़कियाँ खुश इतने आकर्षक शिक्षक से पढ़ने को मिलेगा।


मैम के जाने के बाद उन्होंने हम सबका परिचय लिया। नमन के परिचय देने पर वो मुस्कुरा दिए बोले," हमारा आपका तो नाम भी एक है और दोस्त तो पहले ही आपने हमे बना लिया है। मैं नया हूँ । आप सभी के सहयोग की अपेक्षा करता हूँ"। 


बच्चे हमेशा की तरह शिकायते करने लगे, "सर नमन ऐसा है, नमन वैसा है। नमन बहुत शरारते करता है"। 


सर ने सभी को शांत करवाया और बोले, "मुझे शरारती बच्चे ही पसन्द है। मैं भी अपनी कक्षा में बहुत शरारते करता था । मुझे खुशी होगी आपके साथ मिलकर शरारते करने में। मुझे अच्छा लगेगा अगर आप सभी अपनी शरारतों में मुझे भी शामिल करेंगे। हम मिल कर शरारते करेंगे और पढ़ाई भी । यही मेरी गुरु दक्षिणा होगी।"


हम सब यह सुन कर आश्चर्यचकित थे और खुश भी। हमारी कक्षाएं सुचारू रूप से चलने लगी। हमारे एक शिक्षक हर सप्ताह हमारा टेस्ट लेते थे। हमेशा टेस्ट लेने के बाद जिसके जितने नंबर कम होते उतनी शंटी (पेड़ से ताजी तोड़ी हुई पतली लचीली डाल) पड़ती। वो हमेशा शंटी लाने के लिए नमन को ही भेजते क्योकि उसके नम्बर ही हमेशा सबसे कम रहते थे । एक दिन कक्षा के बाद हमने देखा नमन सर नमन से कुछ बाते कर रहे है और नमन मुस्कुरा रहा है। अगले कुछ दिनों में जब उन सर ने नमन को शंटी लेने के लिए भेजा तो नमन एक खूब मोटी डाल घसीटते हुए लाया। उसके पीछे प्रिंसिपल मैंम और कुछ शिक्षक भी थे। हुआ यूं था कि जिसने भी नमन से पूछा," यह क्या है ? कहा ले जा रहे हो" ? नमन ने बोला , "फ़लां सर ने मारने के लिए लकड़ी मंगवाई है"। शंटी पर तो किसी का ध्यान नही जाता था पर मोटी लकड़ी ने सबका ध्यान आकर्षित कर लिया। यहाँ तक कि मैंम ने भी उन सर से बोला, सर बच्चो को बिना वजह दण्ड देना गलत है"। सर की हालत तो देखने लायक थी। नमन की वजह से हम मार खाने से बच गए थे। वैसे तो अब भी उसकी छवि एक शरारती बच्चे की थी पर अब हम उससे अच्छे से बात करने लगे थे । वह भी शायद हम लोगो का ध्यान केंद्रित करना चाहता था या जो भी हो अब उसकी शरारते कम हो गयी थी। ।


एक दिन जब हम क्लास में आये तो देखा बिजली के बोर्ड से मुख्य बटन (फ्यूज) गायब था। गर्मी के दिन बिना पंखे के बुरा हाल । थोड़ी देर में शायद दूसरे या तीसरे पीरियड में विज्ञान के सर हमे लेकर प्रयोगशाला में गए । जब हम लौट कर आये तो देखा कक्षा की सफाई हो रही थी। सफाई क्यों ? शायद बिजली का बोर्ड बनाने के कारण। खैर राहत की बात थी कि पंखे चालू हो गए थे। हमने जैसे ही भीतर घुसते ही राहत की सास ली, कुछ आवाजे आयी "ओह शिट"। हम समझ नही पाये कि क्या हुआ। पर नमन सर बोले,"शरारते अपने बलबूते पर की जानी चाहिए दुसरो के नाम की आड़ में नही। हम अब भी कुछ समझ नही पाये । सर ने पढ़ाना शुरू कर दिया।


 एक दिन जब प्रार्थना के बाद हमारा पी.टी. का पीरियड था, हम सब जैसे ही आकर कक्षा में बैठे। हमारे बैठने के साथ ही हर बेंच से पटाखे की आवाज आती। सब बच्चे बोलने लगे, "नमन ने किया है"। सर ने सबको शांत करवाया बोले, "हाँ नमन ने ही किया है"। हम सब ने घूम कर नमन को देखा उसका चेहरा भावशून्य था। वही अकड़ कि जाओ हाँ किया है जो करना हो कर लो। तब से सर मुस्कुराते हुए बोले, "अरे भाई उस नमन ने नही इस नमन ने"। हम सब सर को देखने लगे सर आप ? 


सर बोले, "यही होता आया है इस कक्षा में । आप लोग हर बात का जिम्मेदार नमन को ठहरा देते हो, बगैर उसका पक्ष जाने। कुछ बच्चो ने हर बात का जिम्मेदार उसको ठहराना क्या शुरू किया आप सबने आँख मूँद कर उसको गलत मान लिया । उससे दोस्ती तक तोड़ दी। बात करना भी बंद कर दिया। कोई भी अच्छा या बुरा नही होता है बस हमारा व्यवहार उसको ऐसा बनाता है। आपको मालूम है उस दिन आपकी क्लास के ही कुछ बच्चो ने आगे वाले पंखे पर खुजली का पावडर रख दिया था। वो सिर्फ लड़कियों और शिक्षक पर गिरता। वो तो अच्छा हुआ नमन ने उनकी बातें सुन ली और कोई पंखा चला ना सके इसलिए फ्यूज भी निकल दिया। उसकी बात पर कोई विश्वास ही नही करता है। इसलिए उसने किसी से भी नही बताया। वह तो मैंने देख लिया कि वह खुद से साफ करने जा रहा था। 


सब बच्चे फिर चिल्लाने लगे,"सर वो झूठ बोलता है वो साफ करने नही रखने जा रहा होगा"। 


सर बोले,"तुम लोगो के मन मे उसके खिलाफ इतना द्वेष क्यो है ? मैं नाम नही लूँगा पर यह तुम्हारे सहपाठी थे जो उससे जलते थे। मैं तुम्हारे सहपाठियों को भी दोष नही देता क्योंकि छोटी कक्षा में नमन के प्रथम आने पर उसके जीतने पर उन बच्चो के अभिभावक नमन से उनकी तुलना करते । उन्हें डांटते कि देखो गरीब होकर भी, सीमित सुविधाओं में भी वह कितना अच्छा कर रहा है। एक तुम लोग हो तुमको हम सारी सुविधाएं देते है फिर भी उससे पीछे हो। इस तरह की बातों ने बाल मन मे नमन के प्रति द्वेष की भावना भर दी। वो नमन को हरा नही पाए तो गिराने की चाले चलने लगे। अकेला तो शेर भी सियारों के झुंड से हार जाता है।


आज नमन ऐसा है तो वह इसलिए कि तुमने उसका साथ छोड़ दिया। तुम सब ने उस पर उसकी बातों पर विश्वास नही किया। 


नमन सर ने हम लोगों को देखते हुए कहा, "विद्या से सिर्फ डिग्री नही अच्छे संस्कार भी आने चाहिए। सही गलत के ज्ञान की क्षमता और सही का साथ देने का हिम्मत भी आनी चाहिए। जो आप लोगों में नही है"।


फिर पीछे की ओर कुछ अन्य लोगो को देखते हुए बोले,"प्रतियोगिता करना गलत नही है पर सामने वाले जो गिरा कर नही। जीतना अच्छी बात है पर सामने वाले को हरा कर नही"। 


हम असमंजस में सर को देख रहे थे यह क्या बात हुई भला।


सर बोले, "किसी जीतने के लिए उसे हराना जरूरी नही है। उसको हरा कर भी हम जीते हुए कहलायेंगे और उसको जीत कर भी हम जीते हुए कहलायेंगे। कहने को शब्दों का फेर है। पर सोच कर देखना एक में आप दुश्मन बना रहे है और एक में दोस्त"।


नमन सर हमारे साथ सिर्फ एक साल ही रह पाए । उसके बाद शायद उनको कही और नौकरी मिल गयी। शायद इसलिए कि, गर्मी की छुट्टियों के बाद जब हम उत्साह से झूमते हुए स्कूल आये वो हमें नही मिले। हमे उन्हें विदा करने का, यह कहने तक का कि "आप एक सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है" मौका नही मिला। 


आज मौका मिला है तो कहना चाहती हूँ, नमन सर आप सर्वश्रेष्ठ शिक्षक थे। आपने जो हमे सिखाया वो ज़िन्दगी का सबसे अच्छा पाठ था। आपने हमारे नजरिये को जागृत किया। सच झूठ को समझने का दृष्टिकोण दिया। नमन सर आपको हृदय से धन्यवाद।



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