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Vinay Panda

Drama

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Vinay Panda

Drama

घर पहले पहुंचा

घर पहले पहुंचा

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बचपन की बात बड़ी निराली होती है। जब उम्र मेरी 5-6 साल की थी।

पिता जी बॉम्बे रेलवे में सर्विस करते थे संयोग से वे भी उस समय छुट्टी लेकर घर आये थे !

घर के बाकी लोग जैसे बड़ी बहन स्कुल जाती थी। दिन भर मैं दोस्तों के साथ कांच की गोली, गुल्ली-डंडा और छुत्तुर वगैरह का खेल खेला करता था।

उम्र स्कुल की थी घर में मीटिंग हुयी कि आये हो तो इस बार मेरा नाम लिखवा दिया जाये !

दो दिन की शायद छुट्टी थी मगर घर की बात जानकर मेरी हालत खराब हो रही थी।

लोग तरह तरह की लालच और प्रलोभन दे रहे थे। मंगलवार का शुभ दिन मानकर पिता जी ने बुलाया और हमें स्कूल लेकर चल दिए।

घर से 500 मीटर की दूरी पर प्राइमरी स्कूल था। हम भी पीछे-पीछे चल दिए। मुंशी जी के टेबल पर डण्डा देखकर तो मैं डर गया। उधर नाम लिखा जाने लगा धीरे से हम सबकी नजरों से बचकर घर भाग आया !

पिता जी घर आये तो उन्हें पता चला मैं तो कब का घर आ गये, फिर क्या था पिता जी ने पुनः डण्डा लेकर खोजने लगे जिस डंडे को देखकर मैं भागा था।

किसी तरह स्कूल गये दो-तीन घण्टे तक मैं कैसे रहा उसकी अनुभूति मुझे है। कलम मेरी बयाँ नहीं कर सकती है उसे।

धीरे-धीरे आदत बनती गयी और मैं रोज स्कूल जाने लगा !

हाँ एक बात जरुर है उस समय आज की तरह कान्वेंट नहीं थे। लकड़ी की पट्टी पर बैटरी घिसकर उसे चमकाना फिर चाक से उस पर हम लोग लिखते थे।

वो सुविधा और समय आज की दृष्टि में सिर्फ एक कहानी बनकर रह गयी है।


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