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बाबा का प्रसाद
बाबा का प्रसाद
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© Bharti Suryavanshi

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आज तीन सालों बाद गौरी अपनी दोस्त माया से मिलने जा रही थी। मन में बड़ा उत्साह था। गाड़ी में बैठे-बैठे वो यही सोच रही थी कि माया पता नहीं क्यों इतनी अलग है लोग शहर में घर बनाते है और वो शहर से इतना दूर रहती है। लेकिन जब उसके ख्यालों को चीरते हुए गाड़ी अचानक रुकी तो उसकी आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गयी। अहमदाबाद शहर से कुछ दूर आये इस गाँव में बड़े और काफी सुन्दर घर थे गौरी का सामान ले चन्दन ने उन्हें अंदर आने को कहा। गौरी घर के इंटीरियर को देख काफी प्रभावित हुई... जितनी सादगी उतना ही सुन्दर घर था। उसने चन्दन से पूछा "माया कहाँ है?

"वो पूजा घर में है..." चन्दन ने पूजा घर की ओर इशारा कर कहा।

गौरी जैसे - जैसे पूजा घर की तरफ बढ़ रही थी ॐ नाम की गूँज और साफ़ हो गयी... पर माया को शिवलिंग पर दूध का अभिषेक करता देख वो बाहर ही रुक गई और "अंधविश्वास" थोड़ा गुस्से में बड़बड़ाती हुई सोफे में जाकर बैठ गयी। सामने अखबार रखा था उसे पढ़ते हुए भी गौरी के मन में ये ही ख्याल था कि "माया इतनी समझदार होते हुए भी कितनी अंधविश्वासी है...।

वैसे तो गौरी नास्तिक नहीं थी पर उसे ऐसी कई बातों से दिक्कत थी।

इतनी देर में माया आयी और उसने गौरी की तरफ एक ग्लास आगे बढ़ा कर कहा "लो बाबा का प्रसाद!"

"अंकल घर पे है... लेकिन प्रसाद किस चीज़ का दिया?" गौरी ने ग्लास ले पूछा।

"नहीं पापा नहीं है... भोलेनाथ बाबा का प्रसाद है। तुम अंदर आयी नहीं।" माया ने कहा। माया की बात सुन उलझन में पड़ गयी। शिवजी के प्रसाद में तो भांग होती है। और माया तो....

उसके बिन पूछे सवालों को माया समझ रही थी। लेकिन इस समय उसने चन्दन को आवाज़ दी और कहा "बाकी प्रसाद आसपास पड़ोसियों में दे दो...! फिर गौरी से कहा "यही सोच रही हो न कि भांग की जगह दूध क्यों लायी? मैं रोज़ शिवजी पर दूध से अभिषेक करती हूँ लेकिन उन पर चढ़ाये दूध को व्यर्थ नहीं करती। दूसरी तरफ एक बर्तन में ले सभी को प्रसाद स्वरूप में बाँट देती हूँ"

"ऐसा क्यों ?" गौरी ने पूछा।

"इसलिए क्योंकि ईश्वर को चढ़ाते ही हर चीज़ पवित्र हो जाती है। हम हर मिठाई या फलों को पहले उन्हें चढ़ाते हैं और मामूली फल उनकी मूरत को छू प्रसाद बन जाता है तो फिर शिवजी को अभिषेक किया दूध या पानी प्रसाद कैसे न हुआ। गौरी... प्रसाद जितने लोगो को दो अच्छा है ना...! मुझे इस अमृत का बह जाना ठीक नहीं लगता। श्रद्धा है मेरी.... अंधश्रद्धा नहीं...!

गौरी ने मुस्कुराते हुए ज़ोर से कहा "जय भोलेनाथ!" और प्रसाद ग्रहण किया।

प्रसाद विश्वास अमृत

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