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दो पहाड़
दो पहाड़
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© Supreet Saini

Tragedy

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यह कहानी दो पहाड़ों की है। वैसे तो यह दोनो साधारण पहाड़ों जैसे ही दिखते हैं, पर उनके जीवन मे अन्य पहाड़ों कि तुलना में एक महत्वपूर्ण अंतर था – दोनो, एक विशाल सागर के बीच मे खड़े थे। चारों ओर, जहाँ तक आँख दौड़ा कर देख सकते हैं, वहां तक देखें - सिर्फ नीले पानी का नीले आसमान से मिलन नज़र आएगा। बाकी दुनिया में क्या चल रहा है, इससे बेखबर, ये दोनो अपना जीवन सागर के बीच बिता रहे थे। बस गर्मी के दिन जब आते, तो उत्तर से आते परिंदे अपना सुख-दुःख बाँट कर जाते। छः महीने बाद, जब मौसम बदलता, तो वही परिंदे उत्तर जाते हुए दक्षिण का हाल बताते। क्योंकि सागर के बीच रहते दोनो को बाहर की कोई खबर नहीं होती - परिंदों का इंतज़ार वो बेसब्री से करते। जब आते-जाते पंछी उन्हें बताते की धरती पर ऐसे भी पहाड़ हैं, जो पंछियों की उड़ान से भी ऊंचे हैं, तो दोनो की आँखें फटी की फटी रह जाती। एक बार एक पंछी ने छोटे पहाड़ को रेगिस्तान के बारे मे बताया। जब शाम ढलने पर जब उसने बड़े पहाड़ को बताया कि लगता है दुनिया मे ऐसी जगह भी हैं जहाँ पानी की एक बूँद तक नहीं है, तो बड़ा पहाड़ चिढ़ कर बोला, "कुछ भी मान जाएगा क्या तू? ज़रा अपने आस-पास नज़र दौड़ा कर देख और बता की पानी के अलावा तुझे क्या दिखाई देता है? अक्ल से भी काम ले लिया कर कभी।" छोटे को जब भी अपनी मूर्खता पर शर्म आती, तो वो सर झुका कर पानी की ओर देखने लगता।

छोटे ने जन्म के कुछ समय बाद ही बढ़ना बंद कर दिया था - परिणामस्वरूप, पानी की सतह से कुछ २० फुट ऊंचाई पर उसका शिखर था, उसके विपरीत बड़ा काफी हट्टा-कट्टा था । अपनी १०० फ़ीट की ऊँचाई से दूर-दूर तक देख कर छोटे को दुनिया की होनी-अनहोनी बताता।

पानी की सतह के नज़दीक छोटे पहाड़ में कुछ खांचे बन रखे थे। जब पानी की लहर आती, उसके साथ आयी मछलियाँ उन खांचों मे फंस जातीं। इस तरह जो भी उन्हें मिलता, मिल-बाँट कर खा लेते। बड़ा पहाड़ थोड़ा भाग्यशाली था - मछलियों के खानों के साथ-साथ उस पर कुछ फलों के पेड़ लग गए थे। पेड़ साल भर फलों से लदे रहते - और फल भी ऐसे की सब आते-जाते पंछी कहते की ऐसे फल उन्होंने पृथ्वी पर कहीं नहीं खाये हैं। जब छोटा इस टिपण्णी पर अपना शक व्यक्त करता, तो झुंझलाये हुए बड़े से डांट खाता। खैर, ये नोक-झोंक और लड़ाई तो सिर्फ सतह पर थी, दोनो प्यार से हज़ारों सालों से अपनी छोटी सी दुनिया बिता रहे थे।

फिर एक दिन ऐसा कुछ हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। रात के अंधेरे मे, पानी की सतह पर चमकता, टिमटिमाता, रौशनी से जगमगाता दानव दोनो पहाड़ों को नज़र आया। पानी पर चलते इस दानव का निचला हिस्सा भूरे रंग का था, और ऊपर की ओर, उस पर कुछ सफ़ेद रंग का लहरा रहा था। पहाड़ों की जिज्ञासा बढ़ी - अपने अस्तित्व मे उन्होंने ऐसा कुछ कभी नहीं देखा था। इधर-उधर पंछियों से पूछने पर पता चला की दानव का नाम "नाव" है, जो पृथ्वी पर रहने वाले एक जानवर ने पानी पर घूमने के लिए बनाई है।

"मछलियों ने तो पानी पर घूमने के लिए ऐसा कभी कुछ नहीं बनाया, तो इस मुर्ख को ये बनाने की क्या ज़रुरत थी?",छोटे ने ख़बर लाये पंछी से पूछा।

सवाल सुन बड़ा झिनझिना उठा, और माथे पर हाथ पीटते हुए बोला, "तुम अपनी बेवकूफी का प्रमाण इतने सार्वजनिक तरीके से मत दिया करो। मछलियों पानी मे तैर सकती हैं, कहीं भी जा सकती हैं, उन्हें इस "नाव" की क्या ज़रुरत है?" छोटे ने शर्म से आँखें पानी की ओर की।

पंछियों से ये भी पता चला कि ये जानवर काफी चालाक मालूम होता है। इसने धरती पर धीरे-धीरे अपना कब्ज़ा बना लिया है, और कई जगह तो मीलों तक कोई इसकी रज़ामंदी के बिना प्रवेश भी नहीं कर सकता। उसकी लालच की भूख अब उसे ज़मीन से पानी की ओर ले आई है। छोटे और बड़े ने एक दूसरे की ओर चिंता से देखा। अपने अस्तित्व मे उन्होंने तूफ़ान, बिजली, नाराज़ समुद्र आदि देख रखे थे, पर यह नई मुसीबत का रूप कुछ अलग था।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, "नाव" के दर्शन बढ़ते गए। शुरू-शुरू मे ५०-१०० साल मे एक-आध "नाव" नज़र आती, पर उसके बाद तो जैसे उनका तांता ही लग गया| वह कभी भूरे रंग की होती, कभी काले की; कही छोटी होती, कभी बड़ी; कभी दिन के उजाले मे आती, कभी रात के अंधेरे मे, कभी उत्तर से तो कभी दक्षिण - देखते ही देखते हर कुछ हफ़्तों मे उनकी नज़र से "नाव" गुज़रती। दोनो अक्सर बातें करते कि काश हम भी "नाव" कि तरह पानी की सतह पर घूम सकते।

पर धीरे-धीरे सागर का मौसम बदला, और इस बदलाव को सबसे पहले पंछियों ने महसूस किया। उन्होंने बताया कि कभी-कभी "नाव" के नज़दीक उड़ते-उड़ते उन्हें "नाव" से फेकी गई कोई चीज़ पेट पर आ कर लगती है, जिससे मौत निश्चित है। इस "नाव" ने शांत सागर मे भी अपना प्रभाव ज़ाहिर किया। अक्सर राह गुज़रती "नाव" से एक पत्थर सा गोला निकलता और जहाँ गिरता वहां ज़ोरदार धमाका कर सब तहस-नहस कर देता। जाने वो गोला क्या चीज़ थी, पर पंछियों ने बताया कि गोले का प्रभाव ज़मीन पर पानी से कहीं दर्दनाक था।

पंछियों की बातें अक्सर पहाड़ों को अविश्वसनीय लगती। उन दिनों वह शाम को ढलते सूरज को देखते हुए सोचते थे कि पानी पर चलने वाला दानव बनाने वाला, और पानी और धरती पर आग के गोले फेंकने वाला ये जानवर कैसा दिखता होगा? पर कोई निष्कर्ष नहीं निकलता - सोचते-सोचते दोनो की आँख लग जाती।

एक रात की बात है - दोनो सो रहे थे। अचानक हवा में उड़ता हुआ एक विशाल गोला आकर ठीक छोटे पहाड़ के सर पर गिरा। आग की एक ऐसी लहर उठी कि रात के सोते काले सागर पर कुछ क्षणों के लिए एक पीली चादर चढ़ गई। जब अंततः धुआँ साफ़ हुआ तो घबराए हुए बड़े ने छोटे कि ओर देखा, तो वहां सिर्फ पानी था । दूर जाती "नाव" देख वो अपना संसार उजाड़ने के स्रोत को समझ गया। उदास बड़ा आज भी पानी की परछाई मे छोटे को ढूंढ़ता है।

दानव नाव मुसीबत

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