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Dr.Purnima Rai

Abstract

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Dr.Purnima Rai

Abstract

आज मन फिर उदास है।

आज मन फिर उदास है।

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आज मन फिर उदास है।

तन्हाई भी आसपास है।।

कोरे कागज़ पर हर सू,

तेरी याद का अहसास है।।

भोर की धूप चुभने लगी,

खोया मन का विश्वास है।।

उजाले को घेरा है तमस् ने

रूठे दिन का हुआ आभास है।।

घुट-घुट कर न जी "पूर्णिमा "

तुम्हीं से तो जग को आस है।।


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