ययाति और देवयानी
ययाति और देवयानी
भाग 45
देवयानी ने लाल कमल पुष्पों के आभूषण पहन लिये थे। लाल कमल पुष्पों से निकलने वाली प्रकाश किरणों से देवयानी का तन चमकने लगा था। उसके चेहरे की कांति लाल कमल के मुकुट से जगमगा उठी थी। इस श्रंगार के पश्चात देवयानी की आकांक्षा हुई कि वह स्वयं को आईने में देखे। किन्तु वहां आईना कहां था ? तब उसे कुछ याद आया और उसने कच से कहा। "कुछ पल आंखें खोलकर स्थिर खड़े रहना।"
कच को कुछ समझ नहीं आया कि देवयानी उसे ऐसा क्यों कह रही है ? लेकिन जब देवयानी उसकी आंखों में झांककर उनमें अपनी छवि देखने लगी तब कच को पता चला। वह देवयानी की बुद्धिमानी की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका।
"कैसी लग रही हूं मैं?" देवयानी का यह प्रश्न कच के लिए अप्रत्याशित था। कच ने आज तक कभी किसी की सुन्दरता पर कोई टिप्पणी नहीं की थी। वह सोचने लगा कि देवयानी को क्या कहूं ? लेकिन कुछ न कुछ तो कहना ही था इसलिए वह बोला
"एक तो तुम्हारा सौन्दर्य और उस पर लाल कमल पुष्पों के आभूषण। यह तो सोने पे सुहागा वाली बात हो गई। मैं एक ब्रह्मचरी हूं, श्रंगार रस को क्या जानूं ? मैं इससे अधिक और क्या कह सकता हूं?" कच ने जैसे तैसे कहा।
"वैसे तो इतने विद्वान बनते हो, फिर श्रंगार रस से वैराग्य क्यों ? क्या जीवन भर अविवाहित रहने का किसी को वचन दे दिया है?" देवयानी ने मुस्कुराते हुए और उपालंभ देते हुए बहुत सुंदर कटाक्ष किया था। कच ने ऐसे समय चुप रहना ही उचित समझा। देवयानी की इच्छा थी कि कच उसके रूप सौन्दर्य की इतनी प्रशंसा करे कि वह उससे तृप्त हो जाये। उसने उसे उकसाते हुए कहा
"लगता है कि तुम्हें मेरा सौन्दर्य रुचिकर नहीं लगा।"
"ये किसने कहा कि मुझे तुम्हारा सौन्दर्य रुचिकर नहीं लगा ? तुम तो इन्द्राणी शची और कामदेव की पत्नी रति से भी बहुत अधिक सुन्दर हो। मैंने तो उन दोनों को देवलोक में अनेक बार देखा है। वे दोनों सुन्दरियां तुम्हारे समक्ष कांतिहीन लगती हैं। शेष अप्सराओं की तो बात ही क्या है ? तुम्हारा रूप , सौन्दर्य, यौवन सब अतुल्य है , अद्भुत है और अद्वितीय है। मेरी बात का विश्वास करो यानी।" कच ने धैर्य पूर्वक कहा।
"सच?" और यह कहते हुए देवयानी ने उल्लास से कच का हाथ अपने हाथों में ले लिया। वह कच का हाथ अपने अधरों तक ले जा रही थी कि अचानक कच ने अपना हाथ उसके हाथ से छुड़ाकर कहा
"रात्रि बहुत हो गई है यानी। आचार्य आपका इंतजार कर रहे होंगे। मैं भी अपनी कुटिया में जा रहा हूं। मेरे साथी मुझे वहां नहीं पाकर चिंतित हो रहे होंगे।" कहकर कच तेजी से चला गया।
कच का यूं अचानक उस समय हाथ छुड़ाकर जाना जब देवयानी उन्हें चूमना चाहती थी, देवयानी को नहीं सुहाया पर देवयानी क्या करती ? निराश देवयानी भी अपनी कुटिया की ओर चल दी। रास्ते में उसे साधिका आती हुई दिखाई दी। वह इधर ही आ रही थी। देवयानी समझ गई कि पिता श्री ने उसे भेजा होगा। पास आने पर वह बोली
"आप कहां चली गई थीं ? आपके लिए आचार्य कितना परेशान हैं, क्या आपको पता है?"
देवयानी साधिका के साथ परिहास करना चाहती थी इसलिए उसने इंकार कर दिया। तब साधिका बोली "आचार्य ने अभी तक भोजन भी ग्रहण नहीं किया है। वे आपकी राह देख रहे हैं देवी।"
"तुमने उन्हें भोजन क्यों नहीं करवाया अब तक?"
"आपके बिना भोजन करते हैं क्या वे?"
प्रश्न के जवाब में प्रश्न करने से सामने वाला व्यक्ति निरुत्तर हो जाता है। साधिका के द्वारा प्रति प्रश्न करने से देवयानी निरुत्तर हो गई। दोनों तेज तेज कदमों से अपनी कुटिया पर आ गई। कुटिया में शुक्राचार्य देवयानी का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने देवयानी को लाल कमल पुष्पों के आभूषणों से सुसज्जित देखा तो उनकी आंखें विस्मित हो गईं। उन आभूषणों से देवयानी कोई स्वर्ग की परी लग रही थी। शुक्राचार्य ने लाल कमल देखकर कहा
"कहां से आए हैं ये लाल कमल पुष्प ? कितने अलौकिक हैं ये"
देवयानी कहना चाह रही थी कि इन्हें मेरे लिए कच लेकर आया है। लेकिन इससे उनका अगला प्रश्न भयानक सिद्ध हो सकता था इसलिए देवयानी ने बड़ी कुशलता से उत्तर दिया
"मंदिर में रखे हुए थे ये लाल कमल , मैंने इनके आभूषण बना लिए और उन्हें अपने शरीर पर धारण कर लिया।"
"मंदिर में कौन रख गया होगा इन्हें ? ये तो सागर के बीचों बीच बने द्वीप के सरोवर में खिलते हैं। लोग कहते है कि उस सरोवर की रक्षा एक यक्ष करता है।"
"हां पिता श्री , संभवत: वही रख गये हों इन्हें वहां पर ? और तो कौन ला सकता है इन लाल कमलों को उस यक्ष से चुराकर?"
देवयानी ने प्रथम बार अपने पिता से असत्य संभाषण किया था। ये प्रेम भी न जाने क्या क्या करवा देता है ? सर्वप्रथम यह अपने परिजनों से असत्य बोलना सिखाता है। तत्पश्चात अपने प्रेमी से चोरी चोरी मिलना सिखाता है। देवयानी को स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि किस तरह वह अपने जनक , गुरू से मृषा भाषण कर रही थी। परन्तु मृषा भाषण करते समय अपराध बोध अवश्य हो रहा था उसके हृदय में। वह चाहती थी कि उसके पिता उसके प्रेम के बारे में जान नहीं पायें। वह तो स्वयं नहीं जानती थी कि वह कच से प्रेम करने लगी है। पर इतना अवश्य जानती थी कि अब उसकी यादों में कच का सदैव डेरा रहता है। उसके मन मस्तिष्क से कच बाहर जाता ही नहीं है। संभवत: प्रेम का प्रथम लक्षण यही है।
देवयानी दौड़कर अपने कक्ष में चली गई और आईने के सम्मुख खड़ी होकर स्वयं को देखने लगी। कक्ष में दीपक का मध्यम प्रकाश था। उस हलके प्रकाश में लाल कमलों का प्रकाश भी सम्मिलित हो जाने से उसके चेहरे पर सूर्य की लालिमा सी आ गई थी। वह भोर की प्रथम किरण सी दैदीप्यमान हो रही थी। वह कच के बनाए हुए सुन्दर सुन्दर आभूषण आईने में देखने लगी। कितना सुन्दर मुकुट बनाया है कच ने ? उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता में वह विजेता रही हो और निर्णायकों ने उसके सिर पर यह मुकुट सजा दिया हो। गले में पड़ा हुआ लाल कमलों का यह हार दोनों कुचों के मध्य कितना सुशोभित हो रहा है ? देवयानी उसे छूकर देख रही थी। इन पुष्पों की सुगंध से सारी कुटिया महक रही थी। इस महक में उसके प्रेम की महक भी सम्मिलित थी जिसने इस सुगंध को दिव्य बना दिया था।
उसने झटपट वे आभूषण उतारे और बाहर आ गई। शुक्राचार्य ने अभी तक भोजन नहीं किया था। देवयानी ने चुपचाप रहकर उन्हें भोजन परोसा। शुक्राचार्य ने भोजन करना प्रारंभ कर दिया। वे कहने लगे "आज तो गजब हो गया। कच पता नहीं कहां चला गया था। मुझे कच की चिंता रहती है देव। वह देव है और यहां दानवों के मध्य एकाकी रह रहा है। पता नहीं ये दानव क्या कर बैठे उसके साथ ? इसलिए मैं उसे कभी आश्रम से बाहर नहीं जाने देता हूं। लेकिन वह आज किसी को बिना बताये ही कहीं चला गया था। जब वह वापिस आ गया तब मुझे चैन मिला। क्या तुम्हारी भेंट हुई थी कच से?" शुक्राचार्य ने देवयानी की ओर देखा।
शुक्राचार्य की बात सुनकर देवयानी अवाक् रह गई। यह तो उसने सोचा ही नहीं था कि पिता श्री कच का इतना ध्यान रखते हैं। क्या पता उन्हें ज्ञात हो कि वह मंदिर में कच के साथ थी ? फिर भी उसने साहस कर कह दिया "नहीं, मेरी कच से आज कोई भेंट नहीं हुई।" देवयानी असत्य पर असत्य बोले जा रही थी। शुक्राचार्य उसके चेहरे के भाव देखते रह गये। एक युवा पुत्री से वह यह भी पूछ नहीं सकते थे कि उसके मन में क्या चल रहा है ? यदि जयंती होती तो वह देवयानी के मन के भाव जान सकती थी किन्तु वह अब कहां है , यह बात दैव के अतिरिक्त अन्य किसी को ज्ञात नहीं है।
शुक्राचार्य ने भोजन समाप्त किया और शयन हेतु अपने कक्ष में चले गए। उधर देवयानी की क्षुधा तो कच के प्रेम में पहले ही तृप्त हो गई थी। उसे अब एकान्त सुहाने लगा था जहां वह अपने प्रेमी से मन ही मन कुछ वार्तालाप कर सके। वह भी अपने कक्ष में जाकर लेट गई और कच की यादों में खो गई।
श्री हरि

