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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Classics

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Classics

ययाति और देवयानी , भाग 81

ययाति और देवयानी , भाग 81

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महाराज वृषपर्वा और महारानी प्रियंवदा को अचेतन अवस्था में महल में लाया गया था । राज वैद्य उनकी चिकित्सा कर रहे थे और सेवक सेविकाऐं उनकी परिचर्या करने में जुट गये थे । सबके सम्मिलित प्रयासों से महाराज और महारानी की चेतना लौट आई । महाराज जैसे ही जाग्रत अवस्था में आए , वैसे ही वे जोर जोर से रोने लगे ।

"मुझे अचेत ही रहने दो । मुझे होश में क्यों लाये हो ? बेहोशी में कम से कम मुझे अपनी बरबादी का खयाल तो नहीं आ रहा था । अब मैं कैसे धैर्य धारण करूं ? मेरी शर्मिष्ठा ने क्या अपराध किया है जो उसे इतना कठोर दंड सुना दिया है । हे प्रभु, आप इतने निष्ठुर क्यों हो ? मेरे अपराधों की सजा आप बेचारी शर्मिष्ठा को क्यों दे रहे हो ? क्या बिगाड़ा है उसने आपका ? मैंने तो सुना है कि आप बहुत दयालु हैं , भक्त वत्सल हैं । मेरी शर्मिष्ठा ने तो किसी का कुछ अपराध नहीं किया है । वह तो दीन दुखियों पर सदैव ममता लुटाती आई है । फिर आप उसे ऐसा कठोर दंड क्यों दे रहे हैं ? आप हमेशा देवताओं का ही पक्ष लेते हैं । क्या हम आपकी संतान नहीं हैं ? क्या आप हमारे भगवान नहीं हैं ? हम पर दया करो प्रभु, इस विपत्ति से बचा लो हमें प्रभु" । 

महाराज के शब्दों में व्यथा, दर्द , करुणा , निराशा , प्रार्थना सब कुछ था । 


महाराज का रुदन सुनकर महारानी की भी रुलाई फूट पड़ी । वे भी महाराज के साथ साथ रोने लगीं और देवयानी को कोसने लगी "आस्तीन की सांप निकली ये देवयानी । जब ये पांच साल की थी तब इसकी मां चली गई थी । तब मैंने इसे अपनी पुत्री की तरह ममत्व दिया, वात्सल्य दिया था । और आज यह शर्मिष्ठा को अपनी दासी बनने के लिए कह रही है । ऐसा कहते हुए इसे जरा सी भी लाज नहीं आई ? किसी ने सही कहा है कि छोटों को प्रभुता अति शीघ्र आती है । मुझे ज्ञात नहीं था कि यह नागिन मेरे ही घर को डस लेगी । यदि ज्ञात होता तो मैं इसे कभी अपने पास फटकने भी नहीं देती । मेरी पुत्री का जीवन बर्बाद करके तुझे क्या मिलेगा देवयानी ? इससे तो अच्छा होता कि तू उसे मृत्युदंड ही दे देती । तिल तिल कर मरने को तो नहीं मिलता उसे" ? महारानी की चीखों में महाराज का क्रंदन कहीं विलुप्त हो गया था । 


वे लोग शोक संतप्त होकर कभी देवयानी को कोस रहे थे तो कभी भाग्य को । इन दोनों में कौन अधिक दोषी है इसका निर्धारण नहीं हो पा रहा था । महारानी देवयानी को दोषी ठहरा रही थी लेकिन महाराज भाग्य को दोषी ठहरा रहे थे । दोनों के अपने अपने तर्क थे मगर इस समस्या का कोई समाधान नजर नहीं आ रहा था । एक तरफ पुत्री मोह था तो दूसरी ओर दानव जाति पर अस्तित्व का संकट । दोनों ही स्थितियों में उनकी पराजय निश्चित थी । किंकर्त्तव्यविमूढ की स्थिति में आपस में ही वाद विवाद करने में व्यस्त थे दोनों । इतने में सेवक सेविकाऐं भोजन ले आये लेकिन उसे ग्रहण कौन करे ? महारानी प्रियंवदा महाराज से विनती करने लगीं "नाथ, भोजन तो ग्रहण कीजिए । भोजन से कैसा वैर ? भोजन ने तो कुछ नहीं बिगाड़ा है अपना ? फिर उस पर क्रोध क्यों ? लीजिए, मैं अपने हाथ से भोजन कराती हूं आज । वैसे भी आपको अपने हाथ से भोजन कराये हुए बहुत समय हो गया है" । महारानी प्रियंवदा महाराज के पास बैठकर बोली । 


इस भयावह स्थिति में भी महारानी का प्रेम देखकर महाराज वृषपर्वा के अधरों पर हलकी सी मुस्कान आ गई । "आप स्वयं तो भोजन कर नहीं रही हैं , और मुझे भोजन करने का आग्रह कर रही हैं । इतना विशाल हृदय कहां से लाती है नारी शक्ति ? क्या आप भी भोजन में मेरा साथ देंगी" ? महाराज ने महारानी की आंखों में देखते हुए पूछा । 


महारानी महाराज का आशय समझ गईं और कहने लगी "यह कोई राजसभा नहीं है स्वामी जहां वाद विवाद हो । यह महल है महल । और महल में सब पर महारानी का हुक्म चलता है । आप पर भी मेरा ही हुक्म चलेगा यहां" । अब महारानी के मुख पर प्रेम से सनी चाशनी की तरह मुस्कान चिपकी हुई थी जिसके आकर्षण में महाराज खिंचते चले जा रहे थे । 

महाराज भी उनकी आंखों में डूबते हुए बोले 

"हम तो आपके प्रेम रूपी अमृत से जीवित हैं प्रिये वरना पता नहीं हमारा क्या होता ? हम आपको आदेश तो दे ही नहीं सकते हैं । हम तो केवल निवेदन ही कर सकते हैं , यदि आप इसे स्वीकार कर लें" महाराज ने दोनों हाथ जोड़ दिये । 


महाराज के द्वारा दोनों हाथ जोड़कर अपनी बात कहना महारानी को पसंद नहीं आया "हजार बार निवेदन कर दिया है कि आप हमें हाथ नहीं जोड़ा करें । पर आपको तो हमें सताने में बहुत आनंद आता है ना ? जाओ, हम आपसे बात नहीं करते" । 

उन्हें थोड़ी देर में ही समझ में आ गया कि उन्होंने यह कहकर "हम आपसे बात नहीं करते" अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है । इसलिए वे झट से बोली "नहीं, हम आपके साथ भोजन ग्रहण नहीं करेंगे" । और उन्होंने अपना मुंह फेर लिया । 

महाराज ने महारानी का हाथ पकड़कर अपने पास बैठा लिया और बड़े प्यार से दोनों एक दूसरे को भोजन कराने लगे । संकट के समय यदि दोनों पति पत्नी एक दूजे का साथ दें तो वह संकट संकट नहीं लगता है । थोड़ी देर के लिए ही सही, दोनों उस दंड को भूल गये और भोजन करने में व्यस्त हो गये । 


भोजन के पश्चात वे पुन: उसी बिन्दु पर चिंतन मनन करने लगे । उनकी न तो शर्मिष्ठा को कुछ बताने की हिम्मत हो रही थी और न ही शुक्राचार्य तथा देवयानी को कुछ कहने की । शुक्राचार्य और देवयानी को कुछ कहने का अब कोई अर्थ भी नहीं रह गया था । बहुत सोचने विचारने के पश्चात भी उन्हें कोई हल नजर नहीं आ रहा था । धीरे धीरे शाम हो गई और उन्हें पता ही नहीं चला । 


"प्रणाम पिता श्री और प्रणाम माते" । शर्मिष्ठा की आवाज सुनकर दोनों चौंक उठे । सामने शर्मिष्ठा खड़ी थी । वह सहज लग रही थी । महाराज और महारानी ने सोचा कि अभी शर्मिष्ठा को देवयानी द्वारा सुनाये गये दंड का पता नहीं चला है इसलिए वह सहज लग रही है । वे दोनों भी सहज दिखने का प्रयास करते हुए बोले "आओ पुत्री, कैसी हो" ? 

"जी, मैं अच्छी हूं । आप दोनों कैसे हैं " ?

"जब बच्चे हो जाते हैं तो मां बाप अपने बच्चों की प्रसन्नता में प्रसन्नता और उनके शोक में शोक ग्रस्त होते हैं । यदि तुम अच्छी हो तो हम दोनों भी सकुशल ही हैं । कहो, आज कैसे आना हुआ" ? महाराज ने सामान्य होने का नाटक किया । 


"तात् , मुझे सब पता चल गया है इसलिए पहेलियां बुझाने की आवश्यकता नहीं है । मैं आपका दर्द समझ सकती हूं । वात्सल्य में डूबे आप दोनों ने देवयानी द्वारा निर्धारित दण्ड अब तक मुझे नहीं सुनाया है लेकिन मुझे सब पता है । माते, मैं आपकी पुत्री हूं । आप दोनों का दुख मैं कैसे देख सकती हूं ? इसलिए मैंने तय कर लिया है कि मैं देवयानी की दासी बन जाऊंगी" । शर्मिष्ठा ने अपनी गर्दन , मुंह और आंखें नीचे झुकाते हुए कहा । 


शर्मिष्ठा के शब्द हथौड़े की भांति पड़े थे दोनों के सिरों पर । दोनों एक साथ बोल उठे "क्या" ? 

"तात श्री और माते ! मैं आपकी पुत्री हूं इस नाते मेरे भी कुछ कर्तव्य हैं आपके प्रति । उन्हें पूरा करना मेरा उत्तरदायित्व है । मैं इस राज्य की एक नागरिक भी हूं और एक नागरिक होने के नाते मेरा इस राज्य के प्रति जो उत्तरदायित्व है उसे मैं हर संभव पूरा करने का प्रयास करूंगी । आप दोनों की पुत्री हूं तो मुझ में स्वाभिमान स्वाभाविक रूप से है इसलिए मैं देवयानी की दासी बनकर आपको और इस राज्य को संकट से उबारना चाहती हूं । इससे आपके वचन का मान भी रह जाएगा" । इतना कहकर शर्मिष्ठा वहां से चली गई । 



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