ये आईने में कौन है ?
ये आईने में कौन है ?
"मेरा मन विचलित था। बस कुछ सोचे जा रहा था। क्या ? नहीं पता। क्या वो मेरी इच्छा थी जो मैने मार रखी थी या मेरा ईमान जो मैं संभाल नहींं पाया या फिर मेरा मेरी गलतियों से पर्दा उठ जाने का खौफ ?"
ये सोचता हुआ ,विकल्प अपनी छत की सीढियां चढ़ने लगा। इतने में उसके फोन की घंटी बजी!
उसे मालूम था ये आर्या है, ना कोई जवाब था उसके पास न ही कोई व्याख्या। क्या सुनाता इस बार विकल्प?
कौन सा झूठ, कौन सी कहानी?
उसने अपने फोन को बंद कर अपनी जेब में डाला और उदास होकर सीढ़ी वापस चढ़ने लगा।
जब विकल्प छत पर पहुंचा तो तेज़ हवाएं चल रही थी, सूरज ढल रहा था। मानो दो मिंटो के लिए उसे ऐसा लगा वो उसकी जिंदगी का सूरज है जो ढल रहा है।
झटके में उसकी आंखें धीरे से पलक झपकते हुए बंद हुई, और उसे सब याद आ गया।
कैसे एक वक्त था जब वो सिर्फ एक मासूम बच्चा था। सवेरे सुबह तयार हो के विद्यालय जाना। पापा का उसको बस अड्डे तक छोड़ने जाना, लौटते वक्त दोस्तों के साथ गोले खाना, शाम होते ही पापा के राजा बेटा की तरह पढ़ने बैठ जाना। हमेशा सब सही करने वाला आदर्शवादी" विकल्प"।
बस इतने में छत पर बादल छा चुके थे और बिजली कड़की, उसने पल भर के लिए आंखें खोली और वापस झपका ली। जिंदगी का दूसरा चरण उसकी आंखों के सामने घूमना शुरू हुआ।
उम्र बढ़ रही थी और विकल्प की चाह भी। "मैं ही हमेशा अच्छा क्यों बनूं?" सब मज़े करते, मैं सिर्फ पढ़ाई। सबके कई लड़के लड़कियां दोस्त हैं, मैं ही अकेला रह जाता हूं। मेरे ईमान ने मुझे क्या ही दिया है आज तक? अब मैं भी जिंदगी जीना चाहता हूं, मज़े करना चाहता हूं।
और आर्या, हां वो मेरी दोस्त है, पर आर्या जैसी लड़की मेरी दोस्त से ज्यादा क्या ही बन सकती है, उसमे मासूमियत है, वो अच्छी है, मेरा बहुत ख्याल भी रखती है, पर मैं विकल्प हूं और मेरा विकल्प ऐसा होना चाहिए जो पूरी दुनिया देखे। और आर्या का विकल्प मेरा सम्मान घटाएगा।"
ये थी विकल्प की बढ़ती उम्र की घटती सोचने की क्षमता।
आर्या काफी छोटी उम्र से विकल्प की बहुत अच्छी दोस्त थी। विकल्प की मां के गुज़रने से ले के उसके बाकी बच्चों से अलग स्वभाव, हर राज़ को वो समझती थी और हर रूप में उससे खुशी से स्वीकारती थी।
"मगर शायद मैं आर्या की कद्र कभी नहीं समझ पाया।"
मेरी उम्र के साथ मेरी सोच का मुझमें परिवर्तन लाना, आर्या का मेरी जिंदगी में आना, मेरा आर्या को चाहना फिर भी अपनी सोच, खुद के बनाए हुए चौखटे में आर्या के ना समाने के कारण, उसे न अपनाना, और फिर न अपना कर भी उसे छोड़ ना पाना।
और इन सब सिलसिलों में लगातार की गई मेरी गलतियां सब बर्बाद करती गई।
मैंने कुछ खोखला सा समाज को दिखाने के लिए ढूंढ तो लिया पर आर्या मेरे ज़ेहन से गई ही नई। चाहे कितने नए किरदार आ गए। ना मैं उन किरदारों की मुलाकात कभी आर्या से करवाने की हिम्मत जुटा पाया ना ही कभी आर्या को छोड़ पाया। शायद मुझे ऐसा ही अच्छा लगने लगा था। दो जिंदगियां जीना। एक जिसमे विकल्प का हर विकल्प सबसे शानदार था, सर्वोत्तम। मेरी विकल्प इस दुनिया में आर्या नहीं रानी थी।
और मेरी दूसरी दुनिया जहां मैं, मैं था। मेरी और आर्या की दुनिया। मैंने अपनी पूरी कोशिश की, कि आर्या और रानी दोनो कभी रूबरू ना हो, क्योंकि मैं जानता था जिस दिन मेरी दोनो दुनिया टकराएगी, प्रलय आएगा।
मैं किस दुनिया में सच्चा था ये कोई नहीं समझ पाएगा।
जब आर्या मुझसे सवाल करेगी, जब रानी मुझे गुनेहगार कहेगी, मैं आईने में देख खुद से एक सवाल करूंगा,
"ये आईने में कौन है?"
पर झूठ और फरेब की उम्र लंबी होती ही नहींं।
आज आर्या सब जानती है। और मैं उससे नज़रे मिलाने लायक भी नहींं। शायद यही मेरी कहानी का अंत है, और मेरा भी होना चाहिए। मैंने आंखें खोल कर छत से नीचे झांकते हुए मन में अपना निर्णय ले लिया। कदम धीरे धीरे आगे लेने लगा।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई "म्याऊ म्याऊ" ये कोई और नहींं मेरी बिल्ली थी, मैं रुक गया। मेरी बिल्ली मुझे देखते ही मेरे ऊपर चढ़ कर लिपट गई और मैं उसे हल्के हल्के सहलाने लगा। मैं रुका कुछ देर सोचा, शायद अपनी जिंदगी खत्म कर लेना समाधान नहींं। माफी और भरपाई रानी और आर्या के प्रति अब मेरा फर्ज़ है और मुझे सज़ा देना उनका अधिकार। और ना मैं उनका हक छीन सकता ना उनका अधिकार ले कर हमेशा के लिए जा सकता। और ना ही मैं अपना फर्ज अधुरा छोड़ कर जाना चाहता।
और इसी सोच के साथ में कदम वापस ले कर नीचे अपने कमरे की तरफ चला गया।
कमरे में जा कर, मैं जिस आईने से डर रहा था उसमे खुद को देखा, और सोचा , ये कौन है इस शीशे में? मैं तो ऐसा नहींं था। मैं हर दोष का हिसाब चुकाऊंगा।
हर गलती को सुधारूंगा मैं हर माफी को पाने का प्रयत्न करूंगा। मैं प्रलय से बर्बाद हुई दुनिया को फिर से इस बार सच्चाई के तिनकों से बिना अपनी छोटी सोच को बीच में लाए बनाऊंगा। रानी की हर सज़ा के लिए तयार रहूंगा। और आर्या का विकल्प गलत नहींं था ये साबित कर उसका सम्मान लौटाऊंगा।
मैं तब तक हारूंगा नहींं जब तक शीशे में "विकल्प" है ये आवाज़ मेरे दिल से ना निकले।

