वोह आखिरी दिन
वोह आखिरी दिन
वोह आखिरी दिन
लेखक: विजय शर्मा एर्री
उस सुबह शहर कुछ ज़्यादा ही शांत था।
ऐसी खामोशी, जो कानों को नहीं—सीधे दिल को सुनाई देती है।
अनिरुद्ध खिड़की के पास खड़ा था। सामने वही पुरानी सड़क, वही नीम का पेड़, वही चाय की दुकान—सब कुछ वैसा ही, पर आज सब बदला-बदला सा लग रहा था। घड़ी की सुइयाँ चल रही थीं, पर समय जैसे थम गया हो।
आज… उसका आख़िरी दिन था।
अनिरुद्ध कभी बहुत बोलता था। कॉलेज में उसे “रेडियो” कहा जाता था। हँसी, तर्क, बहस—सब उसका शौक़ था। पर ज़िंदगी ने धीरे-धीरे उसके शब्द छीन लिए।
पहले नौकरी गई।
फिर पिता।
फिर माँ का लंबा इलाज।
और अंत में—आवाज़।
डॉक्टर ने कहा था,
“यह बीमारी शरीर से ज़्यादा आत्मा को खा जाती है।”
वह बोल सकता था, पर बोलना छोड़ चुका था।
खामोशी उसकी ढाल बन गई थी।
“चाय ठंडी हो जाएगी।”
पीछे से आवाज़ आई।
निशा।
उसकी पत्नी।
अनिरुद्ध ने पलटकर देखा—नज़रें मिलीं, पर शब्द नहीं। निशा को अब इस खामोशी की आदत हो चुकी थी। वह जानती थी—अनिरुद्ध बोलता नहीं, पर सुनता सब कुछ है।
“आज… कुछ अलग लग रहा है,” निशा ने धीरे से कहा।
अनिरुद्ध मुस्कुराया। वही हल्की, टूटी-सी मुस्कान।
निशा ने कप टेबल पर रखा।
“डॉक्टर की अपॉइंटमेंट है। भूल मत जाना।”
अनिरुद्ध ने सिर हिलाया।
पर वह जानता था—आज डॉक्टर नहीं, सच से मिलने जाना है।
सड़क पर निकलते ही उसे एहसास हुआ कि दुनिया कितनी शोरगुल से भरी है—और वह कितना अकेला।
लोग हँस रहे थे।
फोन पर चिल्ला रहे थे।
गाड़ियों के हॉर्न—मानो किसी प्रतियोगिता में हों।
और वह—
अपने भीतर के सन्नाटे के साथ चल रहा था।
नीम के पेड़ के नीचे वही बूढ़ा चायवाला बैठा था।
“बाबूजी, आज बिना बोले चाय पियोगे?”
उसने हँसकर कहा।
अनिरुद्ध ठिठक गया।
पहली बार किसी ने उसकी खामोशी को नाम दिया था।
वह चाय की दुकान पर बैठ गया। जेब से काग़ज़ निकाला और लिखा—
“आज बोलना सीखने आया हूँ।”
बूढ़े की आँखें भर आईं।
“बोलने से पहले जीना सीखना पड़ता है बाबूजी।”
डॉक्टर के क्लिनिक में वही सफ़ेद दीवारें, वही फाइलों की गंध।
डॉक्टर शर्मा ने फाइल पलटी।
“अनिरुद्ध, शारीरिक रूप से तुम ठीक हो। पर… तुमने खुद को सज़ा दे रखी है।”
अनिरुद्ध ने नज़रें झुका लीं।
डॉक्टर बोले,
“आज तुम्हें एक फैसला लेना होगा—
या तो खामोशी के साथ मरते रहो…
या डर के बावजूद बोलो।”
अनिरुद्ध ने पहली बार होंठ खोले—पर आवाज़ नहीं निकली।
डॉक्टर ने एक काग़ज़ बढ़ाया।
“लिखो—आज क्या कहना चाहते हो?”
अनिरुद्ध ने लिखा—
“मैं थक गया हूँ।”
शाम ढलने लगी थी।
अनिरुद्ध घर लौटा, पर सीधे छत पर चला गया।
नीचे निशा रसोई में थी।
उसे कुछ अजीब सा महसूस हुआ—जैसे कोई अनकही विदाई हवा में तैर रही हो।
छत पर खड़े होकर अनिरुद्ध ने शहर को देखा।
हर खिड़की में एक कहानी थी—
किसी की हँसी,
किसी का झगड़ा,
किसी की उम्मीद।
और उसकी?
एक अधूरी चुप्पी।
वह जेब से वही काग़ज़ निकाला—
और फाड़ दिया।
फिर…
उसने गहरी साँस ली।
“निशा…”
आवाज़ काँपी।
पर आवाज़ थी।
नीचे निशा ठिठक गई।
उसने ऊपर देखा।
“मैं… डरता था,”
अनिरुद्ध बोला,
“कि अगर बोलूँगा तो फिर हार जाऊँगा।
पर खामोशी ने मुझे पहले ही हरा दिया।”
निशा की आँखों से आँसू बह निकले।
“आज… खामोशी का अंतिम दिन है,”
अनिरुद्ध ने कहा।
निशा दौड़ती हुई ऊपर आई।
दोनों देर तक बिना कुछ कहे खड़े रहे—पर अब यह खामोशी बोझ नहीं थी।
“तुम्हें पता है,” निशा ने कहा,
“मैं हर दिन तुम्हारे बोलने का इंतज़ार करती थी।”
अनिरुद्ध ने उसका हाथ थामा।
“और मैं… सुनने का।”
रात को पहली बार घर में रेडियो चला।
वही पुराना गाना—
“कुछ तो लोग कहेंगे…”
अनिरुद्ध मुस्कुराया।
खामोशी चली गई थी।
हमेशा के लिए नहीं—
पर अब वह उसकी मालिक नहीं थी।
अगली सुबह
शहर वैसा ही था।
शोर भी था।
पर अनिरुद्ध के भीतर—
एक शांत, जीवित आवाज़ थी।
और यही था
खामोशी का अंतिम दिन।
