suryendu mishra

Horror Thriller

4.4  

suryendu mishra

Horror Thriller

वो आदमी

वो आदमी

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मध्य-जनवरी का महीना रहा होगा। सर्दी अपने पूरे शबाब पर थी लेकिन कोहरा सुबह शाम के वक्त ही प्रभावी था। यह गेहूं की सिंचाई का मौसम था गोया किसान अपने अपने खेतों की सिंचाई में व्यस्त थे।

हमारे कुछ खेत गांव से लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर पड़ते थे। उस समय सिंचाई के साधन ज्यादा नहीं थे इसलिए उस मंझरिया में जब कोई पंपसेट जाता था तो सब लोग उसी से बारी बारी से अपने खेतों की सिंचाई कर लेते थे । मंझरिया का यह इलाका काफी दुर्गम था और उधर एक ताल को पार करके जाना होता था ।

उस समय चोरों का भी बड़ा आतंक था इसलिए हमारे घर के लोगों ने भी वहां पर एक अस्थाई झोपड़ी डाल रखी थी ताकि पंपसेट की निगरानी की जा सके।

हमारे गेहूं के खेतों से सटे एक विशालकाय खरहुल हुआ करता था वह खरहुल क्या था अफ्रीकी शबाना के घास के मैदानों जैसा था जिसमें हाथी भी गुम हो जाए।

उसी से सटे एक छोर पर हमारा बोरिंग था ।हमारे गेहूं के खेत भी वहीं से शुरू होते थे ।

उस समय मेरी उम्र कुछ यही 12 या 13 साल रही होगी। उस दिन ड्यूटी पर मैं और मेरे दादाजी थे।

शाम के करीब 8:00 बजे थे। दादा जी ने मुझसे कहा - " तुम कुछ देर यहां पर देखो मैं भोजन करके आता हूं।"

मैंने कहा-" ठीक है आप जाइए ,मैं यहां देख लूंगा"

दादा जी ने कहा-" ठीक है तुम डरना मत मैं अभी किसी को भेजता हूं।"

इतना कहकर दादाजी एक लाठी और टॉर्च हमें देकर चले गये।

उस दिन पूर्णिमा थी और कुहरा ज्यादा नहीं था इसलिए सब कुछ साफ-साफ दिखता था, पंपसेट की फट फट की आवाज रात की नीरवता को भंग करती थी। दूर से कभी-कभी सियारों के 'हुआ हुआ' की आवाज सुनाई पड़ जाती थी।

दादाजी के जाने के बाद लगभग आधे घंटे ही बीते होंगे की खरहुल में किसी के चलने की आहट सुनाई पड़ी। मैंने मैंने चारों तरफ टार्च घुमा कर देखा तो कोई नजर नहीं आया। मैंने सोचा कि कोई जानवर होगा और निश्चिंत होकर बहते हुए पानी पर अपना ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करनें लगा ।

अभी कुछ पल ही बीते होंगे कि मेरे पीछे एक आदमी के धीमें से खांसने की आवाज सुनाई पड़ी। मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो पगड़ी बांधे एक बूढ़ा सा आदमी मेरे बिल्कुल पास ही खड़ा था।

मैं बचपन मे भी डरपोक बिल्कुल नहीं था । और मैंने सोचा दादा जी ने किसी को भेजा होगा। उसकी ओर देखनें लगा। हालांकि उसकी ओर देखनें में मुझे खासी दिक्कत हो रही थी। अभी मैं उससे कुछ पूछता कि उसनें ही

मुझसे पूछ लिया - "तुम मिसिर जी के पोते हो ना। "

मुझे उस आदमी की पगड़ी और धोती तो दिखाई पड़ रही थी लेकिन उसका चेहरा साफ नजर नहीं आ रहा था । वो शायद इसलिए कि वाह चांद की तरफ ही खड़ा था । टॉर्च जलाने पर उसे बुरा लगता इसलिए मैं नहीं जला सकता था।

मैंने थोड़ा सकपकाते हुए कहा - "जी हां कहिए।"

उसने फिर पूछा -"मिसिर जी कहां रहते हैं आजकल मिलते नहीं हैं।"

उस बुड्ढे आदमी के प्रति तरह-तरह के विचार मेरे मन में तेजी से आ जा रहे थे शायद वो इसे भांप गया था।

"मैं कोई चोर नहीं हूं बेटा, तुम्हारे दादा जी का दोस्त हूं इसलिए पूछ रहा हूं"

"जी"

मैं सिर्फ इतना ही बोल पाया। मेरी तो हालत पतली हो रही थी।

फिर वह बोला -" बेटा मैं जा रहा हूं, अपने दादाजी से कहना पगड़ी वाले बाबा आए थे ।वह समझ जाएंगे।"

इतना कह कर मेरे जवाब की प्रतीक्षा किये बिना जाने लगा । लेकिन मुझे देख कर बड़ा अजीब लगा कि वह आदमी मेड़ की बजाय खेतों के बीचो बीच पानी से होकर जा रहा था । उससे भी बड़े आश्चर्य की बात यह थी कि पानी में चलने के बावजूद पानी में कोई हलचल नजर नहीं आ रही थी । ऐसा लग रहा था जैसे वह पानी के ऊपर ऊपर चल रहा हो। वो जल्दी मेरी आंखों से ओझल हो गया।

मैं इसी उधेड़बुन में पड़ा कि वह आदमी था या कुछ और । तभी चाचा के गुनगुनाने की आवाज दूर से सुनाई पड़ी। उनके पहुंचने से मेरा साहस थोड़ा बढ़ गया और मैंने पूरी घटना को विस्तार से उन्हें एक ही सांस में बयान कर दिया।

चाचा जी हंसने लगे और बोले- " घबराने की कोई बात नहीं है वो कोई और नहीं , मसान बाबा थे। पंप सेट चालू करने के पहले उनका चढ़ावा देना हम लोग भूल गए थे।

याद दिलाने आये होंगे।"

मैंने आशंका जताई , "अब क्या होगा ? लगता है वह नाराज हो गये है।"

चाचा ने गुड़ और तंबाकू निकालते हुए कहा-

" घबराओ नहीं मैं अभी उनको चढ़ावा चढ़ाता हूं फिर कोई बात नहीं होगी"

यह कहते हुए चाचा ने अपने झोले से चढ़ावे का सामान निकाला और जय मसान बाबा कहते हुए उसे मशीन के पास रख दिया। 

अब हम लोग थोड़ा निश्चिंत हो गए थे। लेकिन इस घटना के बाद हम दोनों लोग इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए की रात को वहां सो सके ।

चाचा ने जल्दी से कपड़ो को लपेट कर एक पुतला बनाया और उसे रजाई ओढ़ाकर बिस्तर पर लिटा दिया और जल्दी जल्दी पंपसेट बंद करके हमदोनों वहां से नौ दो ग्यारह हो गए।

घर आने पर दादाजी को मैंने पूरी घटना बतायी तो बोले- 

"हां वह मसान बाबा ही होंगे उनसे अक्सर मेरी बातचीत होती है कभी परेशान होता हूं और याद करता हूं तो प्रकट होकर मेरी सहायता करते हैं।"

मैं सोच रहा था कि लगता है, इनको परा- भौतिक शक्तियों से बातचीत की आदत सी हो गयी है तभी ये इसे एक समान्य घटना मान रहे है।

  बाद में उन्होंने बताया बहुत साल पहले अपने बेटे और बहू से तंग वे आकर मंझरिया के वीराने में एक पीपल के पेड़ नीचे अपनी झोपड़ी बनाकर रहने लगे थे । गांव के लोग अक्सर खाने पीने का सामान उन्हें पहुंचाया करते थे और उनके प्रति बहुत श्रद्धा रखते थे क्योंकि वो हमारे खेतों की देखभाल के साथ भविष्य में होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी भी किया करते थे। धीरे धीरे लोग उन्हें मसान बाबा के नाम से जानने लगे थे।

 कुछ वर्षों बाद उनकी मृत्यु हो गई तो वही पीपल के नीचे उनकी समाधि बना दी गई। तब से उनको मंझरिया का संरक्षक माना जाता है और वे गांव वालों की हमेशा सहायता ही करते हैं। 

मुझे तो उस रात बिल्कुल भी नीद नहीं आयी। मैं रात भर उस आदमी के पानी के ऊपर चलने की घटना को सोच सोच के परेशान होता रहा। इसका विज्ञान तो आज भी मेरी समझ में नहीं आ सका है क्योंकि मैंने उसे खुली आँखों से देखा था।


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