वो २१ दिन (भाग - २)
वो २१ दिन (भाग - २)
प्रिंसिपल मैडम के कहने से मैं पूजा को मेरा विद्यालय दिखाने के ले गया, जब तक पूजा की मम्मी प्रवेश की सारी प्रक्रिया पूर्ण कर ले।
मैंने पूजा को अपने बारे में बताया और उसने मुझे थोड़ा बहुत अपने बारे में बताया, उसके बारे में जानकर मेरे मन में एक ख़्याल आया और मैं उसको पूछा की यहा आने का कारण क्या था?
उसने मुझे कहा कि उसके पापा का तबादला यहां अहमदाबाद में हुआ था उसकी वजह से उनको यहां आना पड़ा।
उसके बाद मैंने उसको अपना क्लास दिखाया जहां पर हमें आगे साथ मिलकर पढ़ाई करनी थी, उसने क्लास देखा और कहा की बढ़िया है। फिर अचानक उसने मुझे वाशरूम के बारे में मुझे पूछा तो में उसको वहाँ लेकर गया।
फिर हम दोनों को हमारे विद्यालय का खेल का मैदान दिखाया तो उसने कहा की यह तो काफ़ी बड़ा है। उसने मुझे यहां की सबसे फेमस जगह के बारे में पूछा, मैंने उसको कुछ जगह के बारे में बताया।
उसने मुझसे मेरे परिवार के बारे में पूछा और कहा की अगर इस रविवार को मैं उसको गुरुद्वारा लेकर जा सकता हूं? क्योंकि उसको बचपन से गुरुद्वारा जाने की इच्छा थी पर वो कभी जा नहीं पाई, मैंने उसको हाँ कह दिया और फिर हम वापिस आ गए।
प्रिंसिपल मैडम ने पूजा को पूछा की विद्यालय कैसा लगा? पूजा ने कहा कि बहुत ही अच्छा है, मुझे यहां प्रवेश देने के लिए आपका खूब धन्यवाद। ( पूजा ने उसको मम्मी को बताया की इस रविवार का मेरा उसका प्लान क्या है, तो उसकी मम्मी ने उसको मेरे साथ जाने की रजा दी।)
रविवार के दिन पूजा के पापा मुझे और उसको लेकर गुरुद्वारा आए, क्योंकि पूजा के पापा को भी गुरुद्वारा देखने की इच्छा थी पर वो कभी देख नहीं पाएं थे। पूजा के पापा अतुल भाई वैसे तो बहुत ही खुश थे क्योंकि उनकी लड़की को मेरे जैसा अच्छा दोस्त मिला था, और पूजा एक ही हफ़्ते में मेरे साथ ऐसे घुल मिल गई थी की उनकी सारी फिक्र ख़तम हो गई थी।
पूजा के पापा ने मुझे धन्यवाद कहा की अगर मैं नहीं होता तो पूजा को यहां पर अच्छा नहीं लगता था। फिर मैंने उनको कहा की यह तो मेरा फ़र्ज़ था की में आपकी मदद करूं आखिर मुझे भी तो पूजा जैसी दोस्त मिली थी।
हम सब एक जगह पर नाश्ता करने के लिए क्योंकि पूजा को भूख लगी थी, तो मैंने उनको बोला की यहां पर अच्छा खाना मिलता है। उसके बाद वो लोग मुझे घर पर छोड़ने के लिए आए, मैंने पूजा के पापा और मेरे पापा की जान पहचान करवाई।
अतुल भाई को देखकर मेरे पापा ने कहा की आइए आइए अतुल भाई, मैं और पूजा यह सुनकर दंग रह गए। पापा ने कहा की हम दोनों एक ही दफ़्तर में काम करते है, उनका डिपार्टमेंट अलग है और मेरा अलग है और हम दोनों अच्छे दोस्त भी है।
मेरे पापा और पूजा के पापा की जान पहचान से पूजा ने कहा कि अब तो हम दोस्त से बहुत अच्छे दोस्त बन गए, क्योंकि अब तो हमारे पापा भी एक दूसरे के अच्छे दोस्त है। पूजा ने मुझे कहा की अब तो मेरा यहां आने में और भी अच्छा लगेगा और हम दोनों साथ में ही विद्यालय जाएंगे और साथ ही वापिस आएंगे।
(क्रमश: ३ भाग में)

