उगता सूरज उम्म्मीद का
उगता सूरज उम्म्मीद का
13 बर्ष कीउम्र में दुल्हन बनी बालिका बधू कांति ने आगे पढ़ने की आज्ञा माँगी।उसके माता पिता ने ज्योतिषी के बताए उपाय की वजह से जल्दी विवाह कर दिया ।पंडित के मुताबिक कांति की जान को खतरा था।
पर किसलिये ससुरजी ने हँस के पूंछा पिता जी गाँव में बस आंठवे तक था और ये शहर है तो मैं नॉलेज के लिए पढूंगी।परिवार संयुक्त था और प्रगतिवादी भी ।
समधी को आपत्ति हुई कि बाबूजी लोग क्या कहेंगेक्या कहेंगे समधी बाबूराम शर्मा की बहू स्कूल जा रही है अब वह आपकी बेटी नहीं है और कृष्णा भी तो नौकरी के साथ बारहवीं में पढ़ रहा है।बहू बेटा कल तैयार हो जाना किताबें लेने चलना है तुम जियो अपने सपने।
ब्राह्मण होने के कारण बिरादरी और आस पड़ोस में थोड़ी और मायके वालों को भी ज़्यादा आपत्ति थी पर दादीसास दादा ससुर और सास को आपत्ति न थी। अब बेटी के साथ बहू का भी टिफिन बनता।अब बहू बारहवीं कक्षा मे पास हो चुकी थी।
पति की बैंक में नौकरी वह भी जयपुर में लग जाने पर बहू भी चली गयी। पति को अक्सर फाइल में मदद करती तो एक दिन मैनेजर ने पूछा बैंक में नौकरी करोगी बेटा।
ससुर जी भी कैशियर ही थे बैंक में पर जब वो जयपुर आये तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मैनेजर को कहा कि मेरी बहू चाहे जितना पढ़े पढ़ाऊंगा पर शर्मा खानदान की बहू नौकरी नहीं करेगी अभी मैं और मेरा बेटा सक्षम है।
परन्तु होनी को कुछ और मंज़ूर था मात्र अट्ठाइस बर्ष की आयु में कांति के पति का हार्ट फेल से देहांत हो गया। अब उसकी गोद में चार बेटियाँ भी थी सबसे छोटी तो मात्र डेढ़ बर्ष की ही थी।शर्मा जी की तो इतने बड़े दुःख से कमर ही टूट गयी।अब उन्होंने खुद बहू की नौकरी के प्रयास किये।
पति के स्थान पर जब अनुकम्पा नियुक्ति के लिए ससुरजी उसे बैंक ले गए तो कुर्सी पे बैठकर पहले फूट फूट रोये कि बहू आज तेरी मुँह दिखाई के उपहार ने तुझे यह कुर्सी दी है।
नहीं तो आज तुम इस मेज़ से उस मेज़ पर रजिस्टर और पानी के गिलास पहुँचा रहीं होती।अब कुछ दिन निकल गए।
शाम को बैंक से घर पहुंचने पर कांति को पिताजी ने बुलाया, बहू ने देखा तो पिताजी के हाथ में बी ए की व्यक्तिगत परीक्षा के फॉर्म थे। अब दिन भर नौकरी और रात में पढ़ाई साथ ही बच्चों की देखभाल ने उसे सोने सा निखार दिया था।
कई बार लोगों और नाते रिश्तेदारों ने उन पर फब्तियाँ भी कसीं कि शर्मा जी सदमे से पागल हो गए है पर वह हम लोगों को अपनी एक ही पंक्ति खड़ा हिमालय बता रहा है डरो न आँधी पानी में,
कहकर खुद के साथ बहू और बच्चियों को हौसला देते, माँ के बैंक जाने के बाद मासूम बच्चियों को अच्छी से अच्छी किताबें दिलाते जिससे हर बच्ची अपनी माँ से भी आगे निकले।
एम् ए और अन्य बैंक इम्तहान देने के बाद हेड कैशियर के पद पर करीब चौंतीस बर्ष बेदाग नौकरी और उत्तम सेवा देंने के बाद पिछले साल वो सेवानिवृत्त हुईं।
उन्होंने अपनी बेटियोँ को भी ऊँची शिक्षा दी। जी हाँ पाठकों यह मेरी माँ की कहानी और मेरे बचपन की सच्चाई है एक बहू के सपनों को उसके पिता नहीं ससुर ने पँख दिए और उड़ान दी।
अब दुःख की काली रात छंट चुकी थी और उम्मीद का नया सूरज उग रहा था जीवन में।
