ठोकरें
ठोकरें
"ऐसा कब तक चलेगा बेटा, घर पर ध्यान है न दुकान पर।मैं आखिर कब तक तुम सब का बोझ ढोता रहूँ।" जनक ने तनुज को समझाते हुए कहा।
"आखिर मेरी भी कोई जिंदगी है पापा!मैंने तो आप के यहां पैदा हो कर गुनाह ही कर दिया।न कुछ करने की आजादी है न कुछ कहने की।बस गूंगे की तरह सर झुकाकर बैठे रहो और बस हाँ हूँ करते रहो। अब इस तरह रहना मेरे बस की बात नहीं।"तनुज ने झल्लाते हुए कहा।
बेटे के ये बोल जनक को अंदर तक बेध गए।मगर फिर कड़वा घूंट पीकर थोड़ा संयत हुए बोले,"आज तक तुम्हारी ही तो चली है बेटा, और हर बार अपने शौक पूरे करने के चक्कर में सिवाय नुकसान के कुछ नहीं किया।आखिर जो कुछ है सब तुम्हारा ही तो है।"
"मेरा,हूँ!" तनुज हर संकोच को किनारे करते हुए बोला।"आज तक ऐसा एक भी काम हुआ है जिसमें आप ने टांग न अड़ाई हो। बेहतर होता मुझे सब खुद ही करने दिया होता।इतना नुकसान तो नहीं होता।"
तनुज के ये बोल जनक के हृदय को चीर गए।मगर फिर भी हिम्मत कर के बोले,"मैंने जिंदगी में बहुत ठोकरें खाई हैं।यूं ही धूप में बाल सफेद नहीं किए।अच्छा होता कि जिंदगी की ठोकरों ने जो अनुभव मुझे दिया है उसका तुम फायदा उठाते मगर तुम मुझे ही........."
"क्या मुझे ही...... पापा! ठोकरें खाकर आपका अनुभव मेरे किसी काम का नहीं। बेहतर यही है कि अब मेरे हिस्से की ठोकरें भी आप ही खाएं। ताकि मैं अपनी जिंदगी आजादी से जी सकूं।
