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Krishna Khatri

Drama

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Krishna Khatri

Drama

तब

तब

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मैं अक्सर अपनी कमियों, कमजोरियों को लेकर परेशान और दुखी रहता हूं, मुझे हमेशा लगता है कि ऊपरवाले ने मेरे साथ अन्याय किया है ! लोगों के पास क्या-क्या नहीं है, धन-दौलत, आलीशान मकान , दो-दो, तीन-तीन कारें, क्या कुछ नहीं दिया, फिर भी दिये जाता है ! सामने वाले को ही देखो - ओहोहो, दरवाजे के सामने खड़ी दो चमचमाती विदेशी कारें, यार, देखकर कलेजे में हूक-सी उठती है काश अपने राम के पास भी एक ही सही पर ऐसी कार तो होती ! लेकिन यहां तो नैनो भी नहीं है, मरा स्कूटर है वो भी बाबा आदम के जमाने का !

ऊपर से यह स्कूटर नखरे भी बहुत ज्यादा ही दिखाता है, इतना चालू है बस मत पूछो किक मार-मार के हालत खस्ता हो जाती है मगर ये जनाब तो टस से मस नहीं होते, मजाल है जो आसानी से हिल जाए ! फिर भी इस कमबख्त को सीने से लगाए बैठा हूं यही सोच कर कि कम से कम कहने को ही सही स्कूटर तो है ! जब भी कहीं जाना होता है बीवी बच्चों को उस दिन रामायण - महाभारत सब एक साथ हो जाती है बीवी की शिकायत भी बड़ी धांसू रहती है - देखो, गुप्ताजी के पास कितनी अच्छी कार है और तुम्हारे पास तो मरा स्कूटर भी एकदम खटारा, अरे खटारा क्या भंगार है भंगार ! उसकी इस तरह की जली-कटी बातें सुनकर तो मुझे इतना गुस्सा आता है, इतना गुस्सा आता कि उसका सिर फोड़ा दूं लेकिन उससे कुछ कहने की ज़रा भी हिम्मत नहीं होती और ऊपर से अपने सुख-दुख का साथी स्कूटर भी भंगार ही लगने लगता है, सोचा भंगार वाले को दे दूं !

वैसे भी चालू होने में मेरी तो जान ही ले लेता है उस पर मेहरबानी तो देखिए - कभी-कभी तो जनाब रास्ते में ही नाराज हो जाते हैं फिर मेरी शामत ! इसलिए भंगार में देने का खयाल आया, अच्छा सरला ने गुस्से में ही सही पर पते की बात कही है सो देकर निजात पाऊं और अपनी जान छुडाऊं ! इसलिए बुलाया कबाड़ी को, वो ले जाने लगा तो मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था जैसे मेरी कोई बहुत ही प्रिय और कीमती वस्तु ले जा रहा था । बात भी सही थी वाकई मुझे बहुत ही प्रिय था दिल पर पत्थर रखकर दिया तो लगा रोक लूं, मना कर दूं कबाड़ी वाले को, तब मेरी अपनी ही सोच ने जैसे कसके चांटा मारा और सवाल किया -जब तुमने अपने बूढ़े पिता को उनके अपने ही घर से बेघर कर दिया था तब तो तुम्हें इतनी तकलीफ़ नहीं हुई थी बल्कि तब तो तुमने छुटकारे की सांस ली थी वे कितनी उदास और मायूसी भरी नजरों से तुम्हें और घर को ताक रहे थे, अपनी आंखें भी पोंछते जा रहे थे, तुम्हारी मां को मरे अभी दो महीने ही हुए थे और तुमने उनसे उनका घर भी अपने नाम करवा कर छीन लिया एक वही तो उनका अपना था जिसके साथ उनकी कितनी-कितनी यादें जुड़ी हुई थी मगर तुमने तो उन्हें अपनी यादों के साथ रहने ही नहीं दिया ! इससे ज्यादा किसी की बेबसी क्या हो सकती है और वो उम्र के आखिरी पड़ाव पर जब इन्सान की वैसे भी शारीरिक क्षमताएं क्षीण होने लगती है तब उसको अपने बच्चों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तभी अपने इन बच्चो द्वारा अपनों से ही अलग कर दिया जाता है जैसे कोई अपने ही शरीर के किसी हिस्से से अलग कर दिया जाए ! 

 सच कहूं - आज पहली बार अहसास जागा है कि मैंने अपने पिताजी को घर से निकाल दिया, अच्छा नहीं किया ! उनके साथ कितना बड़ा अन्याय तो किया ही अत्याचार भी किया ! कल को मेरे बच्चे भी मेरे साथ ऐसा ही करे तो। इतिहास खुद को दोहराता ही है । इस ख्याल मात्र से मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे दिल कांप उठा । मेरे पिताजी की उदास नजरें मुझसे बार-बार एक ही सवाल कर रही थी - क्या मैं तुम पर बोझ हूं ? यकीन जानिए अब मुझसे ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था । भीतर ही भीतर मेरा अंतस्थ रो रहा था लेकिन अब यह रोना बाहर आने को कलप रहा था मैं संभाल नहीं पाया और रुलाई अपने आप बांध तोड़ कर बह निकली जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी । आखिरकार रोना थमा तो पहला ख्याल आया कि पिताजी को वापस घर ले आऊंगा। जब पत्नी सरला से कहा तब वो सुनकर नाराज़ हो गई कि बड़ी मुश्किल से छुटकारा मिला था। अब वापस मेरी छाती पर मूंग दलेंगे । तुम तो काम पर चले जाओगे, सब करना तो मुझे ही पड़ेगा !

तुम क्या करती हो उनका ? खाना ही तो बनाती हो पर वो तो सबके साथ ही बन जाता है केवल दो रोटी ही तो अतिरिक्त बनाती हो ! बाकी तो अपना सारा काम वे खुद ही तो करते हैं ! तुम्हारे कहने पे मैं उन्हें छोड़ आया था वृद्धाश्रम में लेकिन अब नहीं। वापस उन्हें उनके घर लेकर आऊंगा और वो भी आज ही। यही मेरा प्रायश्चित है !

मैं उनके लिए रोटी भी नहीं बनाऊंगी।

मत बनाना, मैं बना लूंगा । मेरे एक सवाल का ईमानदारी से जवाब देना - यही सब देखकर हमारे बच्चे भी हमारे साथ ही यही सब तो करेंगे, हमारी जगह भी कहीं किसी वृद्धाश्रम में होगी। तब ? और वाकई इस ‘ तब ‘ ने उसे झंझोडकर रख दिया गहरी सोच में पड़ गई। कुछ देर यूं ही सोच में डूबी रही, फिर जाने किस ख्याल से आंखें भी बहती जा रही थी। कुछ देर बाद सयंत होने के बाद उठी और चाय बना लाई।  मुझे देके अपनी चाय लेकर बिना कुछ कहे ही अपने कमरे में चली गई मैं परेशान था कि क्या करूं। कुछ समझ में भी नहीं आ रहा था ! ऐसे ही वहीं सोफे पर पसर गया जाने कब आंख लग गई ! काफी देर बाद सरला ने मुझे हिला-हिला कर जगाया और बोली - अभी हम दोनों जायेंगे !

मैंने अपनी सवालिया निगाहें उसके चेहरे पर टिका दी !

ओ होओ। भूल गए ? अजी, पापाजी को लेने ! मैं खुशी मिश्रित आश्चर्य में उसका चेहरा देखे जा रहा था। यह सरला कोई और ही थी !


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