स्वप्न भंग
स्वप्न भंग
सफलता और असफलता में बाल भर का अंतर होता है ।ज़रा सा अनिश्चय ज़रा सी भूल काफी बड़ा अन्तर पैदा कर देती है। अच्छा शिक्षक हो तो उत्साह प्रेरणा देकर उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर देता है और संवेदना हीन शिक्षक मेधावी शिष्य का मार्ग भी अवरुद्ध कर देता है।
रजनी बचपन से ही मेधावी थी ,कुशाग्र बुद्धि थी। उसमें अध्ययन की पिपासा थी, जिज्ञासा थी। बचपन में जिस स्कूल में पढ़ी,उसमें नैतिक संस्कार, राष्ट्रप्रेम एवं अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति प्रेम व सम्मान की नींव पड़ी। वहॉं कक्षा दो में एक पुस्तक थी, “स्वदेश गीतावलि” जिसमें बहुत अच्छी अच्छी कविताएँ थी जो रजनी को कंठस्थ हो गईं थीं। उसे पढ़कर प्रकृति प्रेम और फूलों के प्रति प्रेम जगता था। यथा-
है गुलाब फूलों का राजा,
लिली फूल की रानी।
बेला जूही चमेली मुँगरा,
रात समय की शान।
लेकर गंध केवड़े की वह,
पवन फिरे हैरान। “
अपने देश के प्रति प्रेम जगानेवाली कविताएँ थीं-
महिमंडल में सुन्दरतर यह,
भारतवर्ष हमारा है।
हम कोकिलें इसी उपवन की,
यह उद्यान हमारा है। “
रजनी यही सब यादकर पढ़कर बड़ी हो रही थी।सब अध्यापिकाओं की प्रशंसा उसे प्राप्त थी। उसकी तीसरी कक्षा में देशप्रेम की एक कविता थी-
“यह मातृ भूमि मेरी ,यह पितृ भूमि मेरी।
गाते जहॉं देवेश सदा सरगम हैं।
जिसकी रज में लोट लोट कर बड़े हुए हैं,
घुटनें के बल सरक सरक कर खड़े हुए हैं।
यह मातृभूमि मेरी यह पितृभूमि मेरी। “
रजनी के मन में डाक्टरी पढ़ने का सपना पलने लगा था। उसके बड़े भाई डाक्टर थे, मेडिकल कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे। वे उससे कहते थे,”तुम डाक्टरी पढ़ना, तुम बहुत अच्छा करोगी। तुम आओगी तो मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा। मन लगाकर पढ़ो और प्रतियोगिता परीक्षा में अच्छा करना। “
डाक्टरी की सुन्दर सुन्दर चिकने पृष्ठ वाली किताबें रजनी देखती तो सोचती हमारी कक्षा की किताबें इतने सुन्दर पृष्ठों की क्यों नहीं हैं। रजनी और मेहनत से पढ़ने लगी। गणित उसका बहुत अच्छा हो गया,अंग्रेज़ी भी अच्छी हो गई। उसने आठवीं कक्षा पास कर ली तो नवीं कक्षा में दूसरे स्कूल में जाना पड़ा क्योंकि उसका यह पहला स्कूल आठवीं कक्षा तक ही था। नवीं कक्षा में विषय चुनने की बारी आई तो उसने गणित को चुना,सोचा आगे इन्टर में विज्ञान की पढ़ाई शुरू होगी तो इससे सहायता मिलेगी। उसने निश्चय किया था डाक्टर बनने का।
नवीं कक्षा में गणित की क्लास का पहला दिन था । गणित की टीचर मिस दास पढ़ाने आईं। उन्होंने सवाल पूछने शुरू किये। उन्होंने ऐलजेब्रा का एक सवाल पूछा और रजनी से ही पूछ लिया, उससे उत्तर बताने के लिये कहा। रजनी के पहिले स्कूल में ऐलजेब्रा (बीज गणित) और रेखा गणित की पढ़ाई नहीं होती थी, केवल गणित पढ़ाया जाता था चक्रवर्ती की पुस्तक से। वह जवाब नहीं दे पाई तो उन्होंने डॉंटना शुरू कर दिया। पहले दिन ही करारी डॉंट पड़ी।
रजनी ने कहा भी कि,” वह नई नई इस स्कूल में आई है, उसके पहिले वाले स्कूल में ऐलजेब्रा नहीं पढ़ाया जाता था ,इसलिये अभी वह इसका उत्तर नहीं बता सकती”।
पर उन्होंने कुछ भी सुनने से इन्कार कर दिया और डॉंटती चली गईं -“तुम इतने साधारण से सवाल का भी जवाब नहीं दे सकती तो आगे कैसे पढ़ोगी ?”
रजनी को बहुत कोफ़्त हुआ। पहली बार उसे ऐसी झिड़की मिली थी , जबकि इसमें उसका कुछ क़सूर नहीं था। उसके पहलेवाले स्कूल में यह विषय था ही नहीं और टीचर उसे डॉंट रहीं थीं कि उसे कुछ नहीं आता। टीचर के इस व्यवहार से उसे बहुत दु:ख हुआ। कितनी उम्मीदें लेकर उसने नवीं कक्षा में गणित विषय चुना था और अब इतनी डॉंट पड़ रही है।
उसने उसी समय गणित की क्लास छोड़ने का निश्चय कर लिया और दूसरे दिन वह आर्ट की क्लास में जाकर बैठ गई। आर्ट की टीचर बहुत ख़ुशनुमा प्यारे से कोमल स्वभाव की टीचर थीं और अपनी क्लास में उसे देखकर ख़ुश हुईं। रजनी की ड्राइंग सुधरती चली गई और नम्बर भी अच्छे मिलते।
पर रजनी का डाक्टरी में जाने का सपना टूट गया। आगे साईन्स लेकर पढ़ने का सपना चूर हो गया। जीवन की दिशा ही बदल गई। उसमें हिम्मत ही नहीं रही कि आगे साईन्स विषय चला पायेगी। जबकि वह कुशाग्र बुद्धि थी और हाईस्कूल में फ़र्स्ट डिविज़न भी लाई थी।
क्लास में शिक्षक कैसे मिलते हैं इसका छात्र के जीवन मे दूरगामी असर होता है। बचपन में अच्छे शिक्षक मिले तो पढ़ाई मे रुचि जाग्रत हुई, देशप्रेम , भाषा प्रेम प्रकृति प्रेम जाग्रत हुआ। आगे बड़ी कक्षा में टीचर की अदूरदर्शिता और उग्र स्वभाव के कारण मेधावी रजनी का डाक्टर बनने का सपना टूट गया, जिसका मलाल उसे सालता रहा।जहॉं अच्छे टीचर के कारण बहुत कुछ पाते हैं ,वहीं अकुशल टीचर के कारण बहुत कुछ खो भी देते हैं। टीचर का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है, बच्चों का भविष्य देश का भविष्य उसके हाथों में है।
