स्वाभिमान भरी दीवाली
स्वाभिमान भरी दीवाली
अभी इंसानियत बाकी है. गरीब की स्वाभिमान भरी दीवाली अपने विचार साझा कर रही हूँ ...
स्वाभिमान भरी दीवाली......
जैसे ही दिवाली का सामान लेने बाजार गई वैसे ही कई पुरानी घटनाएं जेहन में खदबदाने लगी।
बात पिछले साल की है़। जब दीपावली का सामान खरीदने बाजार गईथी ..गली, मोहल्ला, हर बाजार भीड़ से भरा । चारो ओर धमकच मची हुई थी । इतना शोर कानो कान आवाज सुनाई ना दे ।
उसी भीड़ में से एक अधपकी उम्र का अपाहिज व्यक्ति ॥ लकवे या पोलियो से ग्रस्त रहा होगा। दोनों हाथ में लक्ष्मी गणेश जी के कलेंडर लिये चौराहे पर एक पेड़ के नीचे भीड़ से दूर शान्त भाव से खड़ा था। मेरी नजर पड़ने की वजह छाया होने के कारण गाड़ी वही खड़ी की थी मैंने । उतरने लगी तो गेट खोला वो कलेंडर वाला थोड़ा पीछे हुआ उसका लंगड़ा कर पीछे हटना नोटिस में आ गया ।
फिर नजर उसके हाथों पर गई हैरानी सी हुई पास गई कलेंडर देने को कहा तब फिर हैरान कर दिया उसकी बात ने ...
उसने कहा मैम दस रू का एक कलेंडर है पर कलेंडर आपको मेरे हाथों से खुद ही निकालना पड़ेगा और पैसे भी जेब में डालने पड़ेगे ।
मेरे हाथ उपर नीचे नहीं होते ।हैरान मना पूछ बैठी फिर ये कलेंडर कौन देता है
आपको ..उसने बताया मैम। एक स्टेशनरी की दुकान वाला है बड़ा भला मानस है । वो रोज सुबह मेरे हाथों में गिन कर कलेंडर लगा देता है मैं यहाँ आकर रोज खड़ा हो जाता हूँ शाम को फिर दुकान जाता हूँ वो पैसे निकाल कर गिनता है बचे कलेंडर रख कर पास के होटल से खाना मंगवा देता है । बाकी पैसे एक कॉपी में जमा कर देता है । इकट्ठे होते रहते है ।दुकान के बाहर वही रात को सो भी जाता हूँ ।
मेरे को कभी कुछ चाहिए होता है तो उनसे कह कर मंगा लेता हूँ । दीवाली पर नया कुर्ता पजामा लाऊँगा । उनको कह दिया है । इतने पैसे इकट्ठे हो गये है मेरी कमाई के। कहते हुये उसकी आँखों में एक आत्म सम्मान भरी झलक थी। की वो अपनी मेहनत की कमाई से अपनी जरूरतें पूरी करता है ।
आज पहली बार किसी ने उसका मन जानना चाहा था शायद इसलिए सारी बातें बता गया वो ।
कमाल है ना हट्टे कट्टे भीख मांगते है साधू बन जाते है । चोरी चकारी गलत काम करते है ॥ और ये अपाहिज जो भीख माँग सकता है मेहनत से कमा रहा है ।
दस कलेंडर थे उसके पास दसों ले लिये। अचरज हुआ ।वो प्रश्न भरी नजरों से मुझे देखने लगा ।बोला आप मुझ पर दया कर के सारे कलेंडर ले रही है ना ।दया नहीं मेहनत की कमाई चाहिऐ शाम तक बिक जाऐगे ॥आप एक ही ले लीजिए ।
मैं कितनी छोटी लग रही थी उसकी उस बड़ी सोच के आगे ।
हँस के कहा मैंने अरे दया नहीं। आप तो मेहनतकश इंसान होने का एक सशक्त उदाहरण हो।
में सारे कलेंडर स्टाफ को बाटने के लिये ले रही हूँ ।
कह कर सारे कलेंडर ले 300 रू उसकी जेब में रखे । 100 रू कलेंडर के 200 रू कुर्ते पजामे के । एक बड़ी बहन का मेहनत कश छोटे भाई को दीवाली का उपहार।
रुआसी सी हँसी हँसा और सर झुका लिया । हूम्म्म्म्म्म जानती हूँ आँसू छुपा रहा था ...स्वाभिमानी जो था ना ...
आज भी जब किसी हट्टे कट्टे इन्सान को भीख मांगते देखती हूँ ...वो मेहनती अपाहिज इंसान मुझे याद आ जाता है .....
