"सुबह की धुंध"
"सुबह की धुंध"
धुआं हो रही दिन की ज्योति, टूट रही सांसों की माला।
हे मानव! तेरी करतूतों से पिघल रही है दिन की ज्वाला ।
काट रहा है वन भी तू ,हिमालय के शीश उजाड़े।
सूखी कर दी नदियां तूने इतने पैर पसारे।
प्रकृति का छीन के आंचल खुशियां खूब मनाता है।
क्या पता तुझको उसका हृदय कितना अकुलाता है।
तेरे जुल्मों की लिए शिकायत मन ही मन कोस रही,
कब आयेगा मेरे वस मे ंबस यही सोच रही।
