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Swarn Dhiman

Classics Inspirational Others


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Swarn Dhiman

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सप्रेम भेंट।

सप्रेम भेंट।

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काम्या बहुत खुश थी, पहला वेतन जो मिला था आज उसको। अभी कुछ महीने पहले ही कैंपस प्लेसमेंट में उसका एक अच्छी कंपनी में सलेक्शन हो गया था और इसी महीने के शुरू में उसने अपनी पहली जॉब शुरू की । आज महीने की आखरी तारीख, हाथ में पहला वेतन और शुक्रवार का दिन, भगवान जी का खूब धन्यवाद करते हुए शाम को काम्या पास के मंदिर भी हो आई। फिर उसने घर में माँ को फ़ोन मिलाया और कहा “मम्मी मैं कल घर आउंगी।"

माँ को थोड़ी चिंता हुई, पूछा कि “सब कुछ ठीक तो है, तुम रहने दो मैं और पापा ही सुबह आ जाते हैं।” 

हंसकर बोला उसने "नहीं मम्मी आप नहीं, मैं ही आउंगी, कुछ सरप्राइज देना है आपको।" और अगले दिन दोपहर को दिल्ली से बस में बैठ गई काम्या अपने घर के लिए।

पापा बस स्टैंड पर ही इंतज़ार करते मिले और लाडली बेटी ने पापा को कहा "पापा मिठाई भी लेकर ही चलते हैं घर।" 

पापा बहुत खुश थे, पर हैरान भी थे, बार बार पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया। ये माँ-बाप भी बच्चों के वेतन तक तो कभी पहुंचना ही नहीं चाहते, तो कोई अंदाज़ा ही लगा पा रहे थे।

घर पहुंच कर काम्या ने मिठाई अपनी माँ को दी और बोला “मम्मी मुझे आज मेरा पहला वेतन मिला है, मैं शुरू से अपना पहला वेतन आपको ही देना चाहती थी, पर मुझे माफ़ करना ये पहला वेतन मैं आपको पूरा नहीं दे रही, मैंने कुछ पैसे इसमें से ले लिए हैं और बाकि ये आपके और पापा के लिए हैं।" 

ऐसा कहते हुए उसने अपने नाम वाला छोटा सा पैकेट मम्मी के आगे कर दिया। माँ की आँखों में ख़ुशी के आंसू और पापा के चेहरे पर गर्व साफ़ दिखाई दे रहा था। 

पापा ने कहा “बेटा ये तेरी मेहनत की पहली कमाई है, इसे तू ही रख और खूब मजा कर।" लेकिन काम्या कहाँ मानने वाली थी, बोली “पापा अपनी पॉकेट मनी तो मैं हमेशा आपसे ही लूंगी, आपको उससे छुट्टी नहीं मिल सकती।” और सब जोर से हंस पड़े।

अब काम्या ने अपनी मम्मी से बोला “मम्मी मुझे ललिता बुआ से मिलना है अभी।" मम्मी ने कहा "हाँ क्यों नहीं, पर पहले आराम कर ले, कुछ खा-पी ले।" 

लेकिन काम्या ने कहा “नहीं मम्मी, मुझे अभी मिलना है, आप चलो मेरे साथ।" उसने अपने बैग से एक बड़ा पैकेट निकाला और बुआ से मिलने चल पड़ी। जब माँ ने पूछा क्या है उस पैकेट में तो काम्या ने कुछ नहीं कहा, माँ का हाथ पकड़ा और निकल गई बुआ के घर की तरफ। 

था क्या वैसे उस पैकेट में? आइये आपको दो साल पीछे लेकर चलते हैं।

जी हाँ, ये बात है दो साल पहले की जब काम्या अपने परिवार से दूर हायर स्टडीज के लिए दिल्ली जैसे बड़े शहर मे आई ही थी। उसका परिवार इस छोटे शहर में अपने सब आस पास के रिश्तों के साथ मिल ज़ुल कर रहता है। उसकी मम्मी का सबके साथ रिश्ता अच्छा ही था और परिवार की सब लड़किया उनसे दिल की सब बातें करती थी।

उसके ही परिवार में एक दूर के रिश्ते की बुआ “ललिता" भी थी, जो घर के पास ही रहती थी, उम्र भी कुछ ज्यादा नहीं बस 30 के लगभग होगी। काम्या को अपनी मम्मी से फ़ोन पर पता चला कि कैसे ललिता बुआ के पति एक हादसे मे अपना हाथ खो बैठे और एकदम से कितनी मुसीबतों ने उनको घेर लिया है। मम्मी ने बताया कि परिवार के सब लोग जितना भी संभव हो उनकी सहायता कर रहे हैं। काम्या का मन बहुत दुखा, उसकी आँखों के सामने ललिता बुआ का सूंदर सा चेहरा घूमने लगा। फिर दिन बीतते रहे और अब वो भी अपने काम में मस्त हो गई।

कुछ समय के बाद परिवार में एक कजिन का विवाह तय हो गया और काम्या भी हॉस्टल से आ गई कि इस बहाने सबसे मिलना जुलना हो जायेगा! सबसे मिलते हुए उसने मह्सूस किया कि ललिता बुआ तो एकदम बदल गई हैं, न पहले जैसी चमक थी चेहरे पर, ना वो हंसी, बस एकदम चुप और सादा सी लग रही थी।

मम्मी से पता चला की उनके पति तो अब कोई काम नहीं कर पाते और बस वो कपड़े सिलाई करके अपने परिवार का गुज़ारा कर रही हैं। काम्या दुखी तो थी, फिर भी उसने प्यार से मनुहार करते हुए बुआ से पूछा "बुआ आप क्या पहनोगे शादी में?” तो बुआ बोली “कुछ भी पहन लूंगी बेटा"।

लेकिन काम्या पीछे ही पड़ गई, तो बुआ ने कहा कि अब नया तो कुछ नहीं है, पर पुरानी साड़ियां पड़ी हैं और बस बैठ गई दोनों साड़ियां देखने। काम्या ने एक सूंदर सी गुलाबी रंग की सितारों वाली साड़ी उठाई और कहा "बस बुआ आप यही पहनो और आज आपका मेकअप भी मैं ही करूंगी।" वो शायद बुआ को बहुत खुश करना चाहती थी। बुआ ने हंसकर कहा "अरे ये तो मेरी शादी की साड़ी है, मुझे और तुम्हारे फूफा जी दोनों को बहुत पसंद थी, मैंने तो कभी पहनी भी नहीं कि कंही खराब ना हो जाये।"

फिर क्या था, काम्या को तो अब बुआ को यही साड़ी पहने देखना था तो अड़ गई ज़िद पर और बुआ मान गई।

शादी के दिन उसने बुआ से कहा "लाओ बुआ मैं साड़ी की क्रीज़ निकाल देती हूँ, प्रेस कर देती हूँ।" 

बुआ ने भी देखा कि बच्ची कितने शौक से बुआ को तैयार करने में लगी है। इधर बुआ और तयारी करने लगी और उधर काम्या साड़ी को इस्त्री। और बस तभी प्रेस ज्यादा गरम होने के कारण साड़ी से चिपक गई, साड़ी जल गई। पूरी प्रेस के साइज का छेद हो गया था। काम्या के मुँह से कोई शब्द नहीं निकले, बस आंसू निकलने शुरू हो गए। अपराध बोध बहुत गहरे तक महसूस किया उसने। लेकिन जैसे ही बुआ ने देखा उनके चेहरे पर कुछ रंग आये और गए, लेकिन आज भी उन्होंने बड़ा दिल रख कर कहा "कोई बात नहीं बेटा, बस चुपचाप इसको तह लगाकर रख देते हैं, तेरे फूफा और मम्मी को कुछ नहीं बताएंगे।"

काम्या रोती रही, बुआ को सॉरी बोलती रही। बुआ ने प्यार से बच्ची को गले लगाया और कहा "ये तो मुझसे भी जल सकती थी, ये तो देख तूने दोबारा से मेरे मन में सब शौक पैदा कर दिए। चल कोई और साड़ी पसंद कर और मेरा बढ़िया सा मेकअप कर दे।" फिर दोनों ने अलमारी से एक दूसरी साड़ी निकली और तैयार होने लगे।

समय के साथ बुआ के पास पैसे और खुशियों की कमी तो हो गई, पर मन तो आज भी उतना ही सच्चा और अच्छा था। बस शादी हो गयी और काम्या हॉस्टल आ गई अपनी पढ़ाई पूरी करने।

और आज जब काम्या के हाथ में उसका पहला वेतन था, तो उसे अपनी बुआ की आँखों मे वो ही ख़ुशी देखनी थी जो दो साल पहले उसने देखी थी। उसने अपने पहले वेतन से सबसे पहले ललिता बुआ के लिए एक गुलाबी सितारों वाली साड़ी ली और उसे पैक करवाकर ले गई। बुआ से गले लगकर उसने कहा “बुआ इसमें आपके लिए कुछ है, इसे मेरी तरफ से नुकसान की भरपाई मत समझना, ये मेरा धन्यवाद है आपको उस प्यार और विश्वाश के लिए जो आपने उस दिन मुझे दिखाया, आपने मेरी गलती को ऐसे ही सबसे छिपा लिया जैसे की मम्मी छिपा लेती है| आज मेरे पहले वेतन से मैं आप दोनों को खुश करना चाहती हूँ| प्लीज इसे सप्रेम भेंट समझ लें और पहनकर दिखाएँ कि कैसी लग रही है।"

ललिता बुआ ने पहले थोड़ी झिझक महसूस की, लेकिन फिर बहुत सारे आशीर्वाद के साथ साड़ी का पैकेट लेकर अपने माथे से लगा लिया।


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