संस्मरण : शशिबिन्दुनारायण मिश्र
संस्मरण : शशिबिन्दुनारायण मिश्र
एक सुयोग्य, कर्त्तव्यनिष्ठ, समय के पाबंद अध्यापक शिक्षक के अतिरिक्त , कुशल ढोलवादक एवं गायक के रूप मे मदन मोहन राय की छवि आज भी मेरे मानस पटल पर अंकित है।
अपने एक निबन्ध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि-"साहित्य-संस्कृति-कला मनुष्य की विविध साधनाओं की सर्वोत्तम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य स्थापित करती है।"
इस तरह की साधना वाले छोटे-बड़े आचार्य मेरे लिए बचपन से ही विशेष रूप से आदरणीय रहे हैं। डुमरैला, गोरखपुर में ब्रह्माशंकर राय के यहाँ 1928 मे मदनमोहन राय का जन्म हुआ था।
मध्यम कद-काठी, सांवला शरीर, चेहरे पर सजी हुई मध्यम आकार वाली मूंछें, धोती कुर्ता पहने हुए, कंधे पर तौलिया रखे और प्रखर वाणी वाली मदनमोहन जी की छवि आज भी याद है।
एक योग्य, कर्त्तव्यनिष्ठ, सख्त अनुशासन एवं समय के पाबंद शिक्षक एवं प्रधानाचार्य ; मदनमोहन राय जी एक सुयोग्य शिक्षक होने के साथ-साथ अपने जीवन में सामाजिक सरोकारों , स्पष्टवादिता, साहित्य, संगीत, धर्म और अपनी परिष्कृत सांस्कृतिक अभिरुचियों के लिए भी क्षेत्र में विधिवत प्रतिष्ठित थे। आप जीवन पर्यन्त गायत्री परिवार हरिद्वार से भी जुड़े रहे। एक योग्य कर्त्तव्यनिष्ठ शिक्षक के साथ गायन वादन में आपकी दक्षता आपके व्यक्तित्व को विशेष बनाती थी।
मेरे गाँव के विश्वकर्मा प्रसाद जी के व्यक्तित्व निर्माण में रानापार के मनीषी संत पं. गणेश दत्त मिश्र 'मदनेश' के अतिरिक्त मदनमोहन राय जी के द्वारा उनके जीवनोत्कर्ष में योगदान और आपके गायन-वादन की दक्षता का जिक्र आया था। विश्वकर्मा जी लगभग आपके पुत्र के उम्र के हैं । मदनमोहन जी का यह बड़प्पन था कि फिर भी समान महत्व देते थे । मदनमोहन जी राम-नाम संकीर्तन और मानस सुंदरकाण्ड पाठ के सधे हुए कलाकार भी थे। राम-नाम संकीर्तन एवं मानस पाठ के अपने समय के जनपद के महत्त्वपूर्ण गायक कलाकारों में सर्वप्रमुख गायक रहे रानापार निवासी स्वर्गीय तारकेश्वर मिश्र आपके सर्वाधिक विश्वस्त मित्रों में से एक थे, यद्यपि तारकेश्वर जी उम्र में मदनमोहन राय जी से 3-4 साल बड़े थे , फिर भी प्रगाढ़ता इस सीमा तक रही थी कि
जब तक दोनों लोग जीवित रहे , तब तक सप्ताह में विधिवत वे एक- दो बैठकी गायन-वादन के लिए जरूर कर लेते थे,कई बार एक दूसरे के यहाँ पैदल चले जाते थे। मदनमोहन राय जी के ज्येष्ठ सुपुत्र डॉ सूर्यभान राय बताते हैं, कि जब इनमें गायन-वादन की धुन सवार होती थी, तो ये लोग अक्सर पैदल ही मृदंग और ढोल वादन में पारंगत कलाकार पंडित राघव राम त्रिपाठी उर्फ मृदंगी बाबा" के यहाँ 5-6 किलोमीटर दूर बसावनपुर चले जाते थे और वे भी इन लोगों के यहाँ पैदल आ जाते थे। आप लोगों की गायन मण्डली के अन्य महत्वपूर्ण कलाकारों में सिलहटा के स्वर्गीय राममणि पाण्डेय, दुलहरा के गणेश धर दुबे , डुमरी के स्वर्गीय वीरेंद्र प्रसाद मिश्र एवं स्वर्गीय पारस नाथ मिश्र आदि प्रमुख लोग थे । उनके बाद की पीढ़ी में मेरे गाँव के विश्वकर्मा प्रसाद जी, सुरेन्द्र उपाध्याय जी एवं दयानंद जी भी इस टीम के हिस्सेदार बने थे। कुछ-कुछ रामवृक्ष मुंशी जी, बेचन प्रसाद और रायदौर यादव भी।
मदनमोहन राय के मन-मस्तिष्क में जब भी ढोल-थाप ,झाल आदि की आवाज गूँजती, तो आप उधर तत्काल बरबस खिँचे चले आते , अनेक बार स्कूल से सीधे मेरे घर पहुँच जाते और ढोल वादन के लिए बैठ जाते । मदनमोहन राय को मैंने अपने पुराने खपरैल वाले घर के उत्तरी बरामदे में भीषण जाड़े में भी पसीने से तर-बतर हो कर झूमकर ढोलक बजाते हुए देखा है। मदन मोहन जी प्रधानाचार्य बनने से पहले लगभग 25-26 वर्षों तक अर्थशास्त्र प्रवक्ता एवं उपप्रधानाचार्य रहे, यद्यपि इण्टर कॉलेज बरही में 11 वीं-12 वीं में पढ़ते समय मेरा कभी अर्थशास्त्र विषय नहीं रहा, फिर भी मैं खाली समय में अपनी मित्र मण्डली के साथ बैठकर अनावश्यक चर्चाओं की बजाय अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक अभिरुचियों के कारण मदनमोहन जी के पास ही बैठता रहा, इसके पीछे एक कारण पारिवारिक लगाव भी था।
30.06.1988 को बरही इंटर कॉलेज से संस्थापक प्रधानाचार्य राजबहादुर राय के सेवानिवृत्त होने पर मदनमोहन राय प्रधानाचार्य बने और प्रधानाचार्य पद पर ठीक साल भर की यादगार सेवा कर 30-06-1989 को प्रताप नारायण सिंह जनता इंटर कॉलेज बरही सोनबरसा गोरखपुर से आप सेवानिवृत्त हुए थे ।
आप की अध्यापकीय सेवा का आरंभ -मिडिल स्कूल में "पार्टटाइम" में सन् 1948 से, सन् 1951 से मिडिल स्कूल में ही सेवा का स्थाईकरण हुआ था। बाद में वही विद्यालय उच्चीकृत होते हुए इंटर कॉलेज बना।
जब से मैंने होश संभाला है, तब से मदनमोहन राय जी को मैं ठीक-ठीक जानता हूँ।
मदनमोहन राय जी स्पष्टवादी थे और कुशल वक्ता भी । मेरे आदर्श व्यक्तित्व मनीषी साहित्यकार पं. गणेश दत्त मिश्र "मदनेश" जी के प्रति आप बहुत ही श्रद्धा और कृतज्ञ भाव रखते थे। 'मदनेश' जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर दिसम्बर 1997 में स्वावलम्बी इंटर कॉलेज विशुनपुरा गोरखपुर पर मेरे द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मदनमोहन राय जी बहुत ही व्यवस्थित ढंग से घण्टे भर बोले थे और कहा था कि--"मानवीय गुणों से भरपूर "मदनेश" जी ,सही मायने में बड़े आदमी थे, वाकई में वे बहुत बड़े थे।" मदनमोहन राय जी के हू-ब-हू शब्द यही थे, जो उस समय के अखबारों में छपे थे। उस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सुविख्यात रचनाकार प्रोफ़ेसर रामदेव शुक्ल जी थे।
मदनमोहन राय जी के इण्टर कॉलेज में प्रखर शिक्षक होते हुए शिक्षक राजनीति भी आपसे अछूती नहीं रही, लेकिन शिक्षक राजनीति में आपके लिए शुचिता काफी महत्वपूर्ण रही। शिक्षक सेवा सुरक्षा के लिए किए गए प्रारंभिक आंदोलनों में आपने शिक्षक राजनीति एवं संघर्षों के पुरोधा ओमप्रकाश शर्मा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया था, यह घटना 1956 एवं उसके बाद के अनेक आन्दोलनों की है , गोरखपुर में शिक्षकों को नेतृत्व देते हुए आप जेल भी गए थे, उक्त संघर्ष में पुलिस लाठी चार्ज के दौरान आपको काफी काफ़ी चोटें आई थीं। 2004 में दी. द. उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के प्रेक्षागृह में माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेशीय सम्मेलन में मंच पर मदनमोहन राय जी को बैठाकर माध्यमिक शिक्षक संघ के तत्कालीन प्रदेशीय अध्यक्ष माननीय ओमप्रकाश शर्मा और माननीय पंचानन राय जी द्वारा अनेकानेक आंदोलनों मे आपके योगदान का स्मरण कर मदनमोहन राय जी को बहुत ही आदर और सम्मान दिया गया था।इसका मैं साक्षी रहा हूंँ।
एक वाकया याद आता है,मदनमोहन राय एक बार मेरे घर पर ही बैठे हुए थे, बेहतर शिक्षा और योग्य शिक्षक की जब बातचीत चली,( मैं उस समय शिक्षक नहीं था)। मेरी पट्टीदारी के एक चाचा उस समय प्राथमिक विद्यालय मे शिक्षक थे, मदनमोहन राय जी ने उन्हें कड़ी सीख देते हुए कहा था कि-आप जिस भी कक्षा के अध्यापक हों, यदि वास्तविक अध्यापक हैं, तो उस कक्षा के सर्वाधिक होनहार और मेधावी छात्र से आपको तीन गुनी अधिक जानकारी के साथ कक्षा में जाना चाहिए और उससे तीन गुना अधिक अध्ययन के लिए मेहनत भी करनी चाहिए, यदि ऐसा नहीं है, तो कोई योग्य छात्र आपको गुरु जैसा आदर क्यों देगा ? मदनमोहन राय जी का यह कथन मेरे अध्यापक होने बहुत प्रेरणादायी साबित हुआ।
मदनमोहन जी सरैया शूगर मिल सरदारनगर के "केन यूनियन" के करीब 40 वर्षों तक ससम्मान निर्विरोध "डाइरेक्टर" रहे। डाइरेक्टर भी तब रहे,जब "डाइरेक्टर" का मतलब होता था,तब न जातीय गोलबंदी थी और न ही अपराध सिर चढ़कर बोलता था और जहरीली वाणी बोलकर जातियों में आपस में दुराव पैदा करने वाले क्षेत्रीय पतित नेताओं का तत्समय प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। यह वह समय था, जब जातीय संकीर्णताओं वाले दो कौड़ी के नेताओं की कोई औकात नहीं थी, चाटुकारिता का मतलब नहीं था, चाहे जैसे भी हो , पात्रता की कद्र थी। उसी दरम्यान बरही स्टेट से "केन यूनियन" के "डायरेक्टर" पद के लिए आपकी जमकर टकराहट हुई। सम्भवतः यह सातवें दशक की बात है,"केन यूनियन" के "डायरेक्टर" पद के लिए बरही स्टेट के बाबू रविप्रताप नारायण सिंह उर्फ रवि बाबू और डुमरैला के मदनमोहन राय जी आमने- सामने हो गये थे। रवि बाबू (बरही स्टेट) ने अपने पूरे प्रभाव का चुनाव मे इस्तेमाल किया था, जिसमें मदनमोहन जी अंततोगत्वा कुछ मतों के अंतर से चुनाव हार गए थे। वैसे आज से 55-60 वर्ष पहले तक डुमरैला- डीहघाट के भूमिहारों से बरही स्टेट की अक्सर ठन जाती थी, शायद प्रतिष्ठा के वर्चस्व को लेकर । डीहघाट और डुमरैला दोनों भूमिहार बाहुल्य गाँव हैं। सभी भूमिहारों के नेता डीहघाट के बाबू रूदल राय माने जाते थे। मेरे पिता जी बाबू रूदल की बुद्धिमत्ता और प्रभाव की चर्चा आज भी करते हैं।
अब उस तरह की वर्चस्व जैसी सब चीजें पूरी तरह से क्षेत्र से समाप्तप्राय हैं।
बरही स्टेट के ही प्रताप बाबू (बाबू प्रताप नारायण सिंह -तत्कालीन प्रबन्धक -जनता इंटर कॉलेज बरही सोनबरसा गोरखपुर) के सर्वाधिक करीबी और विश्वस्त सलाहकार मदनमोहन राय जी ही थे। मदन जी की किसी भी सलाह को प्रताप बाबू कभी भी अस्वीकार नहीं कर सके थे।
दोनों लोगों के जीते-जी आपस में अविश्वास का एक भी उदाहरण नहीं मिलता है, शायद उच्च कोटि की आपसी समझदारी के कारण।
इंटर में मैं जब बरही पढ़ रहा था, तो मदनमोहन जी उपप्रधानाचार्य और अर्थशास्त्र विषय में प्रवक्ता थे,मदनमोहन राय जी का मैं प्रत्यक्ष छात्र तो नहीं रहा, लेकिन मिलना-जुलना सबसे अधिक उन्हीं के साथ ही रहा,मदन मोहन जी से भी बहुत कुछ सीखने को मिला , जैसे कि स्पष्टवादिता , समय की पाबंदी और कुशल अध्यापन के कुछ सूत्र। इतना सब होते हुए मदनमोहन जी का अपने सहकर्मी शिक्षकों से बहुधा मतभेद रहता था, कारण मदनमोहन जी की स्पष्टवादिता थी, इंटर संस्कृत विषय में हमारे शिक्षक रहे आचार्य रत्नेश्वर शुक्ल जी जूनियर कक्षाओं में 1951-52 के आस-पास मदनमोहन जी के छात्र भी थे, कुछ ही वर्षों बाद उनके सहकर्मी शिक्षक हुए । कुशल वक्ता और वाग्विदग्धता के मूर्तिमान आचार्य रत्नेश्वर शुक्ल जी जून वर्ष 2003 में प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आचार्य शुक्ल जी को चन्द्रापीड कथा (बाणभट्ट कृत कादम्बरी अंश) और कालिदास कृत रघुवंशम् का द्वितीय सर्ग "कालिदास काव्यामृतम्" पूरी तरह से कण्ठस्थ था, अध्यापन के समय शुक्ल जी ने कभी पुस्तक लेकर नहीं पढ़ाया, जबकि बहुतेरे संस्कृत अध्यापक कादम्बरी को ठीक-ठीक पढ़ नहीं पाते हैं। शुक्ल जी पान खाने के बहुत शौकीन रहे, उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत है। मदनमोहन राय जी और रत्नेश्वर शुक्ल जी से अक्सर मतभेद रहा। पिछले वर्ष 85 वर्षीय शुक्ल जी से मिलने मै उनके गाँव गया था । शुक्ल जी ने प्रसंग वश कहा कि --"हाँ मदन जी से मेरे कुछ मतभेद रहे, फिर भी वह समय बड़ा अच्छा रहा।"
मेरे लिए दोनों लोग आदरणीय थे, बरही मे छात्र रहते हुए मैं उक्त दोनों आचार्यों का प्रिय था। बरही में पढ़ते समय श्रीनिवास राय जी का अंग्रेजी पढ़ाना भी नहीं भूलता है। श्रीनिवास जी का अध्यापन बोधगम्य था, सम्मोहन कारी प्रभाव डालता था। रत्नेश्वर शुक्ल जी के संस्कृत शिक्षक होते हुए भी उनसे इण्टर हिन्दी पाठ्यक्रम में संकलित रत्नाकर कृत उद्धवशतक पढ़ लिया था और श्रीनिवास राय जी के अंग्रेजी अध्यापक होने के बावजूद इण्टर हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल जायसी के पद्मावत का "नागमती वियोग वर्णन" पढ़ लिया था। हालाँकि इसके लिए मुझे उन दोनों आचार्यों से बहुत अनुनय- विनय करना पड़ा था। कालान्तर में इण्टर कक्षाओं में हिन्दी पढ़ाते हुए मुझे इसका बड़ा लाभ मिला।
बहुत बार ऐसा भी हुआ कि मदनमोहन जी रानापार मेरे यहाँ आए, तो उनके परममित्र स्वर्गीय तारकेश्वर मिश्र जी (जो मेरे पितामह पं. रामानुज मिश्र के सहोदर थे) अतिशय प्रेमवश रात्रि विश्राम भी कर जाते थे। पितामह रामानुज जी और प्रपितामह "मदनेश" जी के साथ धार्मिक, आध्यात्मिक , सांस्कृतिक विषयों पर घण्टे-दो घंटे तक खूब चर्चाएँ होती, बचपन में इनके संवादों का मैं खूब रसास्वादन किया करता था। एक बार रात्रि विश्राम में भोजनोपरान्त शयन से पूर्व धर्म सम्बन्धी चर्चाओं के बीच यह बात उभर कर आई थी कि-"धर्म में खण्डन करना अनुचित है।" यह तथ्य मैं आज तक नहीं भूल सका। उन्होंने धर्म को बहुत व्यापक अर्थ मे प्रयोग किया था।
इन सबके बातचीत के दौरान आपस में कभी -कभी ज़ोर का ठहाका भी लगता था। मदनमोहन जी के गाँव से लेकर विद्यालय तक विरोधी भी थे, बहरहाल मेरे लेखन में किसी के विरोध या निन्दा के लिए कोई अवसर नहीं रहता है।
हमारे लिए मदन जी के आने-जाने की सार्थकता यही रही। मेरे प्रेरक व्यक्तित्वों में एक नाम मदनमोहन राय जी का भी आता है।
