संन्यास
संन्यास
आज अंकुर का फ़ोन आया था। केस के बारे में पूछ रहा था। निर्मल ने सिगार सुलगाते हुए अपने दोस्त राजीव से कहा। कह देते, वक़्त लगेगा। राजीव ने जवाब दिया । थोड़ी देर की खामोशी के बाद निर्मल बोला, मुझे तो अब रिश्तों से ऊब होने लगी हैं। बच्चे अपने जीवन में व्यस्त हैं और बात भी हो तो मेरे हाल की बजाय पहले केस के बारे में पूछते हैं। रेनू से भी ऐसी उम्मीद नहीं थीं कि वो पापा की दिमागी हालत का फायदा उठा सब कुछ अपने नाम करवा लेंगी। छोड़ो न खुद को क्यों तकलीफ़ देते हो। खाना खाने के बाद दोनों मित्र सैर के लिए निकले। नैनीताल में रहते हुए निर्मल को दो महीने हों गए थे। वह अमेरिका से आकर यही रहता था। आखिरी बार दस साल पहले आया था। पिता की मृत्यु उसे भारत खींच लाई । निर्मल यही सोच रहा था कि सामने मिट्टी-गारे से बनी कुटिया को देख उसने पूछा, "किसकी हैं? " एक फ़क़ीर की।" प्रभु भक्ति में लगा रहता है । यहीं जीवन सही हैं । जब रिश्ते बोझ बन जाए तो सन्यास ले लेना चाहिए। लोग कहते है, इसका भरा-पूरा परिवार था। किसी आपदा में सब कुछ बह गया । राजीव यह बता ही रहा था, तभी सामने से फ़क़ीर बाहर आया । और झोंपड़ी के बाहर पेड़ के नीचे आँखें बंदकर बैठ गया । चल, बात करते हैं। नहीं यार ! मनमौजी है। मन किया तो बोल लेगा, वरना नहीं। मगर निर्मल न माना और राजीव को वहीं छोड़ फ़क़ीर के पास जाकर बैठ गया। फ़क़ीर को अपनी समाधि में लीन देख निर्मल को लगा रुकना बेकार है। तभी फ़क़ीर ने आँखें खोली और बोला,
इस शान्त अँधेरे में अशांत मन लिए क्यों बैठे हों ?
निर्मल: मैं सन्यास लेने की सोच रहा हूँ, सभी रिश्ते बेमानी हैं।
बाबा : इसका मतलब तुम्हें ईश्वर ने अभी रिश्ते दे रखे हैं।
निर्मल:: हाँ, मगर स्वार्थी लोगों के बीच हूँ।
बाबा:: और क्या तुम स्वार्थी नहीं हों ? मनुष्य अपनी कमी जिस दिन देख लेगा, उसे दूसरों से शिकायत न होगी । और गृहस्थ जीवन में भी संन्यास लिया जा सकता है।
निर्मल : वो कैसे?
बाबा:: जो वस्तु तुम्हारी नहीं है, वो तुम्हारी नहीं है। इस बात का ज्ञान भी संन्यास है । कहकर फ़क़ीर ने आंखें बंद कर ली ।
बिस्तर पर लेटते ही पूरा घटनाचक्र उसके सामने आ गया। रेनू ने कई बार पापा की बीमार हालत के बारे में उसे बताया था। मगर उसने काम का बहाना बना एक बार भी उनकी सुध नहीं ली। फिर वह पापा के संग आकर रहने लगी। उसका पति राजेश कोई काम नहीं करता था। ज़िन्दगी भर बहन ने नौकरी कर अपने परिवार का गुज़ारा किया। पापा की हालत को देखते हुए नौकरी छोड़ दी और अपने परिवार तथा पापा का इलाज करवाने के लिए आधी कोठी और दुकान किराए पर दे दी। जब पापा को लगा कि उनके पास समय नहीं है तो उन्होंने अपनी वसीयत बनाई और उसके हिस्से में आई केवल दुकान। यह जानते हुए कैसे उसकी बहन ने घर का खर्चा आधा कर वकील की फीस भरी होंगी। उसने बहन पर केस कर दिया ताकि वह अपने बेटे अंकुर को पैसे दे सके। रेनू के बुलाने पर भी उसने बातचीत से मसला हल नहीं किया ।
सुबह होते ही निर्मल ने वकील को फ़ोन कर केस वापिस ले लिया। अंकुर को अमेरिका लौट आने की सूचना दी। राजीव के पूछने पर कि उसने अपना फैसला क्यों बदला तो उसने सिर्फ इतना ही कहा, "मैंने संन्यास ले लिया है।" पर राजीव उसकी बात को समझ नहीं पा रहा था ।
