"सड़ा हुआ पोहा"
"सड़ा हुआ पोहा"
मई की ढलती हुई दोपहर थी। बाहर सूरज आग बरसा रहा था, लेकिन जयंत के छोटे से किराए के कमरे में टेबल फैन की घरघराहट के बीच एक अलग ही सुकून था।
वो जिंदगी में पहली बार रसोई में पोहा बना रहा था।
"हल्दी ज्यादा तो नहीं हो गई?" उसने खुद से बुदबुदाते हुए चम्मच से पोहे को उलट-पलट किया। पास ही एक कांच के कटोरे में उसने तरबूज के छोटे-छोटे लाल चौकोर टुकड़े सजा रखे थे। पीला पोहा और लाल तरबूज - उसे ये रंगों का जोड़ा बड़ा खूबसूरत लग रहा था।
उसने हाथ पोंछे और तुरंत पाखी को फोन लगाया।
"हेलो पाखी! देखो मैंने क्या बनाया है। तुम्हारे पसंदीदा पोहे और साथ में एकदम ठंडा तरबूज।"
जयंत की आवाज में बच्चों जैसी उत्तेजना थी।
दूसरी तरफ से पाखी की खिलखिलाहट गूंजी। वही खनकती हुई हंसी जो हमेशा जयंत के दिल को छू जाती थी। पर आज उस हंसी के पीछे एक हल्की सी थकान, एक छुपी हुई उदासी थी, जिसे जयंत उस दोपहर भांप नहीं पाया।
पाखी उस वक्त शहर से दूर अपने घर में थी, जहाँ उस पर किसी और से शादी के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा था।
"सच में? तुमने खुद बनाया?" पाखी ने धीरे से पूछा।
"हाँ! और मैं अकेले नहीं खाने वाला। तुम्हारा हिस्सा भी यहीं रखा है।
फोन पर कुछ पलों के लिए सन्नाटा छा गया। पाखी जानती थी, शायद अब लौट पाना मुमकिन नहीं होगा। वक्त रेत की तरह दोनों की मुट्ठियों से फिसल रहा था। उसने आंखों में आए आंसुओं को रोककर गहरी सांस ली।
फिर खुद को संभालते हुए बोली - "जयंत, मेरे हिस्से का कुछ पोहा-तरबूज बचा कर रखना। गर सड़ भी जाएगा ना... लेकिन जब भी आऊंगी पास तुम्हारे, बड़े स्वाद से खाऊंगी।"
जयंत हंस पड़ा, "पगली हो क्या? सड़ा हुआ पोहा भी कोई खाता है?"
"मैं खाऊंगी जयंत। तुम्हारे हाथ का तो सड़ा हुआ पोहा भी अमृत जैसा लगेगा।" पाखी ने बेहद संजीदगी से कहा।
जयंत ने इसे सिर्फ एक मजाक समझा।
उसे क्या पता था, ये पाखी का किया हुआ आखिरी और सबसे दर्दनाक वादा था।
ठीक दो हफ्ते बाद, बिना कुछ कहे, पाखी हमेशा के लिए उसकी जिंदगी से चली गई। पीछे छोड़ गई एक सूना मोड़, तन्हाइयाँ और मेज पर रखा पोहे और तरबूज़ का वो आधा हिस्सा, जिसे जयंत ने सच में संभाल कर रख लिया था।
लेखक
जगन्नाथ "पृथक"

