कहानी/अंतिम संस्कार
कहानी/अंतिम संस्कार
रामकृष्ण जी और उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी ने अपने तीनों बेटों नरेंद्र, सुरेंद्र और हरेंद्र की परवरिश बड़े लाड़ प्यार से की थी। रामकृष्ण जी बैंक से रिटायर थे। उन्होंने तिनका-तिनका जोड़कर जो भी जमा पूंजी की थी, तीनों बेटों की पढ़ाई और उन्हें बड़े शहरों में सेटल करने में लगा दी।
वक्त धीरे धीरे बदला और तीनों बेटे शहर जाकर अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए। गाँव के बड़े से मकान में अब सिर्फ रामकृष्ण जी और लक्ष्मी देवी अकेले रहते थे।
शुरुआत में तीनों बेटे त्योहारों पर आते रहे, फिर कभी कोई कभी कोई आने लगा और फिर धीरे धीरे फोन पर बात करना भी कम कर दिया। रामकृष्ण अक्सर लक्ष्मी से कहते, "देखना लक्ष्मी, हमारे जाने के बाद यह घर खंडहर हो जाएगा। बेटों के पास तो हमारे लिए थोड़ा सा वक्त भी नहीं बचा।"
एक दिन अचानक बाजार से आते वक्त रामकृष्ण जी का एक्सीडेंट हो गया और उनका निधन हो गया। लक्ष्मी देवी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पड़ोसियों ने बेटों को पिता की मौत की खबर दी।
खबर सुनकर तीनों बेटे अपने-अपने परिवारों के साथ गाँव पहुंचे। घर में कोहराम मचा था, लेकिन इस दुख की घड़ी में भी बेटों के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।
अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू हुईं। तभी बड़े बेटे नरेंद्र ने कहा, "देखो भाई, पिताजी का अंतिम संस्कार शहर के वीआईपी श्मशान घाट पर करेंगे। वहाँ सब सुख सुविधाएं हैं। यहाँ गाँव में बहुत समय लगेगा और मुझे परसों ही एक जरूरी बिजनेस मीटिंग के लिए बाहर जाना है।"
दूसरा बेटा सुरेंद्र बुदबुदाते हुए बोला, "भैया, शहर ले जाने में कितना खर्चा होगा और समय बर्बाद होगा? यहीं पास के मुक्तिधाम पर ही कर देते हैं। वैसे भी मुझे ऑफिस से सिर्फ दो दिन की छुट्टी मिली है। बॉस का बार बार फोन आ रहा है।"
तभी तीसरा बेटा हरेंद्र अपनी पत्नी के कान में फुसफुसा रहा था, "पिताजी के लॉकर की चाबी कहाँ होगी? कहीं माँ ने किसी और को न दे दी हो। अंतिम संस्कार होते ही हमें जमीन के कागजात भी देखने होंगे।"
लक्ष्मी देवी एक कोने में बैठी-बैठी तीनों बेटों की सभी बातों को ध्यानपूर्वक सुन रही थीं। उनके आंसू सूख चुके थे। वह सोचने लगीं कि जिन बेटों के उज्जवल भविष्य के लिए उनके पिता ने अपनी पूरी जवानी और कमाई लगा दी, आज वही बेटे उनके शव के पास खड़े होकर समय और पैसे का हिसाब लगा रहे हैं। हर किसी को अपने काम पर लौटने की जल्दी पड़ी है।
तभी लक्ष्मी देवी अपनी जगह से उठीं। उनकी आंखों में एक अजीब सा सन्नाटा और कड़वा सच था। उन्होंने तीनों बेटों को पास बुलाया और कहा, "तुम लोग शांत हो जाओ। तुम्हें अपने काम पर लौटने में देर हो रही है न? तो तुम सब अभी इसी वक्त शहर वापस लौट जाओ।"
तीनों हैरान रह गए। बड़े बेटे नरेंद्र ने हैरान होकर पूछा, "लेकिन माँ, पिताजी का अंतिम संस्कार..."
लक्ष्मी देवी ने बीच में ही उसकी बात काटते हुए कहा, "तुम्हारे पिताजी का 'अन्तिम संस्कार' तो उसी दिन हो गया था, जिस दिन तुम तीनों ने उन्हें जीते जी अकेला छोड़ दिया था। यह जो सामने पड़ा है, वह तो सिर्फ एक मिट्टी का शरीर है। अब इनके संस्कार के लिए मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं है। "जिंदा में साथ नहीं, तो मरने पर ढोंग कैसा?"
इतना कहकर लक्ष्मी देवी ने पड़ोस के उन युवाओं को आवाज दी जो सुख-दुख में हमेशा रामकृष्ण जी के साथ खड़े रहते थे। उन्होंने खुद हाथ में मुखाग्नि की मटकी उठाई और पड़ोस के लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अर्थी को आगे बढ़ा दिया।
और फिर वहां से लौटकर लक्ष्मी देवी ने अपनी सारी संपत्ति अनाथ आश्रम के नाम कर दी और "आज से तुम्हारे पिता के साथ मेरा भी अंतिम संस्कार हो चुका है" कहते हुए तीर्थ यात्रा को निकल गईं।
तीनों बेटे ठगे से दरवाजे पर खड़े रह गए। आज उनके पिता के पार्थिव शरीर का नहीं, बल्कि उन बेटों के झूठे ढोंग और संस्कारों का 'अंतिम संस्कार' हो चुका था।
जगन्नाथ"पृथक"
9926423930
