Swati Shukla

Inspirational


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साथ रहकर जाना ' साथ ' का महत्व

साथ रहकर जाना ' साथ ' का महत्व

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"रश्मि होली में घर जाने की टिकट बुक करा ली है, तो तुम तैयारी कर लेना| मैं क्या सोच रहा था कि एक महीने के बाद तीन महीने के लिए मुझे बाहर जाना ही है तो तुम वहीं रुक जाना" नितिन ने रश्मि से कहा।

"तीन महीने! तीन महीने तो बहुत ज्यादा होते हैं, मैं कैसे रह पाऊंगी? आप बाद की टिकट करा लेते तो सही रहता" रश्मि ने कहा|

"कैसी बात कर रही हो, त्यौहार में घर जायेंगे तो सबको अच्छा लगेगा| बाद में जाने का कोई मतलब है क्या, और फिर सभी कृषि ( रश्मि की बेटी ) को बहुत याद कर रहे हैं, तुम चलो तो तुम्हें अच्छा लगेगा " नितिन ने कहा|

"वो तो ठीक है, लेकिन वहां कृषि कैसे रह पायेगी, उसको तो गांव की आदत ही नही है, यहाँ वहाँ मिट्टी में खेलेगी और फिर रात में भी कितना परेशान करती है, मैं अकेले नहीं संभाल पाऊंगी " रश्मि ने कहा|

"तुम परेशान न हो सब मैनेज हो जायेगा और अगर तुम्हें अच्छा लगे तो ही रहना नहीं तो त्यौहार करके अपने मायके चली जाना " नितिन ने कहा तो रश्मि खुश हो गयी क्योंकि यही तो वो लाइन थी जिसे वो सुनना चाहती थी रश्मि की जबसे शादी हुई थी वो तभी से नितिन के साथ दिल्ली में रहती थी| उसे आजादी की जो आदत पड़ गयी थी कि वो दिल्ली छोडकर कहीं जाना ही नहीं चाहती थी अगर कभी दस दिन के लिये भी ससुराल जाना पड़ता तो वो बस वापसी के दिन गिनती कि कब दिल्ली वापस जाये जबकि रश्मि की ससुराल में भरा पूरा परिवार था जो हर तरीके से सम्पन्न था। रश्मि भले ही चार दिन रूकती लेकिन वो लोग उसके लिए हर वो चीज उपलब्ध करते जो उसे चाहिए होती थी| जेठानी उससे पूछकर खाना बनाती, सब काम खुद ही करती लेकिन रश्मि को यही लगता कि यह चार दिन का दिखावा है| रश्मि की बेटी उसके मायके में हुई थी तो वह ससुराल सिर्फ़ पूजा करने गयी थी फिर गयी ही नहीं और बाद में अपने भाई के साथ दिल्ली चली गयी और वहाँ साल भर से बहाना बना कर टाल रही थी कि ससुराल न जाना पड़े लेकिन इस बार नितिन ने अचानक टिकट बुक कर ली तो अब तो जाना ही था|

रश्मि नितिन और कृषि गांव पहुंचे तो देखा कि बहुत बड़ा टेन्ट लगा है और रिश्तेदार पहले से ही बाहर स्वागत में खड़े हैं| रश्मि को लगा कि यह लोग आराम भी नहीं करने देंगे पहले ही भीड़ जमा कर रखी है| वो गाड़ी से पैर नीचे रखने लगी कि सासू माँ दौड़ कर आयीं और उसे रोका पहले पानी उतारा और फिर आरती उतारी और इसके बाद गाड़ी से बाहर आने को कहा| रश्मि की गोद से कृषि को कब ले लिया गया उसे पता भी नहीं चला| रश्मि बार बार कृषि को देखे की कहीं रो न रही हो लेकिन थोड़ी देर बाद उसे कृषि के खिलखिलाने की आवाज आयी| कृषि कभी भी ऐसे नहीं हंसती थी लेकिन आज अपने बाबा की गोद में जाकर वो सिर्फ खिलखिला रही थी| रश्मि कृषि को देखकर खुश हो गयी, घर में पूजा रखवायी गयी थी कृषि के लिए, तो बहुत लोग आये थे और जो कृषि दिल्ली में किसी अनजाने को देखकर रोने लगती आज वो ऐसे सबके पास जा रही थी जैसे हमेशा से जानती हो और हो भी क्यों न आख़िर वो उसका अपना परिवार था| होली तक घर में खूब धूमधाम रही और इस बार रश्मि को वहाँ अच्छा भी लगा लेकिन फिर भी कभी न कभी उसे वहाँ असमय औरतों का मिलने आना खलता लेकिन वह चुप रहती क्योंकि उसकी जेठानी सबका हँसते हुए स्वागत करती थी। जब तक नितिन था उसे वहाँ अच्छा लगता था लेकिन जैसे ही वो वापस गया उसका दिन काटना मुश्किल हो गया तो उसने अपने ससुराल में पूछ कर मायके जाने की इच्छा जताई तो पहले वो लोग उदास हो गये क्योंकि सभी कृषि से बहुत ज्यादा जुड़ गये थे लेकिन फिर भी रश्मि को हाँ कह दिया क्योंकि उनका मानना था कि बेटी और बहू घर की लक्ष्मी हैं जिन्हें हमेशा खुश रहना चाहिए फिर चाहे वो घर पर रहे या बाहर|

रश्मि अपने मायके फोन लगा रही थी पर फोन लग नहीं रहा था शायद नेटवर्क की समस्या थी लेकिन इजाजत मिल गयी थी तो वो खुश थी कि अब तो जाना ही है| रश्मि शाम को बाहर आयी तो देखा कि सासू माँ ने कृषि के लिए बहुत प्यारी कुर्ती और पटियाला सलवार बनायी थी और उसे पहना कर देख रही थी और सब लोग उनकी मदद कर रहे थे|

" देखो तो मेरी गुड़िया कितनी सुन्दर लग रही है, काजल ( रश्मि की ननद) जरा कजरा ले आना और वो नजर उतारने वाला सामान भी, कहीं मेरी नजर न लग जाये इसे " कहते हुए सासू माँ ने कृषि का माथा चूम लिया और उनकी आखें आंसू से भर गयीं|

" तुम बस अकेले ही प्यार करना, लाओ हमें हमारी परी, हम भी तो प्यार करें, गुडिया तुम मामा के घर जाकर किसी को तंग मत करना ठीक " कहते हुए ससुर जी ने कृषि को अपने काँधे पर बिठा लिया तो वो खिलखिला कर हँस पड़ी और उनक बालों को खींचने लगी| " पापा हमें भी तो दो ना, वैसे भी कृषि केवल अपनी बुआ से प्यार करती है, है ना कृषि, बोलो बुआ!!! " काजल ने अपने पापा से कृषि को मांगते हुए कहा तो कृषि ने भी अटकते हुए कहा, " बु  आ, बु  आ "|

"देखा देखा मुझे बुलाया " कहते हुये काजल ने कृषि को ले लिया और प्यार करने लगी " रश्मि यह सब देख रही थी कि उसकी जेठानी वहां आ गयी और बोली, " रश्मि तुम बहुत किस्मत वाली हो जो तुम्हें पहले बेटी हो गयी क्योंकि माँ पापा को हमेशा से एक पोती चाहिए थी पर मेरे दोनो बार बेटे ही हुए और वो उनसे प्यार भी बहुत करते हैं लेकिन अब समझ में आया कि जो रौनक बेटी से इस घर में हुई है वो अनमोल है, सच में कृषि के जाने के बाद हमारे घर में सन्नाटा छा जायेगा "| 

रश्मि ने धीरे से हां में सिर हिलाया और अपने कमरे में आ गयी और बीते दिनों को याद करने लगी कि किस तरह से सब उसका और कृषि का ध्यान रखते थे| गांव में कोई ज्यादा डाईपर नहीं प्रयोग करता था लेकिन उसकी बेटी के लिए पापा खुद बड़े बाजार जाकर लाये थे| माँ हर सप्ताह दो बार कृषि की नजर उतारती हैं और कृषि के होने के बाद से कभी रश्मि ढंग से सो नहीं पायी थी लेकिन ससुराल में वो आराम से सोती थी वो कृषि की तरफ से बिल्कुल बेफिक्र हो गयी थी और जो कृषि दिल्ली में अकेले चिड़चिड़ी होने लगी थी यहाँ पर बस वो खिलखिलाती रहती थी| सास ससुर ने कभी एहसास ही नहीं होने दिया कि रश्मि और उसकी जेठानी घर की बहुयें हैं, जेठानी ने हमेशा बहन की तरह प्यार दिया था ननद काजल भी हमेशा मान देती थी तो क्या कमी खुद उसमें है जो वो वहाँ रहना नहीं चाहती, ससुराल के प्यार को समझना नहीं चाहती थी, सोचते सोचते रश्मि की आंख भर आयी कि तभी उसके भाई का फोन आ गया तो उसका दिल धडकनें लगा कि क्या बात करेगी क्योंकि कहीं न कहीं अब वो ससुराल में रुकना चाहती थी, रश्मि ने फोन उठाया, " हैलो भैया कैसे हो, मैंने फोन किया था तो लगा नहीं " रश्मि ने कहा|

" हाँ दरअसल यहाँ नेटवर्क की समस्या है इसलिए, अचानक से मैसूर घूमने का प्रोग्राम बन गया तो सब लोग यहाँ आ गये, तुझे फोन किया था तो लगा नहीं, अब पन्द्रह दिन बाद घर आयेंगे तब सही से बात होगी| और बताओ कैसी हो ? घर कब आओगी ? पन्द्रह दिन बाद वापस आ जायेंगे तब आयेंगे तुम्हारे ससुराल " भैया ने कहा तो रश्मि एकदम से खुश हो गयी|

" कोई बात नहीं भैया, मैं यहाँ ठीक हूं, कोई जल्दी नहीं है आने की, मैं बता दूंगी जब आना होगा ठीक है, आप लोग आराम से घूम कर आओ " कहते हुए रश्मि ने फोन रखा और दौड़ते हुए बाहर गयी|

" पापा !! भैया और सब लोग मैसूर गये हैं और वो लोग पन्द्रह दिन बाद आयेंगे तो अभी मैं और कृषि यहीं रहेंगे " रश्मि ने खुश होकर कहा तो सब ऐसे खुश हो गये मानो कहीं का खजाना मिल गया हो|

" मतलब हमारी राजकुमारी अभी हमारे पास ही रहेगी, मजा आ गया " कहकर काजल ने कृषि को गोदी पर लेकर नाचने सी लगी और जेठानी के दोनों बेटे भी ताली बजाकर उछलने लगे| माँ और पापा तो अपने खुशी के आँसू भी नहीं छिपा पाये और वो मासूम कृषि जिसे कुछ भी नहीं पता था वो सबको हँसते देख खिलखिलाने लगी| रश्मि की जेठानी ने आकर रश्मि को गले लगा लिया और कहा, " चलो पन्द्रह दिन ही सही, मुझे मेरी बहन के साथ और समय बिताने का मौका मिलेगा "| जेठानी की बात सुनकर रश्मि की आँखो में आंसू आ गये| " मुझे माफ कर दो दीदी, मैंने कभी आप लोगों का प्यार समझने की कोशिश ही नही की, बस हमेंशा बहू की जिम्मेदारी से भागने की सोचती रही, भूल गयी कि अगर परिवार अच्छा है तो एक बहू के लिए उसका ससुराल जन्नत है " रश्मि ने कहा|

"चुप कर पागल, ऐसे नहीं रोते, हम लडकियो के साथ अक्सर ऐसा होता है क्योंकि जब हम ससुराल का नाम सुनते हैं तो हमें सिर्फ वहाँ की रोक टोक और बंदिशे ही नजर आती हैं और अधिकतर जगह होता भी है पर हम किस्मत वाले हैं कि हमारा ससुराल भले ही गांव में है लेकिन हमारे सास ससुर की सोच पुरानी नहीं है और वो अपनी बहुओं को बेटी समझते ही नहीं मानते भी हैं, चलो चलकर कुछ अच्छा बनाते हैं आखिर आज सबको तुमने इतनी बड़ी खुशी जो दी है " रश्मि की जेठानी ने कहा तो रश्मि हंसने लगी और जेठानी के साथ किचिन में चली गयी|

रश्मि पूरे तीन महीने अपने ससुराल में रही और बीच में दस दिनों के लिये मायके भी गयी| लेकिन उसका वहाँ ज्यादा मन नहीं लगा क्योंकि अब उसने अपनों के साथ रहकर उनके प्यार को समझा भी था और पूरी तरह से दिल में बसाया भी था| तीन महीने बाद नितिन रश्मि को लेने के लिए आये तो ससुराल वालों के साथ रश्मि की आँखो में आंसू थे और कृषि तो अपने बाबा को छोड़ ही नहीं रही थी| लेकिन जाना तो था ही, पर इस बार रश्मि ने सबको दिल्ली आने को कहा कि जब वो दिल्ली आयेंगे तो रश्मि उनके साथ वापस गांव आयेगी|

आखिर अब रश्मि को समझ आ गया था कि बिना किसी के साथ रहे आप उसका महत्व नहीं जान सकते।


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