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Super

Horror Thriller

4  

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Horror Thriller

रक्तपिशाचिनी :एक खौफनाक कहानी

रक्तपिशाचिनी :एक खौफनाक कहानी

4 mins
2

रात के ३:३० बजे थे...


चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था...


हवा भी जैसे रुक-रुककर चल रही थी...


एक सुनसान जगह पर...


एक जवान लड़का — प्रतीक — ज़मीन पर बैठा हुआ था।


उसके सामने जलता हुआ हवन कुंड...


आस-पास राख फैली हुई...


प्रतीक ने काँपते हाथों से राख उठाई...


और धीरे-धीरे उसे हवन कुंड में डाल दिया...


जैसे ही राख अग्नि में गिरी—


आग अचानक तेज़ भड़क उठी...


और उसी पल—


प्रतीक ने अपने कानों पर हाथ रख लिए!


उसे कुछ अजीब भाषा के शब्द सुनाई देने लगे...


तेज़... बहुत तेज़...


जैसे कोई उसके दिमाग के अंदर बोल रहा हो—


“आ... जा... आ... जा...”


अचानक—


एक लाल कपड़े का पल्लू हवा में उड़ता हुआ आया...


और सीधे प्रतीक के सीने पर आकर गिरा...


वो पूरी तरह गीला था...


प्रतीक की साँसें अटक गईं...


वो घबराकर उठा—


और बिना पीछे देखे वहाँ से भाग गया...


घर


प्रतीक हाँफता हुआ अपने घर पहुँचा...


दरवाज़ा खुलते ही उसकी बहन तृषा सामने खड़ी थी—


तृषा (चौंककर):


“भाई! ये आपने अपनी क्या हालत बना रखी है?”


लेकिन प्रतीक ने कोई जवाब नहीं दिया...


वो सीधा अपने कमरे में गया...


और चादर ओढ़कर लेट गया...


तृषा को उसका ये रवैया अजीब लगा...


पहली रात का डर


रात गहराती गई...


प्रतीक की आँखें बंद थीं...


लेकिन उसका शरीर काँप रहा था...


अचानक—


उसे अपने सामने एक औरत का साया दिखाई दिया...


उसकी आँखें लाल थीं


चेहरा गुस्से से भरा हुआ


और कपड़े... खून से भीगे हुए


वो धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी...


टप... टप... टप...


उसके कपड़ों से कुछ टपक रहा था...


वो प्रतीक के पास झुकी...


और उसके कान में फुसफुसाई—


“तुमने मुझे बुलाया है... अब मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगी...”


प्रतीक ने झटके से आँखें खोल दीं!


कमरे में कोई नहीं था...


लेकिन—


उसके सीने पर वही गीला लाल पल्लू रखा था...


अगली सुबह


तृषा ने देखा—


कमरे में राख फैली हुई थी...


और दीवार पर खून से एक अजीब सा चिन्ह बना हुआ था...


तभी प्रतीक उठा...


उसकी आँखें हल्की लाल चमक रही थीं...


असली खौफ शुरू


रात होते ही—


कमरे की लाइट टिमटिमाने लगी...


तृषा ने दरवाज़ा खटखटाया—


“भाई... आप ठीक हो?”


अंदर से आवाज़ आई—


“दरवाज़ा मत खोलना...”


लेकिन ये आवाज़... प्रतीक की नहीं थी...


दरवाज़ा अपने आप खुल गया...


तृषा अंदर गई—


और जम गई...


प्रतीक दीवार के पास खड़ा था...


चेहरा नीचे...


फिर उसने धीरे-धीरे चेहरा उठाया—


आँखें पूरी लाल


होंठों से खून टपकता हुआ


“तुमने उसे रोका क्यों नहीं...?”


तृषा डर गई—


“किसे...?”


प्रतीक की गर्दन टेढ़ी हो गई—


“मुझे... जब मुझे जलाया जा रहा था...”


पल्लू का श्राप


अचानक खिड़की खुली—


और वही लाल पल्लू उड़कर तृषा के हाथ में चिपक गया...


वो हटाने की कोशिश करती रही—


लेकिन वो उसकी त्वचा से चिपक गया...


उसी पल—


तृषा के दिमाग में अजीब दृश्य आने लगे—


एक औरत को आग में जलाया जा रहा है


लोग मंत्र पढ़ रहे हैं


और भीड़ में... प्रतीक खड़ा है...


सच्चाई का खुलासा


तृषा चीख उठी—


“मुझे सब याद आ रहा है...!”


“पिछले जन्म में... हमने उसे धोखा दिया था...”


कमरा काँपने लगा...


वो औरत सामने आ गई...


उसकी आँखों में आँसू थे—


“मैंने तुमसे प्यार किया था...”


“और तुमने मुझे जिंदा जला दिया...”


अंतिम सामना


कमरे की चीज़ें हवा में उठने लगीं...


दीवारों पर खून फैल गया...


लाल पल्लू दोनों को जकड़ने लगा...


प्रतीक चिल्लाया—


“हमें माफ कर दो!”


तृषा रोने लगी—


“हमसे गलती हो गई...”


कुछ पल के लिए सन्नाटा...


वो औरत उन्हें देखती रही...


अंतिम ट्विस्ट


अचानक—


वो हँस पड़ी...


“माफ़ी...?”


उसकी आँखें फिर से जल उठीं—


“अब बहुत देर हो चुकी है...”


खौफनाक अंत


अगले ही पल—


एक जोरदार चीख गूँजी


कमरा खून से भर गया


और सब कुछ शांत हो गया...


अगली सुबह


पड़ोसियों ने दरवाज़ा खोला...


अंदर कोई नहीं था...


न प्रतीक


न तृषा


बस दीवार पर खून से लिखा था—


“अब मैं वापस आ चुकी हूँ...”


आखिरी सीन


फिर...


रात के ३:३० बजे...


शहर के एक और घर में—


एक लड़का हवन कर रहा था...


और उसके पीछे...


धीरे-धीरे...


एक लाल पल्लू हवा में लहराने लगा...


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