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Horror Thriller

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रक्तपिशाचिनी : एक खौफनाक कहानी

रक्तपिशाचिनी : एक खौफनाक कहानी

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रात के 3:30  बज रहे थे।   एक जवान लड़का -  प्रतीक ज़मीन पर बैठा हुआ था।  उसने  राख़ ली और हवन कुंड में डाल दी।  तभी उसने अपने कानों पर हाथ रख लिए।  उसे कुछ अजीब भाषा वाले शब्द बड़ी तेज़ी से सुनाई दे रहे थे।  तभी एक लाल कपड़े का पल्लू उसके सीने पर आया। वो पूरी तरह से गीला था।  

   प्रतीक डर गया।  वो जल्दी से वहाँ से उठकर भागने लगा।   

 वो जल्दी से अपने घर गया।   उसकी बहन  तृषा उसका इंतज़ार कर रही थी।


तृषा -  भाई, यह आपने अपनी क्या हालत बना रखी हैं? 


प्रतीक बिना कुछ बोले जल्दी से  चादर ओढ़कर सो गया।  तृषा को प्रतीक का यह रवैया  थोड़ा अजीब लगा।   

वो जब सो रहा था।  तभी उसे अपने सामने किसी औरत का साया दिखाई दिया।  उस औरत की आँखे लाल थी।  मुँह पर एक भयानक -सा गुस्सा था।   


प्रतीक की आँखें बंद थीं… लेकिन उसका शरीर काँप रहा था। वह औरत धीरे-धीरे उसके पास आने लगी। उसके पैरों की कोई आवाज़ नहीं थी, बस गीले कपड़ों से टपकते खून जैसी आवाज़ आ रही थी। टप… टप… टप…


अचानक वह औरत प्रतीक के बिल्कुल पास आ गई। उसने झुककर उसके कान में कुछ फुसफुसाया, “तुमने मुझे बुलाया है… अब मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी…” प्रतीक ने झटके से आँखें खोल दीं।


कमरे में कोई नहीं था, लेकिन उसकी छाती पर वही गीला लाल पल्लू पड़ा हुआ था।


अगला सीन


सुबह, तृषा ने देखा कि कमरे में हल्की-हल्की राख फैली हुई थी और दीवार पर खून से एक अजीब सा निशान बना हुआ था। तृषा डरी हुई थी, “ये सब क्या हो रहा है…?"


तभी प्रतीक धीरे-धीरे उठता है, लेकिन इस बार उसकी आँखें हल्की लाल चमक रही थीं।


तृषा को पता चलता है कि प्रतीक जिस हवन कुंड के पास गया था, वहाँ पहले एक रक्तपिशाचिनी को जिंदा जलाया गया था। और वह किसी आत्मा को बुलाने की कोशिश कर रहा था… लेकिन कुछ गलत हो गया।


प्रतीक ने जैसे ही आँखें खोलीं, उसकी साँसें तेज़ चलने लगीं।


उसने अपने सीने पर रखा लाल पल्लू उठाया और देखा कि वह पूरी तरह से गीला था, लेकिन इस बार वह पानी से नहीं, खून से भीग गया था।


प्रतीक बहुत घबरा गया और पल्लू को तुरंत फेंक दिया।


तभी कमरे के कोने से एक धीमी और भयानक हँसी सुनाई दी, “हाहाहा…"।


प्रतीक धीरे-धीरे उस तरफ देखने लगा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।



बाहर से तृषा की आवाज़ आई—


तृषा:


“भाई… तुम ठीक हो ना?”


प्रतीक कुछ कहने ही वाला था कि उसकी आवाज़ अचानक बदल गई।


उसकी आवाज़ अब भारी और डरावनी थी।


“दरवाज़ा मत खोलना…”


तृषा चौंक गई। उसे एहसास हुआ कि ये उसके भाई की आवाज़ नहीं थी।


💀 यह पहला बड़ा डरावना पल था।


तभी दरवाज़ा अपने आप धीरे-धीरे खुल गया।


तृषा ने अंदर झाँका और उसकी आँखें डर से चौंधिया गईं।


प्रतीक दीवार के कोने में खड़ा था, उसका चेहरा नीचे की ओर झुका हुआ था और उसके बाल उसके चेहरे पर बिखरे हुए थे।


फिर उसने धीरे से अपना चेहरा उठाया।


👉 उसकी आँखें पूरी तरह से लाल हो गई थीं।


👉 उसके होंठों के किनारे से खून टपक रहा था।


⚡ एक सस्पेंस भरा ट्विस्ट आया।


अचानक प्रतीक मुस्कुराया, लेकिन वह मुस्कान उसकी नहीं थी।


“तुमने उसे रोका क्यों नहीं…?”


तृषा डर के मारे पीछे हट गई।


“क…किसे…?”


प्रतीक की गर्दन किसी अजीब तरीके से एक तरफ झुक गई।


“मुझे… जब मुझे जलाया जा रहा था…”।



तृषा के हाथ-पैर ठंडे पड़ चुके थे और वह धीरे-धीरे पीछे हट रही थी। लेकिन अचानक दरवाज़ा धड़ाम से बंद हो गया और कमरे की लाइट अपने आप टिमटिमाने लगी। तृषा काँपती हुई बोली, “भाई, ये आप नहीं हो ना?"


प्रतीक कुछ सेकंड तक चुप खड़ा रहा, फिर उसकी गर्दन सीधी हो गई और वह तेज़ी से तृषा की तरफ बढ़ा। इतनी तेज़ कि जैसे वह चल नहीं रहा था, बल्कि फिसल रहा था। तृषा ने डर के मारे आँखें बंद कर लीं, लेकिन जब उसने आँखें खोली, तो प्रतीक उसके बिल्कुल सामने था। उसका चेहरा सिर्फ कुछ इंच दूर था और वह हँस रहा था।


"तुम डरती क्यों हो? मैं तुम्हारा भाई ही तो हूँ,” प्रतीक ने कहा। लेकिन उसकी आवाज़ में कुछ अजीब था, जैसे कि दो लोग एक साथ बोल रहे थे। तृषा ने नीचे देखा, तो प्रतीक के पैरों के पास खून जमा हो रहा था और वह खून धीरे-धीरे फर्श पर फैलकर एक चिन्ह बना रहा था। तृषा चिल्ला उठी, “ये वही चिन्ह है!"


तृषा को याद आया कि सुबह दीवार पर भी यही चिन्ह बना था। प्रतीक ने उसका हाथ पकड़ लिया, जो बर्फ जैसा ठंडा था। “तुमने मुझे पहचाना नहीं तृषा,” प्रतीक ने कहा। तृषा रोते हुए पूछा, “तू कौन है?” प्रतीक की आँखें और चमक उठीं और उसने कहा, “मैं वो हूँ जिसे तुम दोनों ने मिलकर बुलाया था।"


तृषा हैरान रह गई और उसने कहा, “हमने? मैंने तो कुछ नहीं किया!” अचानक कमरे में हवा तेज़ चलने लगी और खिड़की अपने आप खुल गई। बाहर से एक लाल कपड़े का पल्लू उड़ता हुआ अंदर आया और सीधे तृषा के हाथ में आकर चिपक गया। तृषा ने झटके से उसे हटाने की कोशिश की, लेकिन वह उसकी त्वचा से चिपक गया, जैसे कि ज़िंदा हो।


प्रतीक धीरे-धीरे पीछे हटने लगा और मुस्कुराते हुए बोला, “अब तुम भी महसूस करोगी - जलना, दर्द, और धोखा।” तृषा की आँखों के सामने अचानक फ्लैशेज़ आने लगे - आग में जलती एक औरत, लोग उसे घेरकर मंत्र पढ़ रहे थे, और वहाँ खड़ा एक लड़का था, जिसका चेहरा धीरे-धीरे साफ़ हुआ और वह प्रतीक था।


तृषा ज़ोर से चिल्लाई, “नहीं!” और उसी पल, उसकी आँखें भी हल्की लाल चमकने लगीं। कमरे में दोनों खड़े थे - प्रतीक और तृषा, दोनों की आँखें बदल चुकी थीं। और कोने में अंधेरे में, वह औरत खड़ी थी, धीरे-धीरे ताली बजाते हुए, “अब खेल शुरू होगा..."।


कमरे में अंधेरा और गहरा हो चुका था। तृषा और प्रतीक दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। दोनों की आँखें लाल थीं और साँसें भारी थीं। कोने में खड़ी वो औरत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। उसके कदमों के साथ फर्श पर खून की लकीर बनती जा रही थी।


"अब समय आ गया है,” उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूंज उठी।


तृषा अचानक ज़ोर से चिल्लाई, “मुझे सब याद आ रहा है!” प्रतीक उसकी तरफ घूमा और पूछा, “क्या?” तृषा की आँखों से आँसू बहने लगे और उसने कहा, “वो औरत... वो... हमारी दुश्मन नहीं है।"


कमरे में सन्नाटा छा गया। तृषा काँपती हुई बोली, “पिछले जन्म में... हम दोनों ने उसे धोखा दिया था।” अचानक कमरे में तेज़ हवा चलने लगी और तृषा की आवाज़ गूंजने लगी। “वो हमसे प्यार करती थी,” तृषा ने कहा। “लेकिन हमने उसे तांत्रिकों के हवाले कर दिया और उसे ज़िंदा जला दिया गया।"


प्रतीक के चेहरे पर डर साफ दिखने लगा और उसने कहा, “न... नहीं... ये झूठ है।” लेकिन वो औरत अब बिल्कुल सामने आ चुकी थी। उसकी आँखों में आँसू थे और गुस्सा भी। “मैंने तुमसे सिर्फ प्यार माँगा था,” उसने कहा। “और तुमने मुझे आग दे दी।"


उसने अपने दोनों हाथ फैलाए और एक भयानक चीख के साथ कमरे की सारी चीज़ें हवा में उठने लगीं। दीवारों पर खून फैल गया और वो लाल पल्लू दोनों को जकड़ने लगा। प्रतीक चिल्लाया, “हमें माफ कर दो!” तृषा भी रोने लगी और कहा, “हमसे गलती हो गई थी।"


कुछ पल के लिए सब शांत हो गया और वो औरत उन्हें घूरती रही। फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे का गुस्सा कम होने लगा। लेकिन अचानक उसने जोर से हँसी और कहा, “माफ़ी...?” उसकी आँखें फिर से भड़क उठीं और उसने कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है।"


अगले ही पल पूरा कमरा खून से भर गया, एक जोरदार चीख सुनाई दी और सब कुछ शांत हो गया। अगली सुबह पड़ोसियों ने घर का दरवाज़ा खोला और अंदर का नज़ारा देखकर सबकी रूह काँप गई। कमरा खाली था, न प्रतीक और न ही तृषा। बस दीवार पर खून से लिखा था, “अब मैं वापस आ चुकी हूँ।"


रात के 3:30 बजे शहर के एक और घर में एक लड़का हवन कर रहा था और उसके पीछे धीरे-धीरे एक लाल पल्लू हवा में लहराने लगा।


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