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Ravi Kumar

Abstract Horror Fantasy Others

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Ravi Kumar

Abstract Horror Fantasy Others

रक्तिम चंद्रमा का जन्म

रक्तिम चंद्रमा का जन्म

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अम्बावती नगरी की गलियाँ सूनी थीं। उस रात अमावस्या थी, पर आकाश में चंद्रमा था, रक्तिम, लाल, मानो किसी देवता ने अपना रक्त आकाश में छिड़क दिया हो। नगर के चौराहों पर लगे दीपक बुझ चुके थे, मानो स्वयं अग्निदेव भी उस भयानक दृश्य को देखने से डर रहे हों।

पक्षी अपने नीड़ों में चुप थे, कुत्तों ने भौंकना बंद कर दिया था, और नदी की लहरें भी थम गई थीं, जैसे प्रकृति स्वयं साँस रोककर किसी अद्भुत घटना की प्रतीक्षा कर रही हो। नगर के लोग अपने घरों में दुबके थे, खिड़कियों की सलाखों से झाँक रहे थे, क्योंकि उन्होंने जीवन में ऐसा चंद्रमा कभी नहीं देखा था।

कुछ बूढ़ों ने यह भी कहा कि उनके दादाओं ने बताया था कि ऐसा चंद्रमा तब उगता है जब कोई देवता या असुर पृथ्वी पर जन्म लेने वाला हो, और वह जन्म संपूर्ण भारतवर्ष का भाग्य बदल देगा। बूढ़े ज्योतिषी, जिनका नाम आचार्य देवदत्त था, महल के बाहर खड़े थे और आकाश को निहार रहे थे।

उनकी दाढ़ी सफेद थी, आँखों में ज्ञान की चमक थी, और हाथ में एक प्राचीन ज्योतिष ग्रंथ था, जो पीढ़ियों से उनके परिवार में चला आ रहा था। उन्होंने ग्रंथ के पन्ने पलटे और फिर आकाश की ओर देखा। उनके होंठ काँपने लगे, आँखों में आँसू आ गए।

उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि यह चंद्रमा व्याघ्र के नाखून जैसा है, जो अपने शिकार को छेदने से पहले उस पर चमकता है। यह रक्तिम चंद्रमा इस बात का प्रतीक है कि आज रात जो जन्म लेगा, वह न सामान्य होगा, न कमजोर, बल्कि वह शक्तिशाली होगा, इतना शक्तिशाली कि पूरा ब्रह्मांड उसके चारों ओर घूमेगा।

राजा गंधर्वसेन के महल की सबसे ऊँची मीनार पर खड़ी रानी मृणालिनी अपने गर्भ की पीड़ा से कराह रही थीं। उनकी साड़ी पसीने से तर थी, बाल बिखरे हुए थे, और चेहरे पर पीड़ा के साथ-साथ एक अजीब सी चमक भी थी, मानो वह किसी दैवीय शक्ति को अपने भीतर समेटे हुए हों।

दस महीने बीत चुके थे, फिर भी बालक का जन्म नहीं हो रहा था। राज्य की प्रसिद्ध प्रसूति विशेषज्ञ दाई शांतिदेवी ने कहा कि यह गर्भ सामान्य नहीं है, इसमें कोई अलौकिक शक्ति है, जो समय से पहले बाहर नहीं आना चाहती। राजा गंधर्वसेन स्वयं चिंतित थे, वे मीनार के नीचे खड़े होकर ऊपर देख रहे थे, उनके हाथ जुड़े हुए थे और वे देवताओं से प्रार्थना कर रहे थे।

उनकी चारों रानियों के पुत्र पहले ही पैदा हो चुके थे, पर ब्राह्मणी रानी का गर्भ किसी रहस्य की तरह था। क्षत्राणी रानी ने शंख, विक्रम और भर्तृहरि को जन्म दिया था। वैश्या रानी ने राज्य का सबसे सुंदर पुत्र उत्पन्न किया था। शूद्रा रानी ने एक बलशाली योद्धा को जन्म दिया था। पर ब्राह्मणी रानी मृणालिनी दस महीने से गर्भवती थी और अभी तक प्रसव नहीं हुआ था।

राजा गंधर्वसेन के मन में अनेक प्रश्न थे। क्या यह बालक श्रापित है? क्या यह जीवित पैदा होगा? क्या यह राज्य के लिए अमंगल लाएगा? उनके मन में भय था, पर उनके हृदय में एक अजीब सी आशा भी थी, मानो कोई आवाज कह रही हो कि इस रात जो होगा, वह अद्भुत होगा।

उसी रात, पूरे अम्बावती में अचानक रक्तिम पुष्प खिल गए। वह पुष्प जो हज़ार वर्षों से किसी ने नहीं देखा था। प्राचीन ग्रंथों में उन्हें पुष्परक्त कहा गया था, और कहा गया था कि जब ये खिलें, तो समझो कि कोई विद्याधर कन्या या कोई देवी पृथ्वी पर अवतरित होने वाली है।

यह पुष्प पानी में खिलते थे, पत्थर पर खिलते थे, यहाँ तक कि हवा में भी। लोगों ने देखा कि उनके घरों की दीवारों पर, बर्तनों में, यहाँ तक कि उनके कपड़ों पर भी ये पुष्प खिल आए थे। कोई इन्हें छूता तो ये गायब हो जाते, पर कुछ क्षण बाद फिर कहीं और प्रकट हो जाते।

नगर के कुएँ का पानी लाल हो गया था, नदी की धारा में रक्तिम लहरें उठ रही थीं, और आकाश में बादल भी लालिमायुक्त हो गए थे। बच्चे रोने लगे, और बड़े भय से काँपने लगे। राजगुरु विश्वरूप, जो वास्तव में राज्य के सबसे बड़े ज्योतिषी थे, ने जब यह देखा तो उनके हाथ काँप उठे।

उन्होंने तुरंत अपने वैदिक मंत्रों का पाठ करना शुरू किया और यज्ञ की अग्नि में आहुति दी। उन्होंने पहचान लिया था कि यह पुष्परक्त है, जो सिर्फ विद्याधरों के राज्य में खिलता है। इसका अर्थ है कि कोई विद्याधर कन्या पृथ्वी पर जन्म लेने वाली है। वह कन्या पूरे भारतवर्ष का भाग्य बदल देगी।

राजगुरु विश्वरूप महल की ओर दौड़े। उन्होंने राजा गंधर्वसेन से कहा कि यह कोई सामान्य जन्म नहीं है, यह एक दैवीय जन्म है। राजा के आँखों में आश्चर्य और भय दोनों थे। उन्होंने पूछा कि क्या यह बालिका उनके राज्य के लिए शुभ होगी या अशुभ। राजगुरु ने कहा कि यह बालिका जिसके साथ होगी, वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा, और जो उसके विरुद्ध होगा, वह नष्ट हो जाएगा।

उसी क्षण, मीनार से एक बालिका का क्रंदन गूँजा। वह क्रंदन इतना तीक्ष्ण था, मानो वह आकाश को चीर रहा हो। रानी मृणालिनी ने एक पुत्री को जन्म दिया था। दाई शांतिदेवी ने बच्ची को उठाया तो उसके हाथ काँप गए, क्योंकि बच्ची के शरीर पर एक अजीब सी चमक थी, मानो उसके भीतर कोई ज्योति जल रही हो।

पर वह सामान्य बालिका नहीं थी। उसके नाभि पर एक लाल तिल था, जो रक्त के फूल की आकृति का था। उसकी आँखें खुली हुई थीं, और वह इधर-उधर देख रही थी, मानो वह इस दुनिया को पहचानती हो। उसके हाथ-पाँव हिल रहे थे, और उसके मुँह से अजीब सी ध्वनि निकल रही थी, जो किसी मंत्र की तरह लग रही थी।

राजा गंधर्वसेन ने जब उसे देखा तो उनकी आँखों में आँसू थे। वह दौड़कर मीनार पर गए और अपनी पुत्री को गोद में लिया। उन्होंने उसके माथे पर चूमा और कहा कि तुम साधारण नहीं हो, तुम महान हो। उन्होंने उसका नाम रखा रक्तमंजरी, क्योंकि उनके नाभि पर रक्तिम फूल का तिल था, और वह सुबह की कली की तरह सुंदर थी।

राजगुरु विश्वरूप ने जब बालिका का जन्म कुंडली देखी तो वे स्तब्ध रह गए। उन्होंने कहा कि इस बालिका में विद्याधरों की शक्तियाँ हैं, वह अमर नहीं है, पर उसकी आयु अत्यधिक लंबी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस बालिका के कारण अम्बावती का नाम पूरी दुनिया में होगा, पर इसके लिए उसे अनेक संघर्षों से गुजरना होगा।

नगर के लोग अगली सुबह जब बाहर निकले तो सारे रक्तिम पुष्प मुरझा चुके थे। नदियों का जल सामान्य हो चुका था, और आकाश में सूर्य उदय हो रहा था, मानो कुछ हुआ ही न हो। परंतु रक्तिम चंद्रमा की वह रात कोई भूला नहीं। लोग चौराहों पर खड़े होकर उस रात की चर्चा कर रहे थे, और उनके मन में भय और आश्चर्य दोनों थे।

उस रात जन्मी बालिका के बारे में भविष्यवाणी थी कि वह सिंहासन बत्तीसी की अंतिम पुतली को जीवंत करेगी। जो भी उसके संग होगा, वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा, और वह सम्राट पूरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बाँधेगा। राजगुरु विश्वरूप ने राजा से कहा कि इस बालिका की रक्षा करो, क्योंकि शत्रु उसे मारने का प्रयास करेंगे।

राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह रक्तमंजरी को जीवन भर बचाएगा, चाहे उसे अपना जीवन ही क्यों न देना पड़े। उन्होंने महल में सबसे सुरक्षित कक्ष बालिका को दिया, और चारों ओर पहरेदार लगा दिए। पर उसे यह नहीं पता था कि उसकी ही सभा में बैठा ब्रह्मवीत इस बालिका का सबसे बड़ा शत्रु बनेगा।

ब्रह्मवीत राज्य का दीवान था, और वह राजा का सबसे भरोसेमंद व्यक्ति माना जाता था। पर उसकी महत्वाकांक्षा असीमित थी। वह चाहता था कि राजा का कोई उत्तराधिकारी न हो, ताकि वह स्वयं राज्य पर अधिकार कर सके। जब उसे पता चला कि रानी मृणालिनी ने एक पुत्री को जन्म दिया है, तो उसने अपनी मुट्ठी भींच ली और उसके मन में एक भयानक योजना बनने लगी।

अगले दिन, जब राजा ने दरबार में रक्तमंजरी के जन्म की घोषणा की, तो ब्रह्मवीत ने मीठी मुस्कान के साथ बधाई दी, पर उसकी आँखों में विष था। उसने सोचा कि यह बालिका उसके लिए खतरा है, और जो खतरा है, उसे समाप्त कर देना चाहिए। पर उसे यह नहीं पता था कि रक्तमंजरी केवल एक साधारण बालिका नहीं थी, वह विद्याधर राजकुमारी थी, और उसके पास ऐसी शक्तियाँ थीं, जो ब्रह्मवीत की कल्पना से भी परे थीं।

रक्तमंजरी का जन्म अम्बावती के लिए एक नए युग की शुरुआत थी। उस रात रक्तिम चंद्रमा जिसने अम्बावती के आकाश को लाल कर दिया था, वह स्वयं उस बालिका का प्रतीक था, जो अपने रक्त और आत्मा से पूरे भारतवर्ष को एक नई दिशा देने वाली थी। पर उस मार्ग में अनेक काँटे थे, अनेक रहस्य थे, और अनेक शत्रु थे, जो उसे रोकने के लिए तत्पर थे। रक्तमंजरी की कथा अभी शुरू हुई थी, और उसके प्रत्येक दिन में एक नया रहस्य, एक नई चुनौती और एक नया आश्चर्य था।

Continued  next  Chapter.......


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