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Sandhya Sugamya

Inspirational


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Sandhya Sugamya

Inspirational


"रानी"

"रानी"

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माथे पर छोटी सी लाल बिंदी, माँग में सिन्दूर भरे, एक सादी सी गुलाबी साड़ी में लिपटी जो लड़की मेरे घर के दरवाज़े पर खड़ी कुछ कह रही थी, वह अठारह साल की तो कतई नहीं हो सकती। मैंने उसकी बात अनसुनी करते हुए कहा, "तुम शादीशुदा हो?" उसने मुस्कुराते हुए कहा,"हाँ" तो मैं अपने ही प्रश्न पर झेंप सी गयी। यहाँ कोई फैंसी ड्रैस प्रतियोगिता तो हो नहीं रही थी जिसके लिए उस बच्ची ने यह रूप धरा था। मैंने पूछा, "मेरा मतलब है कि कब हुई तुम्हारी शादी और कितने साल की हो तुम?" वह उसी कोमलता से बोली," दो महीने पहले हुई हमारी शादी और हम सोलह साल के हैं।"


ओहो, मैं सोच में पड़ गयी फिर एक बच्ची की शादी! उसकी आवाज़ सुनकर मेरी तन्द्रा भंग हुई। वह कह रही थी,"आँटी, आपको काम वाली की जरूरत है न, मुझे रख लो। मुझे सब काम आता है।"

"तुम्हें! पर तुम तो अभी बहुत छोटी हो!"

"आंटी, सब ऐसे ही कह देते हैं। पर हमें सब काम आता है। हमें रख लो न आंटी। उसने खुशामद सी करते हुए कहा तो मुझे अपनी सोलह साल की बेटी का ध्यान आ गया, जिसकी फरमाइशें ही खत्म नहीं होती थीं। आज यह तो कल वह। घर की इकलौती बच्ची जिस प्यार में पल रही थी, उसके नक्शे दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जाते थे।

"तुम्हारा नाम क्या है और तुम कहाँ रहती हो?" मेरे पूछने पर उस बच्ची को लगा कि मैं उसे काम पर रखने को राजी हो गई हूँ। वह बड़े उत्साह से बोली," हमारा नाम रानी है, और हम पाँच नंबर की कोठी में रहते हैं। पर जब मैंने कहा कि देखूँगी,अगर तुम्हारे लायक कोई काम दिखेगा तो बता दूँगी तुम्हें, तो यह सुनकर उसके मासूम से चेहरे पर उदासी छा गयी। वह चली तो गयी, लेकिन मेरे मन में उथल पुथल मचा गयी। इतनी छोटी सी उम्र में शादी और अब काम की तलाश। कानून के हिसाब से न तो वह अभी शादी के लायक थी और न ही मेहनत मजदूरी के लायक। पता नहीं उसके माँ बाप की ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो उन्होंने इस प्रकार उससे पीछा छुड़ा लिया था।

जैसे जैसे दिन बीतने लगे, रानी की तसवीर भी मेरे दिमाग में धुंधली सी होने लगी। करीब दो साल बाद एक सुबह पार्क में घूमते हुए मुझे किसी ने 'आँटी' कहकर आवाज़ दी तो मैं ठिठक गयी। देखा पार्क की ढाई फ़ीट की बाहरी दीवार से लगकर रानी खड़ी हुई है। वह बोली, "आँटी!आपको याद है कि हम बहुत पहले आप के पास आये थे काम माँगने के लिए, अब तो हम बड़े भी हो गए हैं, अब तो आप रख लो न हमें।" 

मैंने पूछा कि क्या वह दो साल से कहीं काम कर रही थी?

उसने बताया कि एक दो काम उसे मिले थे पर वह कहीं टिक नहीं पाई क्योंकि वहाँ बहुत ही ज्यादा काम करना पड़ता था।पता नहीं क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि मैं उसे अच्छा काम दे सकती हूँ।अजीब कशमकश वाली स्थिति थी मेरी। उससे काम करवाना मुझे नैतिक दृष्टि से सही नहीं लग रहा था। लेकिन उसे काम न दिलवाकर भी मैं उसका क्या भला कर रही थी। आखिर पेट भरने के लिए उसे कुछ काम तो करना ही था। फिर मैं उससे उसकी पढ़ाई के बारे में पूछ चुकी थी। वह केवल पाँचवी पास थी। कोई बेहतर काम मिलने की उम्मीद भी भला कैसे की जा सकती थी। उसे फिर एक बार झूठा आश्वासन देकर मैंने अपने घर की ओर रुख किया।

अगले ही दिन मुझे पता चला कि मेरी पड़ोसन मिसेज शर्मा की बहू अचानक अस्पताल में भर्ती हो गयी है। शाम को मैं उसे देखने अस्पताल पहुँची तो मुझे पता चला कि उनके घर में एक कन्या ने जन्म लिया है। मैंने मिसेज शर्मा को पोती के जन्म की बधाई दी तो वे खुश भी नज़र आईं और चिंतित भी।दरअसल उनकी बहू की डिलीवरी में अभी पन्द्रह बीस दिन का समय शेष था। लेकिन अचानक बच्चेदानी से खून जाने लगा तो उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ गया। माँ और बच्चे की जान बचाने के लिए डॉक्टर को इमरजेंसी ऑपरेशन करना पड़ा।

हालाँकि अब खतरा टल गया था। माँ और बच्ची दोनों ठीक थे। पर उनकी परेशानी का कारण यह था कि वे अचानक से आ गए इस काम को सँभालने के लिए अकेली पड़ गयी थीं। पन्द्रह दिन बाद उनकी बेटी मुम्बई से आने वाली थी। वह उनके साथ बहुत सा काम सम्भाल लेती। पर अब वह अचानक से आयी इस स्थिति में तुरंत तो नहीं आ सकती थी। बच्चों के स्कूल खुले हुए थे और रिजर्वेशन भी आगे की तारीख का था।

इधर मिसेज शर्मा की इस इकलौती बहू का पहला बच्चा यानि मिसेज शर्मा का पोता अभी सिर्फ डेढ़ साल का था। उसे भी पूरी देखभाल की जरूरत थी।


जब मिसेज शर्मा ने अपने पोते को सम्भालने के लिए किसी की जरूरत की बात की तो मुझे रानी का खयाल आ गया। रानी बच्चे को तो सम्भाल ही सकती थी। सम्भव है कि उसने अपने छोटे भाई बहिनों को भी सम्भाला हो। फिर मिसेज शर्मा बड़ी अच्छी महिला थीं। मैं जानती थी कि वे रानी की छोटी उम्र का खयाल रखते हुए उस पर काम का अधिक बोझ नहीं डालेंगी। और उसे प्यार से रखेंगी। छोटे मोटे कामों में उससे मदद लेकर उनका भी काम हो जायेगा और रानी को भी काम मिल जायेगा।

जब मैंने उन्हें रानी के बारे में बताया तो वे बहुत खुश हो गईं और बोलीं कि मैं उसे जल्दी से जल्दी बुला दूँ। मैं जब अस्पताल से बाहर निकली और मैंने ऑटो पकड़ा तो मेरे दिमाग में रानी की ही बातें चल रही थीं। ऑटो स्टैंड पर पहुँचकर जब मैं नीचे उतरी तो मेरे कदम स्वाभाविक रूप से अपने घर कीओर न जकर रानी के घर की ओर मुड़ गए।


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