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Sandhya Sugamya

Inspirational


5.0  

Sandhya Sugamya

Inspirational


"अधूरे सपने"

"अधूरे सपने"

7 mins 399 7 mins 399


बरखा उच्च मध्य वर्ग से आयी एक संस्कारी लड़की थी। उसके सपने इतने ऊँचे नहीं थे, जिन्हें उसका इंजीनियर पति प्रशान्त पूरे न कर पाए। एक सीधी सादी, प्यार से सराबोर जिन्दगी की कल्पना की थी बरखा ने। परन्तु उनकी शादी के तुरन्त बाद प्रशान्त के पिता को अचानक दिल का दौरा पड़ा और वे दुनिया से चले गए। और साथ ही ले गए प्रशान्त और बरखा के जीवन के सारे रंग। सारी जिम्मेदारी अचानक प्रशान्त के कन्धों पर आ पड़ी। हनीमून के टिकट कैंसिल कराकर दोनों घर और घरवालों को सँभालने में लग गए। बरखा उन लोगों में नहीं थी, जो ससुराल वालों को पराया समझती हैं। उसने अपने सपनों को उठाकर मन की अलमारी में ऐसे रख दिया जैसे शादी का लहँगा और जेवर उठाकर रख दिए हों। प्रशान्त का अब एक ही सपना था, पापा की कच्ची गृहस्थी को पार लगाना और यह काम बरखा के सहयोग के बिना संभव नहीं था।

मम्मी पर जो दुखों का पहाड़ टूटा था, उसे तो कोई नहीं रोक सका था, किन्तु प्रशान्त और बरखा ने जिस तरह से सारे घर की जिम्मेदारी उठा ली थी , उससे मम्मी को सँभलने में बहुत मदद मिली थी। एक साल बीतने पर प्रशान्त ने अपनी बहन साधना की शादी कर दी थी। पापा के प्रोविडेंट फण्ड की सारी रकम इस शादी में खर्च हो गयी थी। अब उससे चार साल छोटी बहन अर्चना की शादी के लिए पैसे जोड़ने थे। फिर छोटे भाई समीर और अर्चना के कॉलेज की पढाई का भी खर्च था। प्रशान्त पाई पाई जोड़कर रखता। बरखा भी उसका साथ देती। लेकिन जल्दी जल्दी दो बच्चे हो जाने से बरखा की भी आवश्यकताएं बढ़ रही थीं। जब भी वह किसी खर्चे की बात करती, प्रशान्त और उसका झगड़ा हो जाता। उसकी छोटी छोटी जरूरतें भी प्रशान्त को जरुरी नहीं लगतीं, वह उसे किफ़ायत का भाषण देकर या डाँट डपटकर चुप करा देता।

समय बीतता गया। छोटी बहन उमा की भी शादी हो गयी। भाई समीर का जॉब लग जाने पर उसकी भी शादी हो गयी। उसकी पत्नी तूलिका ज्वाइंट फैमिली में नहीं रहना चाहती थी। जल्द ही समीर और तूलिका ने अपनी अलग गृहस्थी बसा ली।

मम्मी की उम्र का तकाजा था। वे बीमार होतीं तो प्रशान्त और बरखा ही तो उनके अपने थे। वही उनकी सेवा करते। उनके इलाज में एक खासी रकम खर्च हो जाती। पर जन्म देने वाली और पालपोस कर बड़ा करने वाली माँ के आगे वे पैसे का मुँह थोड़े ही देखते। इधर इनके बच्चे आस्था और विश्वास बड़े हो रहे थे। उनके भविष्य की चिन्ता करने कौन आगे आता। वे तो इन दोनों की ही जिम्मेदारी थे। साधना और उमा दोनों के घर हर सुख दुख में जी भी खर्च की जरूरत होती, प्रशान्त ही हाजिर रहता। समीर से कौन कहे। वह छोटा था और अभी उसकी गृहस्थी कच्ची थी, प्रशान्त और मम्मी दोनों का यही कहना था।

शादी के तुरंत बाद के किसी संवेदनशील क्षण में प्रशान्त ने बरखा से कहा था, "हनीमून पर नहीं जा पाए तो क्या हुआ, घर का माहौल थोड़ा ठीक हो जाये तो हम घूमने चलेंगे। पर वह समय फिर आया ही नहीं। समय बदलता गया। जिम्मेदारियों के नाम बदलते रहे। एक दिन मम्मी भी भगवान के पास चली गईं। घर में बड़ा सूनापन आ गया।

कुछ समय बाद आस्था को कॉल सेंटर पर अच्छा जॉब भी मिल गया और मनपसंद जीवनसाथी भी। बेटी की पसंद को उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया, और उन दोनों की शादी करके अपनी आधी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए। विश्वास चार्टर्ड अकॉउनटेन्ट बन गया था। अब उसकी प्रैक्टिस भी अच्छी चल निकली थी। वह सिंपल हाउस वाइफ ही चाहता था। प्रशान्त के एक दोस्त के माध्यम से तान्या का रिश्ता आया। तान्या उन्हें पसन्द आ गयी। कुछ ही समय बाद तान्या उनके घर बहू बनकर आ गयी।

आज विश्वास और तान्या हनीमून पर जा रहे थे। जाने से पहले पैर छूने आये तो प्रशान्त ने आशीर्वाद देते हुए कहा," जाओ, खूब घूमो फिरो, यही तो उम्र है घूमने की। सीधे सादे ढंग से कही बात न जाने क्यों बरखा के दिल को लग गयी। आँखों में आँसू आ गए। जल्दी से दोनों को आशीर्वाद देकर पीछे मुड़ गयी, कहीं तान्या ने आँसू देख लिए तो पता नहीं क्या मतलब समझेगी इसका।

अब बरखा को लगने लगा था कि वे वाकई अब अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए हैं। एक नयी नवेली ब्याहता का सा अल्हड़पन जाग उठा उसमे, और वह बड़े मनुहार से प्रशान्त से बोली,"सुनो जी, अब तो हमने अपनी जिम्मेदारियाँ भी पूरी कर ली हैं। चलो, अब देश दर्शन के लिए चलते हैं। मेरी दक्षिण भारत जाने की बड़ी तमन्ना है। चलो अब घूम आएं। प्रशान्त ने उसकी तरफ देखा और हँसकर बोला,"बाल सफेद हो रहे हैं, तुम्हारे पैरों में दर्द बना रहता है। अब क्या घूमने की उम्र रह गयी है तुम्हारी?

सुनकर बरखा सन्न सी रह गयी। ऐसा लगा जैसेअचनाक ओले पड़ गए हों।अंदर जाकर शीशे के आगे खड़ी हो गयी। दो बूँद आँसू गालों पर लुढ़क आये। उसे लगा कि तान्या आ रही है, तो झटपट आँसू पोंछ लिए।

जिम्मेदारी मानो तो है और मानने वाले के लिए जिम्मेदारियाँ एक चक्रव्यूह की तरह होती हैं, एक पूरी की तो दूसरी आ गयी। यही हाल बरखा का था। बड़ी जल्दी ही पता चला कि तान्या इस घर में एक नन्हा मेहमान लाने वाली है। घर ख़ुशी से भर उठा।लेकिन तान्या की तबियत बहुत ख़राब रहने लगी। उससे खाना नहीं खाया जाता और वह बहुत कमजोरी भी महसूस कर रही थी। ऐसे में कोई तेज तर्रार सास होती तो बहू को चार बातें सुनाती यह कहकर कि "तुम कोई अनोखा काम नहीं कर रही हो। बच्चे तो हमने भी पैदा किये पर मजाल क्या कि कोई काम छोड़ा हो।" पर बरखा ने सोचा कि वह सास बनकर नहीं रहेगी, बल्कि सासू माँ बनकर रहेगी।

वह तान्या का पूरा ख्याल रखती। उसके लिए वही खाने को बनाती जो उसका खाने का मन करता। रोज उसे निशास्ता देती। दही दूध पनीर को अलग अलग तरह से बनाकर उसे खिलाती जिससे उसका मन न ऊबे और पौष्टिक तत्व उसको मिलते रहें। तान्या भी अब बेफिक्री से अपनी इच्छा उसको बता देती। उसने तान्या को वह प्यार दिया जिसकी उसने कभी अपनी सास से अपेक्षा की थी। कभी कभी वह सोचती कि अगर आज मेरी सास जीवित होतीं तो देखतीं कि बहू को बेटी समान कैसे रखा जाता है। बहुत पहले एक बार उसने अपनी मौसिया सास को कहते सुना था, "बहू पर लगाम कसकर रखना। जीजाजी नहीं रहे, तो कहीं ऐसा न हो कि बहू मालकिन बनकर तुम पर हुक्म चलाने लगे।" बस उसकी सास ने उनकी इस बात को कसकर गाँठ बाँध लिया था। सब कुछ करके भी बरखा को इस घर से कभी वह प्यार और सम्मान नहीं मिला जिसकी वह भूखी थी। उसकी भी कुछ तमन्नाएँ होंगी, कुछ सपने होंगे, इसके बारे में सोचने की किसी ने जरुरत ही नहीं समझी थी।

तीन महीने होते होते बरखा की तबियत बहुत संभल गयी थी। अब वह पहले की तरह कमजोरी और थकान महसूस नहीं करती थी। अब वह बरखा के साथ खूब अच्छे से घर की जिम्मेदारियाँ भी बाँटने लगी थी। उसके चेहरे पर भी अब निखार आने लगा था।

आज नवम्बर की एक तारीख थी। बरखा और प्रशान्त की शादी को आज तीस साल हो गए थे। सुबह सुबह वे दोनों बैठे हुए चाय पी रहे थे। विश्वास और तान्या आये। दोनों ने पैर छूकर एक लिफाफा दिया, जिस पर खूबसूरत शब्दों में लिखा था,"विवाह की तीसवीं वर्षगाँठ पर शुभकामनाओं सहित , आपके बच्चे विश्वास और तान्या।" खोला तो उसमें दक्षिण भारत घूमने के लिए दो टिकट थे। तीन हफ्ते के ट्रिप के लिए होटल की बुकिंग आदि सारे इंतजाम एक ट्रैवलिंग एजेंसी के माध्यम से कर दिए गए थे।प्रशान्त और बरखा हतप्रभ थे। उन्होंने कुछ कहना चाहा तो विश्वास बोला,"बस अब कुछ नहीं कहना है आपको। बहुत जिम्मेदारियाँ निभा लीं आप दोनों ने। अब कुछ समय अपने आपको भी दीजिए, वह सब करिये जो आपको अच्छा लगे।"

बरखा ने फिर कुछ कहने के लिए मुँह खोला ,"तान्या की तबियत", तान्या बोली, "माँ, मैं ठीक हूँ अब। आपने मेरा इतना ख्याल रखा , अब बेटी बनकर मुझे भी तो आपकी ख़ुशी का ख्याल रखना है।"

दो आँसू बरखा की आँखों से फिर लुढ़क आये। पर अबकी बार ये आँसू ख़ुशी के आँसू थे । वह सोच रही थी कि कौन कहता है कि प्यार के बदले में प्यार नहीं मिलता। मैंने एक बेटी को विदा किया तो बहू के रूप में दूसरी को पा लिया। सचमुच अगर तराजू के दोनों पलड़ों पर प्यार हो तो जिंदगी की तुला का संतुलन बना रहे और तब ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत और आसान हो जाये।



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