राजा वीरमदेव सोनगरा का बलिदान
राजा वीरमदेव सोनगरा का बलिदान
अलाउद्दीन खिलजी की बेटी फिरोजा वीरमदेव सोनगरा के प्रेम मे इतनी खो गई कि उसने अपनी जान यमुना मे कूद कर दे दी |
यह एतिहासिक वह प्रसंग है जहाँ दिल्ली के मुकाबले एक छोटे राज्य जालोर के वीर क्षत्रियो ने अलाउद्दीन खिलजी को वो सबक सिखाया जो वह कभी भुला नही पाया!! इतनी बडी सल्तनत के सुलतान का अहंकार किस प्रकार मि्टटी मे मिलाया राजा कान्हडदेव सोनगरा ( चौहान) के महाप्रतापी पुत्र वीर वीरमदेव सोनगरा ने आइए देखते हैं।
राजा वीरमदेव उस समय प्रसिद्ध योद्धा के रूप मे विख्यात थे ,जिनकी यश व कीर्ती चारों और सूर्य के समान बिखर रही थी ,इनका रूप और चहरे पर तेज कुछ ऐसा था !जिसके प्रताप से खिलजी की शहजादी फिरोजा मोहित हो इनसे विवाह करने को आतुर हो गई।
यह बात जब खिलजी को पता चली उनसे गढ़ जालोर के राजा कान्हडदेव सोनगरा को पत्र लिख कर उपनी शहजादी का विरमदेव से विवाह करने का प्रस्ताव रखा। यदि देखा जाऐ तो यह प्रस्ताव ऐसा था यदि वीरमदेव चाहते तो फिरोजा से विवाह कर दिल्ली से मित्रता कर अपना राज्य विस्तार कर सकते थे।
जिस वीरता से यह प्रस्ताव ठुकराया गया ।कालचक्र भी थम सा गया था ।भविष्य मे युद्ध मानो तय हो गया था कहते है यदि चुनौती खुद चलकर शूरवीर के पास नही आती तो शूरवीर स्वयं चुनौती के पास चले जाते है । यह कहावत जालोर के वीर राजपूतो ने सिद्ध करके दिखाई। अब वो समय आया जो आना तय हो गया था । जी हाँ दिल्ली और जालोर का युद्ध ,यह युद्ध इतना भीष्ण था कि मुट्ठी भर राजपूतो ने केसरिया बाना धारण कर अणगिनत खिलजीयो को नरक का रास्ता दिखाया । किंतू इस युद्ध मे एक विचित्र उदहारण वीरगति प्राप्त करने के बाद भी वीर वीरमदेव सोनगरा ने दिया युद्घ मे वीरमदेव सर कटने के पश्चात भी शत्रुओं से लड़ते रहे उनके सर को थाल मे सजाकर खिलजी के सामने रखा गया । कटे शीश पर भी ऐसा तेज झलक रहा था । जिस से फिरोजा को विरमदेव के कटे शीश पर अंतिम तिलक करने की इच्छा प्रकट हुई और जब वह वीरमदेव के कटे माथे पर तिलक लगाने पहुंची । उस समय वीरमदेव का कटा सर दूसरी ओर घूम गया यह देख सभी चकित हो गए … फिरोजा दुखी हो गई की मरने के पश्चात भी यह राजपूत मेरा स्पर्श स्वीकार नही कर रहा ।फिरोजा ने उस कटे सर से प्रार्थना की और स्वयं उस राजपूत का अंतिम संस्कार किया और यमुना नदी मे कूद अपने भी प्राण त्याग दिए ।यह इतिहास का पहला ऐसा उदहारण है जब किसी मुस्लिम कन्या ने राजपूत का अंतिम संस्कार किया हो और उसके प्रेम मे इतनी खो गई कि स्वयं की भी जान यमुना मे कूद कर दे दी ||
वीरमदेव ने वीरोचित मृत्यु का वरण किया किंतू धर्म व कुल को भ्रष्ट नही होने दिया । शुद्ध रक्त का महत्व हमें वीरमदेव सोनगरा से ग्रहण करना चाहिए ।
