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Pallavi Shekhar

Romance


4.0  

Pallavi Shekhar

Romance


pyar, dosti aur parivaar

pyar, dosti aur parivaar

5 mins 593 5 mins 593

दुनिया सचमुच गोल है। किससे कब ,कहाँ ,आप मिलेंगे, कुछ पता ही नहीं चलता।ऐसी ही एक शाम नैना ऑफिस के कैंटीन में चाय पीने के लिए आई।बाहर आसमान सिन्दूरी रंग में रंग चुका था और हल्के स्वर में नैना का पसंदीदा किशोर कुमार का गाना " ये नैना , ये बादल ,ये ज़ुल्फ़ें , ये आँचल" बज रहा था।

नैना चाय के संग अपनी यादों में खोई हुई थी कि अचानक उसे अपने पीठ पर किसी के स्पर्श का एहसास हुआ।घबरा कर उसके हाथों से चाय की प्याली छूट गयी।वह अपना क्रोध प्रकट करने ही वाली थी कि सामने वाले की सूरत देखकर अचम्भित रह गयी।

"तुम !" , "हाँ, मैं ""तुम यहाँ कैसे इतने सालों के बाद?बिलकुल भी नहीं बदले हो।" "तुम भी तो नहीं बदली।" दोनों के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट आ गयी। यह समर था।नैना के कॉलेज का दोस्त।एक दूसरे को आलिंगनबद्ध कर के बातों का सिलसिला शुरू हुआ। एक घंटा कब बीत गया पता ही नहीं चला। नैना का ऑफिस चौदहवीं तल्ले पर था और समर का पंद्रहवी तल्ले पर। अब लगभग हर रोज़ दोनों की मुलाक़ातें बढ़ने लगी। कितने भी व्यस्त हो ,लेकिन दोनों एक दूसरे के लिए समय निकाल ही लेते थे। शाम की चाय के साथ बातों का सिलसिला शुरू हो गया।दोनों ने एक दूसरे को अपने परिवार के बारे में बतलाना शुरू कर दिया था।

जैसा हर एक कार्य क्षेत्र में होता है,लोगों के मुँह खुलने लग गए। जितनी मुँह , उतनी बातें।पर इन सब बातों से बेखबर नैना और समर की दोस्ती परवान चढ़ रही थी।अद्भुत आकर्षण था समर के व्यक्तित्व में। नैना खींचती जा रही था। शायद कोई खालीपन था, उसके जीवन में , जो नैना भूल जाती थी जब भी वो समर के साथ होती।

पति का प्यार , पैसा ,आज़ादी सब कुछ था पर एक अधूरापन भी था जिस की खालीपन की पूर्ती समर का साथ कर रहा था।नैना का एक भी दिन समर से बात किये बिना नहीं जाता था।कुछ वैसा ही हाल समर का था|नैना की कजरारी आँखों से वो भी आकर्षित हो रहा था।

समर की पत्नी एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊँचे ओहदे पर नियुक्त थी। पति-पत्नी में कोई मतभेद नहीं, स्वेच्छा से ज़िन्दगी जीने देना , पर कहीं न कहीं भावनात्मक रूप से जुड़ाव कम हो रहा था। कभी-कभी ज़िन्दगी में हम ऐसे मोड़ पर पहुँच जाते हैं ,जहाँ हमें ऐसे इंसान की ज़रुरत होती है जो सिर्फ हमे सुने और समझे।

नैना और समर का सम्बद्ध शायद ऐसा ही था।भावनात्मक पूर्ती होने के कारण अब वो ज्यादा खुश रहने लगी थी क्योंकि मन की बात करने और सुनने वाला कोई था।पर तभी उनकी ज़िन्दगी में कुछ ऐसा मोड़ आया , जो शायद उनकी भविष्य का रुख बदल देता। पर अपने परिपक़्वता से दोनों ने अपनी ज़िन्दगी संभाल ली।

नैना को अपने ऑफिस के तरफ से जर्मनी भेजा जा रहा था और यह संयोगमात्र था कि समर को भी किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में जर्मनी जाना था। यह जान कर दोनों के दिलों की धड़कनें बढ़ गयी थी। एक अजीब सी घबराहट , बेचैनी , खुशी सब उनके दिलो दिमाग पर हावी था।नियति का खेल ऐसा की एक ही वायुयान और फिर एक ही होटल में उनके ठहरने का इंतज़ाम था।पूरी यात्रा के दौरान एक दूसरे से बातें करते रहे। नींद कोसो दूर थी। समय बीता और वो अपने गंतव्य पहुँच चुके थे। शाम से रात हो चुकी थी। समर ने नैना को साथ खाने के लिए आग्रह किया। खाना एक बहाना था , उनको तो वक़्त साथ में बिताना था।

समय की सुई जैसे थम सी गयी थी।आज पहली बार इतने करीब थे दोनों , एक दूसरे के साथ , ऐसा एकांत जहाँ साँसे तक सुनाई पड़ रही थी। सहसा समर ने नैना को अपनी बाहों में भर लिया।ये आलिंगन अभी तक के सभी आलिंगनों से भिन्न था। उसमे एक गर्माहट थी , एक कशिश थी ,एक ज़रुरत थी। दोनों न जाने कितने मिनटों तक एक दूसरे में समाय रहे।अचानक मोबाइल की घंटी से दोनों की तन्द्रा भंग हो गयी गोया दोनों नींद से जाग पड़े हो।

नैना का मोबाइल था। उधर से उसे ,मयंक , नैना का पति , की आवाज़ सुनाई दी। नैना जैसे अपने ही ख्वाबों की दुनिया से जाग गयी थी। आँखों में एक सवाल, एक कश्मकश , एक दुविधा लिए हुए , खुद को समेटते हुए वह समर के कमरे से बाहर चली आयी।

उसके उपरांत अगले दिन , कुछ निश्चय करके वह समर से मिलने चली आयी। समर भी जैसे उसी की प्रतीक्षा कर रहा था। उसे देख कर यह प्रतीत हो रहा था मानो उसने आँखों ही आँखों में रात काट दी है। दोनों एक दूसरे के सामने थे , कहने को बहुत कुछ , पर शायद शब्द साथ नहीं दे रहे थे।शुरुआत नैना ने ही की।"मेरे लिए तुम बहुत अहम् हो पर एक सच ये भी है कि हम दोनों अपने परिवारों से उतना ही जुड़े हुए हैं।" कुछ ख्वाहिशों को पूरी करने के लिए हम उम्र भर की दोस्ती को नहीं गवां सकते है।

समर भी ये समझ चुका था। उसने कुछ नहीं कहा , सिर्फ नैना के हाथों को अपने हाथों में बाँध कर रख लिया। मानो वो इन पलों को सहेज कर रखना चाह रहा था। दोनों वापस लौटे पर एक नए रिश्ते के शिलान्यास पर। एक ऐसी दोस्ती जो ताउम्र की हो गयी। एक ऐसी दोस्ती जहाँ वो अपने मन की हर बात साझा कर सके।और एक ऐसी दोस्ती जिसने दो परिवारों को टूटने नहीं दिया।

आज एक साल बीत चुका है। फिर से वही बारिश , वही बूंदों की बौछार चेहरे पर , फिर वही गाना , फिर वही नैना और समर , लेकिन उनके रिश्ते के मायने अलग।

 


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