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Yuvraj Gupta

Horror Fantasy Thriller

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Yuvraj Gupta

Horror Fantasy Thriller

प्रवेश

प्रवेश

9 mins
21

31 दिसंबर, 2010

रात के साढ़े नौ बजे थे और दिन रविवार का। वैसे तो पापा के कहानी सुनाने का वक्त साढ़े आठ से दस बजे का होता है, मगर सात साल की पिंकी और चौदह साल का पिंकू ये जानते थे कि जब भी पापा, राजीव अंकल की कॉल रिसीव कर के घर से बाहर निकल जाते थे, तब वह घर देर से ही आते थे—फिर चाहे हफ़्ते का कोई भी दिन हो।

पिंकू मम्मी के मोबाइल फोन में एक कॉमिक ऐप पर हॉरर कॉमिक सुन रहा था, और पिंकी के बार-बार कहने पर भी वह अपने कानों से हेडफोन नहीं हटा रहा था। पिंकी को पता था कि पापा घर आते ही सबसे पहले उन्हें सोने को कह कर कमरे की लाइटें बंद कर देंगे और मम्मी का मोबाइल भी ले लेंगे। ऐसे में पिंकी को बिना कहानी सुने ही सोना पड़ेगा, जो कि उसके लिए गणित के सवालों जितना ही मुश्किल था।

"भैया... भैया... प्लीज मुझे भी सुनने दो ना कहानी..."

पिंकी, पिंकू का हाथ तो कभी उसका पेट पकड़कर ज़ोर से हिला रही थी, मगर पिंकू टस से मस नहीं हो रहा था। पिंकी भी बार-बार कहकर थक चुकी थी। उसने अपने छोटे से हाथों से पिंकू की हथेली को उठाया और अपनी चुटिया की पूँछ से उस पर गुदगुदी करने लगी। पिंकू कहानी के एक ज़बरदस्त मोड़ पर था। उसकी भौहें सिकुड़ रहीं थीं, माथे पर लकीरें और पसीने की नमी झलक रही थी। उसकी आँखें एकटक मोबाइल फोन पर जमी थीं। कहानी वाली ऐप में ऑडियो के साथ-साथ विज़ुअल भी दिखाए जाते थे।

"लड़का किचन में वॉशबेसिन के नीचे छिपा था और उसने घर की सभी बत्तियाँ बुझा दी थीं। वह मन ही मन इस पूरी घटना को उसके किसी डरावने सपने होने की दुआ माँग रहा था, तभी उसे कमरे के दरवाज़े के चरचराने की आवाज़ सुनाई देती है —

चिर्रर... घिर्रर... चिर्रर...

वह अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लेता है। उसे अपनी तरफ़ बढ़ते कदमों की आवाज़ कानों में तेज़ होती हुई सुनाई देती है, और एक पल बाद जब वह आवाज़ इतनी साफ़ और तेज़ थी कि जितनी किसी के बगल या सामने चलने पर सुनाई देती हो, तब बंद हो जाती है।"

पिंकी की कोशिशें अभी भी जारी थीं। उसकी मासूमियत भरी कोशिशें पिंकू को उलझन तो दे रही थीं, मगर वह जानता था कि अगर उसने पिंकी को डाँटा तो मम्मी उसे कच्चा चबा जाएँगी। पिंकू ने मोबाइल स्क्रीन पर अँगूठे से छूकर देखा और सोचा, "बस पाँच मिनट और, आज का एपिसोड ख़त्म हो जाएगा।"

"लड़के को अपने चेहरे पर गर्म हवा महसूस हो रही थी, मगर उसमें बहुत बुरी बदबू थी, जैसे किसी गंदे जानवर के मुँह से आती है। उसका दिमाग कह रहा था कि वह अपने चेहरे से हाथों को हटाकर सामने देखे, मगर उसका शरीर उसके दिमाग से बिल्कुल अलग काम कर रहा था। तभी लड़के के दिमाग में अपने दादाजी द्वारा कही एक पुरानी बात गूँजी कि, 'किसी भी बुरे सपने से लड़ने के लिए आँखों को खोलना ज़रूरी है।

बेशक लड़के के दादा द्वारा कही गई बात काफ़ी प्रेरक थी, मगर लड़का ज़िंदगी के एक कड़वे सच से अनजान था कि हर भयानक हादसा रात का डरावना सपना नहीं होता है। लड़का धीरे-धीरे अपने हाथों को अपने चेहरे से हटाता है, और जैसे ही अपनी आँखें खोलता है —

"यह कोई सपना नहीं, तेरी आख़िरी हक़ीक़त है..."

आवाज़ बहुत ज़्यादा पैनी और कर्कश थी। लड़के के सामने बैठी औरत, जिसकी आँखों की पुतलियाँ पलट जाती हैं, बाल काले-पतले लहराते हुए साँपों में बदलने लगते हैं, उसकी ज़ुबान धीरे-धीरे खुलती हुई लड़के के चेहरे से भी बड़ी हो चुकी थी। लड़के को महसूस होता है कि उस माहौल में अचानक से बेहद गहरा सन्नाटा पसर गया था, मानो सब थम सा गया हो। लड़का उस जगह से भागने की कोशिश करता है, मगर उसके हाथ-पैर नहीं हिलते हैं। उस औरत ने पता नहीं कब से अपने साँपों जैसे बालों से उस लड़के के दोनों पैर और हाथों को बाँध रखा था। लड़के को अपने हाथों और पैरों में एक साथ कई सारी सुईयों के चुभने जैसा दर्द हो रहा था, जो कि धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। दरअसल, उस औरत के बालों जैसे कई सारे साँप उस लड़के के हाथ और पैरों में अपने दाँत गड़ा रहे थे।"

पता नहीं क्यों, मगर पिंकी द्वारा उसकी चुटिया की पूँछ से पिंकू को अपनी हथेली पर हो रही गुदगुदी अब सुईयों की चुभन जैसी महसूस हो रही थी, लेकिन पिंकू चाहते हुए भी अपना हाथ पिंकी के हाथों से नहीं खींच पा रहा था।

"औरत बार-बार अपनी बड़ी सी ज़ुबान लड़के के मुँह की तरफ़ बढ़ा रही थी, लेकिन वॉशबेसिन से उसका सिर टकरा जाता था। लड़का डर के मारे दीवार से चिपकता जा रहा था..."

पिंकू बहुत बुरी तरह सहम चुका था। वह लगातार ख़ुद को पीछे धकेलने की नाकाम कोशिश करने के चलते अपने पीछे की दीवार से चिपकता जा रहा था।

"औरत, लड़के के हाथ-पैरों को अपनी पकड़ से आज़ाद कर देती है..."

पिंकू की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी, वो मोबाइल को अपने चेहरे के और क़रीब कर लेता है।

"लड़के को लगता है कि यह भागने का अच्छा मौक़ा है। जैसे ही लड़का औरत को धक्का देने के लिए अपने हाथों को आगे लाता है, वैसे ही उसे अपनी गर्दन पर कुछ रेंगता हुआ महसूस होता है। वह औरत लड़के की गर्दन पर अपने सर्पीले बालों की पकड़ कसती जा रही थी, जिससे लड़के का चेहरा औरत की बड़ी सी खुली हुई ज़ुबान की तरफ़ बढ़ता जा रहा था..."

पिंकू के चेहरे पर दहशत निरंतर बढ़ती जा रही थी। उसका मुँह धीरे-धीरे खुल रहा था, आँखें बिना झपके एकटक मोबाइल में गढ़ी थीं, और मोबाइल भी धीरे-धीरे पिंकू के चेहरे के क़रीब बढ़ता जा रहा था। बेचारी पिंकी के पास अब सोने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचा था। इसलिए वह पिछले कुछ मिनटों से अपने बेड पर नाक तक चादर ओढ़े पिंकू को देख रही थी और उसे "पागल-पागल" बोलकर आवाज़ लगा रही थी। दरअसल, पिंकू अपने बाएँ हाथ को अभी भी उसी स्थिति में हवा में टाँगे था, जिस तरह जब पिंकी ने उसके हाथ को अपने हाथों में पकड़ा हुआ था।

पिंकी, मम्मी को पिंकू की हरकत के बारे में बताने के लिए बेड से उठ ही रही थी कि लाइट चली जाती है, और कमरे में पिंकू के चेहरे और उसके पीछे की दीवार के कुछ हिस्से को छोड़ बाकी सब जगह अँधेरा हो जाता है। पिंकी डरकर दोबारा से चादर ओढ़कर लेट जाती है और पिंकू को आवाज़ लगाती है —

"भैया... भैया... मुझे डर लग रहा है, प्लीज़ रोशनी करो ना... भैया..."

"लड़का धीरे-धीरे कर औरत की ज़ुबान के बिल्कुल क़रीब आ चुका था। औरत के मुँह में हल्की लाल और पीली रोशनी थी, जो कभी-कभी तेज़ चमकती थी। लड़के को उस गहरे सन्नाटे में अचानक से कई सारे लोगों के एक साथ रोने और चीखने की धीमी-धीमी आवाज़ें सुनाई देने लगी थीं, और औरत के मुँह के क़रीब बढ़ने के साथ ही उन आवाज़ों का शोर और भी बढ़ता जा रहा था। अब समझने से ज़्यादा ये बात डरावनी थी कि ये चीखने और रोने का शोर कहीं और से नहीं, बल्कि उस औरत के ही गले से आ रहा था।

लड़का अपने दोनों हाथों से औरत को पीछे धकेलने की कोशिश कर रहा था, मगर उसकी सारी कोशिशें बेकार जा रही थीं। आख़िरकार औरत के सर्पीले बालों ने लड़के को खींचना बंद कर दिया और लड़के के हाथ-पैरों को अपने बंधन से आज़ाद कर दिया। लड़के ने अब ख़ुद को ढीला छोड़ दिया था और आँखों को बंद कर लिया था।"

पिंकू के कोई जवाब न देने पर पिंकी मम्मी को आवाज़ लगाने लगी।

"क्या हुआ बेटा....."

"मम्मी मुझे डर लग रहा है और भैया रोशनी नहीं कर रहे हैं।"

"बेटा आप डरो मत। मैं अभी आती हूँ और पिंकू को डाँट लगाती हूँ...."

"मम्मी... प्लीज़ जल्दी आओ ना..."

"अभी आती हूँ बेटा... मम्मा आपके और भैया के लिए चीज़ बना रही हैं... चीज़ कौन खाएगा... बोलो बोलो... चीज़ कौन खाएगा....?"

पिंकू को एहसास हो गया था कि मम्मी आने वाली हैं। इसलिए उसने अपने एक कान से हेडफोन को थोड़ा खिसका लिया था, और पिंकी और मम्मी की बातें सुनते वक्त उसने मोबाइल की आवाज़ को भी कुछ कम कर दिया था।

"(कुछ देर शांति के बाद)... और एक बार फिर से गहरे सन्नाटे ने अपने पैर पसार लिए थे। मगर इस बार एक चीज़ की कमी थी... और वो थी डर की... लड़के में।

औरत के गले से आ रही रोशनी धीरे-धीरे मध्यम होने लगी थी, और लड़के पर उसकी पकड़ भी ढीली हो रही थी। लड़के ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं तो पाया कि उसके सामने अपने दोनों घुटनों पर झुकी औरत अपने सामान्य रूप में थी और लड़के को देखकर मुस्कुरा रही थी। लड़के ने तुरंत अपनी गर्दन के पीछे हाथ लगाकर देखा। अब वहाँ कुछ नहीं था। लड़के ने एक लंबी साँस खींची और फिर वह भी औरत को देखकर मुस्कुराने लगा।

लड़के ने अपनी पूरी ज़िंदगी में पहली बार इतना भयानक सपना देखा था, जो कि अभी भी हक़ीकत ही प्रतीत हो रहा था। कम से कम लड़के के दिमाग में तो औरत की मुस्कान देख उस वक्त यही ख़्याल आ रहा था। लड़के के मन से डर लगभग जा चुका था, मगर उसके दिमाग में अब भी बस एक बात खटक रही थी — 

"यह औरत कौन है? और ये अपने दोनों घुटनों और हाथों पर मेरे सामने झुक कर बैठी मुस्कुरा क्यों रही है?"—इस ख़्याल ने लड़के के दिल में एक बार फिर से कहीं न कहीं डर को ज़िंदा कर दिया।"

मम्मी किचन से निकलकर कमरे की ओर बढ़ रहीं थीं, उनके एक हाथ में प्लेट और एक हाथ में टॉर्च थी।

"लड़के को एक पल का भी वक्त नहीं लगा ये समझने में कि यकीनन यह कोई सपना नहीं... बल्कि उसकी आख़िरी हक़ीकत है।

जैसे ही लड़का कुछ बोलने के लिए अपनी काँपती हुई ज़ुबान खोलता है, वह औरत एक झटके से उसकी गर्दन को खींचकर उसका धड़ अपनी बड़ी सी ज़ुबान में ले लेती है।"

पिंकू की चीख़ उसके गले में ही दबी रह गई थी। वह मोबाइल बंद कर देना चाहता था, मगर वह ऐसा कर नहीं पा रहा था। पिंकू अपनी आँखें बंद करने की कोशिश भी कर रहा था, मगर उसके लिए यह भी असंभव सा काम हो गया था।

तभी दरवाज़े की घंटी बजती है जो कि पिंटू को भी सुनाई देती है। मगर सिर्फ सुनने और देख पाने के सिवाय और कुछ कर पाने में वह असमर्थ था।

मम्मी कमरे के क़रीब आ चुकी थीं, मगर घंटी की आवाज़ सुनकर वह प्लेट को टेबल पर रख दरवाज़ा खोलने चली जाती हैं। मगर दरवाज़े पर उन्हें कोई नहीं दिखता है। वह दरवाज़ा बंद कर दोबारा कमरे की ओर बढ़ जाती हैं।

"औरत ने लड़के के सिर को धड़ से अलग कर दिया था, और उसके मुँह से लगातार ख़ून टपक रहा था, मगर उसके चेहरे पर अभी भी मुस्कान थी, और वह पिंकू को देख रही थी।"

किसी तरह कोशिश कर पिंकू अँगूठे से मोबाइल स्क्रीन को छू लेता है... और ये क्या... कहानी तो ख़त्म हो चुकी है, मगर यह...

इससे पहले पिंकू कुछ समझ पाता, उसका सिर मोबाइल की छोटी सी स्क्रीन में समा जाता है, और तभी कमरे में मम्मी आती हैं और उनके साथ लाइट भी। दीवार पर ख़ून की भयानक छींटे और बिना सिर पिंकू का धड़ देख उनके हाथ से प्लेट छूट जाती है। पिंकी और मम्मी की आवाज़ से पूरा घर दहल उठा था। मम्मी बेहोश होकर वहीं गिर जाती हैं।

रोते-चीखते अचानक पिंकी की नज़र अपने आप हिलते हुए मोबाइल पर पड़ती है। वह मोबाइल उठाती है। मोबाइल ख़ून से सना हुआ था। पिंकी अपने हाथ से ख़ून साफ़ करती है।

मोबाइल में —

"औरत अपने मुँह को साफ़ कर रही थी। उसकी नज़र पिंकी पर पड़ती है।"

पिंकी अपने आँसू साफ़ करके मोबाइल को आँखों के क़रीब कर लेती है —

"तेरे लिए कोई और आएगा। पंद्रह साल बाद..... हा... हा....हा"


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