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Yuvraj Gupta

Drama

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Yuvraj Gupta

Drama

चोर

चोर

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ये बात मेरी शादी की है। घर में सभी व्यस्त और बहुत खुश थे... मेरी माँ, पिता जी, भाई, बहनें, दोस्त और रिश्तेदार भी सिवाय हम दोनों के। मेरे और आकांक्षा के सिवा।

मेरी मुलाक़ात आकांक्षा से पांच साल पहले कॉलेज में हुई थी।  वह मेरी सीनियर थी। रोज़ाना मुलाक़ातों और एक ही बस से सफर के दौरान हमारी दोस्ती और फिर प्यार हो गया। वह लखनऊ की नहीं थी। यहाँ उसके मामा, मामी रहते थे वह दिल्ली से यहाँ आयी थी। मुझे इस एहसास से बेहद प्यार था कि, उसका प्रेम मेरे प्रति मुझसे भी ज्यादा था। ...और ...और क्या चाहिए होता है किसी को जिंदगी में।

एक दिन वो वक़्त आ ही गया जिसका इंतज़ार मुझे कभी नहीं था मगर डर था। "करन..." मैंने आकांक्षा को उदासी भरी नज़रों से देखा था, उसकी आँखें नम थी मगर आंसू छलके नहीं थे। "तुमने हमारे रिश्ते के बारे में घर पर नहीं बताया न..." आह... वह सवाल, वह दर्द भरी उसकी आवाज़।  

"अरे भईया... आप अभी तक तौलिया लपेटे खड़े हैं। "  यह मेरा छोटा भाई अर्जुन है उसकी आवाज़ सुनते ही मैंने अपने हाथ में पकड़े कागज़ के टुकड़े को मुट्ठी में दबा लिया।  "भईया, पिता जी गुस्सा कर रहे हैं आप जल्दी से तैयार हो कर नीचे आ जाओ... क्या मैं कुछ मदद..." मैं उसे जाने का इशारा कर के बाथरूम में आ गया।

कुछ देर में मैं तैयार हो कर नीचे पहुँच गया। बुआओं, बहनों, दोस्तों सभी ने मुझे घेर लिया। माँ सबको किनारे करते हुए मेरे पास आयी और अपनी छोटी अंगुली से अपनी आँख का काजल मेरे कान के पीछे लगा दिया, "ईश्वर मेरे बेटे को बालाओं से बचाएं। " बारात दरवाज़े पर तैयार खड़ी थी। "अरे भाई... कुछ रस्में लड़की वालों के लिए भी छोड़ दो, देर हो रही है जल्दी करो। " पिता जी की आवाज़ सुनते ही माहौल में कुछ देर को सन्नाटा हो गया, मैं घोड़ी की तरफ बढ़ा ही की अचानक मेरे पैर अपनी जगह जम गए... क्या... ये नहीं हो सकता... आकांक्षा... ये आकांक्षा नहीं हो सकती। मेरी धड़कनों और साँसों ने रफ़्तार पकड़ ली थी। घोड़ी के करीब द्वार पर आकांक्षा खड़ी थी उसकी वही नम आँखें... आंसुओं में वही बेचैनी।

"क्या हुआ भईया... कुछ रह गया क्या? बताइये मैं ला दूंगा। " मैंने अर्जुन की आँखों में देखा... उत्साहित चमक, होंठों पर मुस्कान। मैंने आस-पास नज़र घुमाई, वह अब वहां नहीं थी। "हाँ... मुझे यकीन है तुम ला दोगे।" मेरा भाई मेरे गले लग गया। "अरे अर्जुन... भईया को विदा नहीं कर रहे हैं भाभी को विदा कर लाना है।" बड़ी दीदी की इस बात से सबका ध्यान मेरी तरफ हो गया, अर्जुन को मेरे गले लगे देख सब मुस्कुरा दिए।  

मैंने अपने भाइयों, बहनों के मुख से सुना था की वह बहुत सुन्दर है बोली की मीठी है, अब वह मेरे बगल में बैठी है... मुझे नहीं देखना उसे।

पूरी रात गुज़र गयी। सुबह हम कुछ लोगों की आँखें नम छोड़ कुमुद को विदा कर लाये। कुमुद के विषय में सुनी हर बात सच साबित हुयी। वह संस्कारी थी, आदर्शवादी थी... व्यवहार की सुन्दर थी। ...और ...और क्या चाहिए होता है एक परिवार को बहू के तौर पर। मेरी जिंदगी भी गुज़र बसर रही थी और ऐसे ही अब मेरी शादी को एक साल हो गया था।  

मैं एक बैंक कर्मी के तौर पर कार्यरत था। एक दिन मुझे एक अवसर मिला जिसे मैंने स्वीकार कर लिया, दिल्ली तबादला और पद, प्रतिष्ठा में बढ़ोत्तरी।  कुछ एक हफ्ते में मैं और कुमुद दिल्ली स्थानांतरित हो गए। बैंक की तरफ से मिले उस 2 BHK फ्लैट में मेरे और कुमुद के अलावा... तन्हाई रहती थी।  

कुमुद को नए लोगों से घुलने-मिलने में काफी वक़्त लगता था और मुझे न जाने कब ये बात पता चली थी। मैं सुबह नौ बजे काम पर निकल जाता था और शाम को आठ बजे या साढ़े आठ बजे या कभी-कभी दस बजे भी घर आता था। कुमुद ने कभी कोई शिकायत नहीं की। शायद वो मेरे बिना कहे ही मेरी स्थिति से वाकिफ थी। सुबह की बिस्तर वाली चाय और अख़बार से लेकर इस्त्री किये हुए कपड़े और नाश्ता इत्यादि में कभी भी एक पल की भी देरी नहीं हुयी उससे। मुझे नहीं पता था की कुमुद मेरे जाने के बाद सारा दिन क्या करती थी, और पता होता भी तो कैसे? मैं तो इतवार के दिन भी घर से बाहर ही होता था। दरअसल, मैं आकांक्षा को कभी भूलना ही नहीं चाहता था। मुझे डर था कि अगर मैं कुमुद के करीब गया तो आकांक्षा मेरी यादों से भी दूर हो जाएगी। मैं जितना मशगूल अपनी रोज़ की दिनचर्या में था उतना ही अनजान था मैं कुमुद से, उसके एहसासों, उसकी ख्वाहिशों... उसकी जिंदगी से।

मुझे जिंदगी से अब किसी ख़ास चमत्कार की कोई उम्मीद नहीं थी। एक शाम मैं बैंक से वापस लौट रहा था रास्ते में चाट का ठेला देख मन में विचार आया की कुमुद के लिए लेता चलूँ .... शायद उसे अच्छा लगे, और फिर चाट बतासे किस लड़की को अच्छे नहीं लगते, आकांक्षा तो कैसे टूट पड़ती थी चाट के ठेले पर... बिलकुल बच्ची ही बन जाती थी।  

"भईया एक चाट मसालेदार और बतासे पैक कर दीजिये। " मैंने ठेले वाले को पैसे थमाते हुए कहा। ठेलेवाले ने मेरे हाथ से पैसे ले लिए। "ये ले छोटू, ये पैकेट कार में मैडम को दे दे और ये पैसे भी।" लड़के ने पैकेट और पैसे कार की खिड़की की तरफ बढ़ाये, पैकेट ले लिया गया और आवाज़ आयी, "कीप द चेंज"। हहह... आज तक मुझे आकांक्षा सिर्फ दिखाई देती थी मगर अब तो उसकी आवाज़ भी सुनाई देने लगी है। "ये लीजिये भईया... भईया... भईया.... " मैं किसी ख्याल में खो गया था।  

रात के साढ़े आठ बजे थे जब मैं घर पहुंचा। कुमुद के हाथों में पैकेट और टिफ़िन दे कर मैं वाशरूम चेंज करने चला गया। कुमुद ने टेबल पर चाट और बतासे प्लेट में लगा कर रख लिए और शायद मेरा इंतज़ार कर रही थी। मैं फ्रेश हो कर कुमुद के पास आ कर बैठ गया। आज शायद पहली बार मैं और कुमुद टेबल पर साथ थे। कुमुद सच में बहुत खूबसूरत थी उसके छोटे गुलाबी होंठ, बड़ी-बड़ी चमकदार आँखें। चाट खाते वक़्त तीख़े के कारण मेरा पूरा चेहरा पानी पानी हो गया था जिसे देख कुमुद खिलखिला उठी। "ये लीजिये... पानी पी लीजिये नहीं तो गले में दिक्कत हो जायेगी।" मैं पानी पी कर वहां से उठ कर कमरे में आ गया। कुमुद अभी भी वहीं थी। मोबाइल चलाते-चलाते न जाने कब मैं सो गया।

रात को गला सूखने के कारण मेरी आँख खुली और मैं उठ कर किचन में आ गया। पानी पीने के बाद मैं नीचे गार्डेन में आ कर बैठ गया। रात के लगभग दो बजे थे। मैंने अपने कुर्ते की जेब मैं हाथ डाला और सिगरेट का पैकेट निकालकर सिगरेट मुंह से लगा ली। अरे... लाइटर तो शायद... पैंट में ही रह गया। मैं मेन गेट की तरफ आ गया इस ख्याल से की चौकीदार के पास लाइटर या माचिस जरूर मिल जाएगा। मैं चौकीदार को इधर-उधर ढूंढ रहा था कि अचानक सोसाइटी की लाइट चली गयी। आसमान में चाँद ना होने के कारण अँधेरा घना था। ना जाने कहाँ चला गया ये चौकीदार... मैं वापस गार्डेन में आ गया। बेंच पर कोई बैठा था। एक बार इनसे पूछ लेता हूँ शायद इनके पास लाइटर मिल जाये। उसके करीब पहुँचते ही मेरे हाथ पैर सन्न रह गए। कहीं फिर से ये कोई ख़्वाब तो नहीं... वह आकांक्षा थी।

मैं कुछ समझ पाता इससे पहले ही वह मेरे गले लग गयी। मैं कुछ देर यूँ ही सन्न खड़ा रहा। "तुम अब तक कहाँ थे करन...? क्या तुम्हें कभी मेरी याद नहीं आयी। " इतना बोल कर आकांक्षा रोने लगी और फिर से मेरी बाहों में सिमट गयी। मैं समझ ही नहीं पा रहा था की मैं खुश ज्यादा था या बेचैन।                                     

मैंने आकांक्षा को बेंच पर बिठाया और उसके आंसू पोंछे, "ऐसा एक पल भी नहीं बीता जब मैंने तुम्हें याद नहीं किया... मुझे माफ़ कर दो आकांक्षा मगर अब बहुत देर..." आकांक्षा ने अपनी उंगली मेरे होंठ पर रख दी। "कुछ देर नहीं हुयी है... मुझे मेरे प्यार पर विश्वास था कि एक दिन हम जरूर मिलेंगे। " मैं इधर-उधर नज़रें घुमा कर देख रहा था। ना जाने क्यों मगर एक डर था किसी के देख लेने का।  

अमूमन सोसाइटी की लाइट जाने पर कुछ देर में ही जनरेटर चालू हो जाता था मगर आज... मुझे घबराहट होने लगी थी।  

"आकांक्षा तुम मेरी बात सुनो... "

"चुप रहो करन... आज कुछ मत कहो, इस सुकून को ना जाने मैंने कहाँ-कहाँ तलाशा मगर... आज मुझे समेट लेने दो इस सुकून को अपनी बाहों में। "

एक अजीब ही कशमकश में फंसा था मैं, आज जब मेरी बाहों में मेरा प्यार था जिसके लिए ना जाने कितना तड़पा तो फिर निगाहों में कुमुद का चेहरा क्यों ? कैसा अपराधबोध महसूस हो रहा था... मानो मेरी पहचान ही आज कहीं खो सी गयी है... कौन हूँ मैं ?

"चोर... चोर... पकड़ो उसे... " 

ये आवाज़ें बिल्डिंग-बी से आ रही थी। खिड़की पर टॉर्च की रौशनी और हलचल से कुमुद की नींद टूट गयी। वह उठी, करन बेड पर नहीं था। कुमुद उठ कर कमरे से बाहर आ गयी। वह किचन में गयी और वहां से फिर वॉशरूम में। करन की पैंट से लाइटर निकालते वक़्त कागज़ का एक पर्चा नीचे फ़र्श पर गिर गया। अँधेरे में कुछ भी समझ पाना बहुत मुश्किल हो रहा था कुमुद जैसे ही पर्चा उठाने के लिए नीचे झुकी तभी लाइट आ गयी।

"आकांक्षा हमें अब चलना चाहिए... शायद कोई चोर घुस आया है यहाँ। " मैं बेंच से उठ गया। आकांक्षा ने मेरा हाथ पकड़ा और पास आ कर बोली, "मुझे माफ़ कर देना करन... उस कागज़ में लिखी बातों के लिए। मैंने उसमें जो कुछ भी लिखा था वो सच नहीं था सिर्फ मेरा गुस्सा था... क्यूंकि अगर सच होता तो आज तुम मेरे पास नहीं  होते। " 

'मेरी उम्मीद

मेरा प्यार

मेरी आराधना

मेरी ख्वाहिशें ही ले जाते

तुम तो अपना भी क़रार ना जाने किस गली ले गए

कोसूं तुम्हें या बद्दुआएं ही दूँ

बता मुझे बर्बाद करने वाले

तुझे क्या नाम दूँ ?'

आकांक्षा 


कुमुद को बरामदे से आवाज़ सुनाई देती है वॉशरूम से निकलकर बरामदे की तरफ आती है और सन्न रह जाती है। बरामदे से बाहर सामने गार्डेन में करन खड़ा था एक औरत के साथ जो उसको पकड़े थी। करन ने कुमुद को देख लिया था, वह आकांक्षा से अपना हाथ भी ना छुड़ा सका था।

अचानक से एक नकाबपोश आदमी कुमुद के सामने आ कर खड़ा हो गया। कुमुद की पलकें झपक ही नहीं रही थीं।

"चोर... चोर... पकड़ो उसे... देखो वो उधर वहां है..." लोगों का शोर बढ़ता ही जा रहा था। दरवाज़े पर दस्तक और लोगों का शोर सुन कर वह नकाबपोश वहां से भाग गया।

अगली सुबह मेरी आँख देर से खुली थी। आज काम पर जाने का मन नहीं था। मेरे बगल में चाय और अखबार रखा था। कुमुद बिस्तर पर नहीं थी और काफी सन्नाटा था घर में। मैं उठ कर कमरे से बाहर आ गया, सोफे पर इस्त्री किये कपड़े रखे थे और टेबल पर नाश्ता और पेपर-वेट के नीचे कागज़ का एक पर्चा। मेरा दिल भारी हुआ जा रहा था। मैं टेबल के पास आया और वो पर्चा उठाने से पहले मैंने इधर-उधर देखा... ओह्ह्ह... नहीं ! ये वही कागज़ था। मैंने पर्चा खोला उसमें आखिरी में आकांक्षा का नाम कटा था और उसके ऊपर लिखा था - "चोर"


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