पर्दे के पीछे
पर्दे के पीछे
उस कमरे की खिड़की से नज़ारा शहर का नहीं, एक राज़ का था।
रवि को ये कमरा मिले अभी सिर्फ़ तीन दिन हुए थे। तीसरी मंज़िल, पुरानी हवेली, और ठीक सामने — एक खुली खिड़की जिसके पर्दे अक्सर आधे खुले रहते थे। सामने वाला कमरा हमेशा थोड़ा रोशन रहता, लेकिन उस रोशनी में जो परछाइयाँ हिलतीं — वो किसी फिल्म से कम नहीं लगतीं।
पहली रात को ही रवि ने देखा था — लाल रंग की साड़ी में लिपटी एक औरत, बड़ी आहिस्ता से आईने के सामने खड़ी थी। उसकी पीठ रवि की तरफ़ थी, बाल खुले हुए, कमर से नीचे तक लहराते। वो कुछ बुदबुदा रही थी। और फिर... उसने साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे सरकाया।
रवि की साँसें जैसे रुक गईं।
उसने फ़ौरन नज़रें फेर लीं — लेकिन मन वहीं अटका रहा। कौन थी वो औरत? इतनी देर रात, अकेली? और इतना आत्मविश्वास... जैसे उसे पता हो कि कोई देख रहा है।
अगली रात, वही समय, वही खिड़की। रवि का मन कहा, “मत देख।” लेकिन आँखें कहती रहीं, “बस एक बार और।” और फिर, उस रात — कुछ नया हुआ।
वो औरत इस बार सामने आई। पूरा चेहरा साफ़ दिखा — हल्का सिंदूर, गीले बाल, सोने की झुमकियाँ। उसकी आँखें सीधे रवि की खिड़की की तरफ़ उठीं।
रवि चौंक गया।
क्या उसने देख लिया? क्या वो जानती है कि कोई देख रहा है?
लेकिन वो मुस्कुराई। एक ऐसी मुस्कान जो शरीर से ज़्यादा रूह को छू जाए।
तीसरी रात रवि ने परदा थोड़ा सरका कर खड़ा होना शुरू किया। अब वो हर हरकत का इंतज़ार करता। वो औरत — जो अब तक "मालकिन" के नाम से जानी जाती है — रोज़ कुछ नया करती।
कभी नाइटगाउन में झूले पर बैठी सिगरेट पीती। कभी शीशे के सामने खुद से बात करती। कभी घंटों तक किसी पुरानी धुन पर बाल सुलझाती।
और आज...
आज उसने ब्लाउज़ की गांठ खोली — धीरे से, जैसे किसी रसम को निभा रही हो। उसके बदन पर हल्की पीली रोशनी पड़ रही थी — बस उतनी कि सब कुछ छिपे भी और दिखे भी।
रवि की साँसें तेज़ थीं। दिल धड़क रहा था।
फिर उसने कुछ ऐसा किया, जिसकी रवि ने कल्पना भी नहीं की थी — उसने धीरे से सामने का परदा पूरा खोल दिया... और उसकी आँखें सीधे रवि से टकराईं।
वो मुस्कुराई।
“तुम देख रहे हो, ना?” उसकी आँखें पूछ रही थीं।
रवि पीछे हट गया — लेकिन देर हो चुकी थी। उस एक पल में, कुछ टूट गया था... या शायद जुड़ गया था।
उसने अपने कमरे की बत्ती बुझाई — लेकिन खिड़की से नज़रें हटाई नहीं।
मालकिन अब उसके सपनों में आने लगी थी। हर बार एक नए रूप में। कभी साड़ी में, कभी पुराने ज़माने की पोशाक में... और कभी-कभी, बिना किसी कपड़े के, सिर्फ़ आँखों की भाषा बोलती हुई।
🕳️ अचानक दरवाज़ा खटखटाया गया...
टप्प-टप्प-टप्प...
रवि ने चौक कर देखा — रात के डेढ़ बज रहे थे।
दरवाज़ा धीरे से खुला।
मालकिन... सामने खड़ी थी।
लाल साटन की साड़ी में, हाथ में पानी का ग्लास और एक मंद मुस्कान।
"पानी देना था... ऊपर से तुमने आज रौशनी नहीं जलाई, तो सोचा कि तबीयत तो ठीक है ना?"
रवि की ज़ुबान जैसे सूख गई। उसकी आँखें ज़मीन पर थीं — लेकिन मन अब भी खिड़की पर।
“सब ठीक है...” रवि ने धीरे से कहा।
मालकिन ने मुस्कुराकर ग्लास पकड़ाया, और जाते-जाते एक हल्की सी बात कह गई —
“खिड़की से देखना अच्छा लगता है?”
रवि कुछ बोल नहीं पाया।
दरवाज़ा बंद हुआ।
और उस रात, रवि ने पहली बार महसूस किया — वो हवेली सिर्फ़ ईंट-पत्थर की नहीं थी। वहाँ कोई खेल चल रहा था...
अगली सुबह, रवि की खिड़की पर एक सफेद लिफाफा रखा मिला।
उसमें सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी —
"देखते रहो... लेकिन छूना मत।"
Writer :- Sippy khardia
अगले पार्ट के लिए कमेंट करके बताना कैसा लगा ये पार्ट आपको।।
❤️❤️❤️❤️


